राजबाला के बहाने जानें कि एक नौकरशाह सत्ता का अभय पाकर कितना ‘दबंग’ हो सकता है

Publisher NEWSWING DatePublished Wed, 01/17/2018 - 15:50

Roopak Raag

एक नौकरशाह के सर पर यदि सरकार की छत्रछाया हो तो वह कितना दबंग और मनमौजी हो सकता है, इसे झारखण्ड की परिस्थिति में समझ सकते हैं. राज्य कार्यपालिका की सर्वोच्च पद पर बैठे अफसर ही नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाते फिरें तो लोकतंत्र में शासन व्यवस्था का बेड़ा गर्क होकर रहेगा. डेढ़ दशक के बाद हमारे राज्य की मुख्य सचिव ने सरकार द्वारा मांगे गये सवालों का जवाब दिया है. करीब 30 रिमाइंडर के बाद. वह भी तब जब मामला मीडिया से लेकर, विपक्ष ही नहीं सत्ताधारी दल के विधायकों ने भी लगातार उठाये रखा. क्या इतनी मनमर्जी यूं ही किसी नौकरशाह को मिल सकती है? यह तभी संभव है जब विधायिका कार्यपालकों को नियंत्रित और दिशा निर्देशित करने में फेल होता है. या दूसरी स्थिति तब बनती है जब नौकरशाह को मनमर्जी करने की छूट सत्ता की तरफ से मिलती है.

राजबाला वर्मा को इन दोनों परिस्थितियों का बेजोड़ माहौल मिला जिसमें उनका प्रशासकीय दंभ बढ़ता गया. माना जाता है कि राजबाला वर्मा के सर पर मौजूदा मुख्यमंत्री रघुवर दास का हाथ है. बिहार के समय में वे लालू यादव की करीबी रही थीं. अगर चारा घोटाले में उनकी कोई भूमिका नहीं थी तो भी उन्हें जवाब देने में इतना वक़्त क्यों लगा. क्यों उन पर रिमाइंडर पर रिमाइंडर भेजने का भी कोई असर नहीं हुआ. उनकी नजर में अगर कोषागार पदाधिकारी ही दोषी था तो उन्हें यह संदेह करने में इतना लम्बा समय क्यों लग गया. राजबाला ने जवाब दिया है अपनी सेवा समाप्ति की सीमा रेखा पर आकर.

एक नौकरशाह के सन्दर्भ में यह बेहद निराशाजनक ही नहीं, अच्छे शासन की सेहत के लिए भी घातक है. यह दोष तब और भी बड़ा हो जाता है जब देश की सबसे गरीब-पीड़ित आबादी की रहनुमाई आपके कन्धों पर है. नौकरशाहों का मनमाना व्यवहार झारखण्ड जैसे तंग-तबाह इलाकों के लिए कितने खतरनाक और मार्मिक असर दिखाता है, इसका जवाब भूख से मरी संतोषी है. राशन के बिना तड़पती झारखण्ड की बड़ी बीपीएल आबादी है.

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अपरिपक्व लोकतंत्र में विधायिका-कार्यपालिका के निरंकुश बनने का खतरा बना रहता है

बड़े से बड़े सम्राटों और साम्राज्यों का पतन हुआ है इतिहास में. भारत जैसे नये और अपरिपक्व लोकतंत्र में अक्सर विधायिका और कार्यपालिका के

fate of Jharkhand
fate of Jharkhand

निरंकुश होने का खतरा बना रहता है. क्योंकि शासन चलाने की जिम्मेदारी और कानूनी शक्तियां इन्हीं के हाथों में केन्द्रित होती हैं. नौकरशाह आधुनिक सम्राटों के मंत्री हैं. संविधान तय होने के बावजूद निरंकुशता के अवशेष बचे रहने के लक्षण और व्यवहार सामने आते रहते हैं. झारखण्ड इसका भोक्ता रहा है. हमारी मुख्य सचिव ही क्यों, कई आईएएस और आईपीएस ऐसे हैं जिन पर सवाल उठे हैं. गड़बड़ियों और घोटाले में नाम सामने आये हैं. इसके बावजूद वे पद पर बने हुए हैं.

आम धारना यही है कि सिस्टम की खामी के लिए हमारे नेता-मंत्री जिम्मेवार होते हैं, लेकिन व्यवस्था की नाकामी के लिए नौकरशाह की नेताओं से अधिक दोषी होते हैं. हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान ने नौकरशाहों को असीम शक्तियां दी हैं. दरअसल, सरकारी नीतियों और योजनाओं को लागू कराने की जिम्मेदारी नौकरशाहों की ही होती है. इसीलिए उन्हें कार्यपालिका यानी नीतियों और योजनाओं को एक्सीक्यूट करनेवाला कहा गया है. ऐसे में नौकरशाही भी अगर भ्रष्टाचार और अपराध की जद में आ जाये तो फिर देश का सिस्टम ठीक से नहीं चल सकता. संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार ने कबूला था कि देश के सौ से अधिक नौकरशाहों पर करप्शन और क्राइम के मामले दर्ज हैं. सरकार ने बताया था कि पिछले करीब तीन वर्षो के दौरान नौकरशाहों, राजनयिकों और राजस्व अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और दूसरे अपराधों के 139 मामले दर्ज किए गये हैं.

