रघुवर दास सीएस राजबाला वर्मा पर एहसान नहीं कर रहे, बल्कि एहसान का बदला चुका रहे हैं : विपक्ष

Publisher NEWSWING DatePublished Thu, 01/11/2018 - 16:59

Ranchi: मशहूर शायर मुनव्वर राना कहते हैं कि तेरे एहसान कि ईंटें लगी है इस इमारत में, हमारा घर तेरे घर से कभी उंचा नहीं होगा.झारखंड की फिलवक्त राजनीति पर ये दो लाइन बिलकुल फिट बैठती है.

सीएस राजबाला वर्मा मामले में आखिर सरकार का रवैया इतना सुस्त क्यों है? क्यों सरकार ने सीधी कार्रवाई न करते हुए बस एक नोटिस जारी किया? क्यों सरकार की तरफ से इंतजार किया जा रहा है? क्यों सरकार इतनी विवश है कि वो विपक्ष के निशाने पर आने को तैयार है. लेकिन, सीएस राजबाला वर्मा पर कार्रवाई करने को तैयार नहीं? कहते हैं राजनीति और अफसरशाही में एहसान याद रखे जाते हैं. एहसान फरोशी के लिए राजनीति और उससे जुड़ी अफसरशाही में कोई जगह नहीं होती. झारखंड में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है.

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क्या कहना है विपक्षी पार्टियों का

जेएमएमः जेएमएम के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य का कहना है कि झारखंड जब से बना है तब से ही राजबाला वर्मा और रघुवर दास के व्यवसायिक रिश्ते हैं. दोनों ने हमेशा एक-दूसरे को लाभ पहुंचाया है. अब तो उनके दूसरे जेनरेशन भी मिल कर व्यापार कर रहे हैं. 2010 में भी राजबाला वर्मा ने तत्कालीन नगर विकास मंत्री रहे रघुवर दास को मैनहर्ट मामले में फायदा पहुंचाया था. सीएस राजबाला वर्मा के एहसानों का बदला सीएम रघुवर दास को चुकाना पड़ रहा है.

कांग्रेसः मीडिया प्रभारी राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि झारखंड को आखिर वो कौन है जो चला रहा है. राज्य तो तीन आर मिल कर चला रहे हैं. सीएस को तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए. आखिर ऐसी क्या वजह है कि सीएस इस्तीफा नहीं दे रही हैं. 

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सीएस राजबाला वर्मा ने नहीं की थी रघुवर दास पर कार्रवाई

बात 2010 की है. अर्जुन मुंडा की सरकार थी और उनके नगर विकास मंत्री हुआ करते थे रघुवर दास. गृह विभाग की कमान यानि गृह सचिव राजबाला वर्मा थीं. उस वक्त रांची के सिवरेज और ड्रेनेज के कंसल्टेंसी का काम करने वाले मैनहर्ट कंपनी पर करीब 19 करोड़ के घोटाले का आरोप लगा था. मामले ने खूब तूल पकड़ा. विधानसभा की विशेष समिति ने जांच भी की थी, लेकिन इसमें सबसे अहम कड़ी थी तत्कालीन गृह सचिव राजबाला वर्मा. राजबाला वर्मा ने कुछ ऐसा किया जिससे रघुवर दास पर एफआईआर नहीं हो सका. अगर एफआईआर होता तो शायद सीएम की कुर्सी तक का सफर रघुवर दास के लिए इतना आसान नहीं होता.

बतौर विजिलेंस कमिश्नर राजबाला ने नहीं दी एफआईआर की परमिशन

मैनहर्ट कंपनी के घोटाले पर हंगामा होने के बाद विजिलेंस ने अपनी तरफ से मामले की जांच शुरू की. विजिलेंस डिपार्टमेंट के तत्कालीन आईजी एमवी राव ने गृह सचिव राजबाला वर्मा (जो उस वक्त विजिलेंस कमिश्नर भी थीं) से तत्कालीन नगर विकास मंत्री रघुवर दास और मैनहर्ट कंपनी पर एफआईआर करने के लिए निर्देश मांगा, लेकिन राजबाला वर्मा ने विजिलेंस डिपार्टमेंट को एफआईआर करने का निर्देश नहीं दिया. वो भी ठीक उसी तरह खामोश हो गयीं जैसे फिलहाल सरकार सीएस वाले मामले पर एक नोटिस जारी करने के बाद खामोश है. चर्चा यह है कि राजबाला के एहसानों का बदला इस बार की पूर्ण बहुमत वाली रघुवर सरकार को चुकानी पड़ रही है.

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पीआईएल में भी मामले को जोड़ा गया है

सीएस पर कार्रवाई को लेकर हाईकोर्ट में एक पीआईएल भी दर्ज हुआ है. पीआईएल पंकज कुमार यादव ने किया है. जिसके वकील राजीव कुमार हैं. याचिका में इस बात का उल्लेख है कि कैसे राजबाला वर्मा बतौर विजिलेंस कमिश्नर रहते हुए मैनहर्ट घोटाले मामले में खामोश हो गयी थीं. पीआईएल में कहा गया है कि विजिलेंस के तत्कालीन आईजी एमवी राव ने एफआईआर के लिए विजिलेंस कमिश्नर से निर्देश मांगा था. लेकिन उन्होंने निर्देश नहीं दिया. फाइल उनके ही टेबल पर रह गयी.

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