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A photo during Momentum Jharkhand (CM with CS)
A photo during Momentum Jharkhand (CM with CS)

केन्द्रीय मंत्री ने प्रशासनिक भ्रष्टाचार की बात संसद में कबूली 

लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने प्रशासनिक भ्रष्टाचार के बारे में यह जानकारी दी थी. शासन के लिए यह बेहद ही गंभीर स्थिति है. अगर लोकतंत्र की बागडोर जिनके हाथों में है, वे ही भ्रष्टाचार और अपराध में लिप्त हो जाएंगे तो हमारा देश किस दिशा में जायेगा? मगर यह ना कोई नई बात है और ना ही चौकाने वाली. प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कई उदाहरण देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ झारखंड में भी मौजूद हैं. विभागीय स्तर पर लापरवाही, हेराफेरी या गड़बड़ी के बावजूद आंखें मूंदे रहने वाले कई आईएएस, आईपीएस हमारे राज्य में भी मौजूद हैं. जिनके कारनामे मीडिया में सुर्खियां बटोरती रहती हैं. हमारी मुख्य सचिव राजबाला वर्मा तो बस उनमें से एक हैं. मगर फिर भी वो राज्य कार्यपालिका की सर्वोच्च पद पर बनी हुई हैं.

इसके अलावा झारखण्ड सरकार में ही पूर्व में मुख्य सचिव रहे सजल चक्रवर्ती और सुखदेव सिंह के नाम भी चारा घोटाले में आ चुके हैं. इससे क्या जाहिर होता है? हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुचारू रूप से चलने का जिम्मा जिन हाथों में होता है, वे अपने पद और पॉवर का गलत इस्तेमाल करते हैं. यह अपराध तब और भी गंभीर हो जाता है, जब कोई आईपीएस या आईएएस झारखण्ड जैसे घोर गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, पलायन, मानव तस्करी, गृहयुद्ध जैसी त्रासदियों से जूझ रहा हो. झारखण्ड बनने के बाद से ही शायद ही कोई ऐसा विभाग हो जिसमें छोटे से बड़े स्तर तक की गड़बड़ियां उजागर ना हुई हों.

एक नौकरशाह रिटायर होने तक मनमाफिक आचरण कर सकता है

संघ लोकसेवा आयोग को देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक माना जाता है. यही एजेंसी देश को चलाने वाले नौकरशाहों को नियुक्त करती है. इस नियुक्ति प्रक्रिया को दुनिया भर में सम्मान प्राप्त है. इसके बाद शासन चलाने की ट्रेनिंग लाल बहादुर प्रशासनिक संस्थान में दी जाती है. इसके बाद उन अफसरों को देश चलाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है. इसके बावजूद भी अगर भारत देश आजादी के 7 दशक बाद भी मौलिक समस्याओं से उबर नहीं

Jharkahnd Secretariate
Jharkhand Secretariat Building (Control center of the state)

पाया तो इसमें नौकरशाहों की बड़ी जिम्मेदारी बनती है. यह भी याद रखना होगा कि विधायिका और सरकार के लोगों को पांच साल में बदला जा सकता है, लेकिन एक नौकरशाह जब तक रिटायर नहीं होता, वह मनमाफिक आचरण कर सकता है.

नौकरशाहों का यह मनमाना व्यवहार तब और भी निरंकुश हो सकता है, जब परस्पर फायदे के लिए ये अफसर एक कोक्कस के रूप में एकजुट हो जाते हैं. इस तरह इनके द्वारा की गयी गड़बड़ियां को खुलासा लंबे अरसे तक नहीं हो पाता. एक आईपीएस या आईपीएस सक्रिय और ईमानदार रहे थे, तो लोगों का कल्याण और इलाके का विकास तेजी से हो सकता है. अगर वह निष्क्रिय और बेईमान हो जाये तो जनता त्रस्त हो जाती है. हम देख सकते हैं कि हमारा झारखंड 18वें साल में प्रवेश कर चुका है. इसके बावजूद क्यों नहीं अभी तक अधिकांश विभागों की अपनी कोई नीति नहीं है. क्यों बारबार योजनायें फेल जाती हैं. क्यों किसी भी प्रोजेक्ट पर पारदर्शी और ईमानदार तरीके से काम नहीं हो पाता. क्यों कोई भी योजना कमीशन की लड़ाई में बीच में ही अटक-लटक जाती है. क्यों काम में कोई गुणवत्ता नहीं होती. क्यों बनने के कुछ ही दिन बाद सड़क-पूल टूट जाते हैं. क्यों असीम संभावनाओं के बावजूद झारखंड में विकास के मानक उपहास के विषय दुनिया भर में बने हुए हैं. क्यों यहां गृहयुद्ध सी स्थिति बनी हुई है.

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