30 वर्ष की आयु के बाद हर 10 साल पर 10% कम हो जाती है किडनी की कार्य क्षमता

Publisher NEWSWING DatePublished Wed, 01/17/2018 - 17:56

पवन ठाकुर

जैसा कि हम सभी जानते हैं किडनी हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है. हमारे शरीर में रक्त के भीतर जो भी नुकसानदेह पदार्थ है उन्हें बाहर निकालने का महत्वपूर्ण कार्य किडनी करता है. आज के भाग-दौड़ वाले जीवन में बिगड़ी हुई जीवन शैली के कारण किडनी रोग से पीड़ित रोगियों की संख्या हर दिन बढ़ रही है. किडनी रोग के कारण किडनी की कार्य क्षमता कम होने से शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों पर प्रतिकूल असर होता है, जिससे रोगी की मृत्यु भी हो सकती है. किडनी की देखभाल कैसे करें, किडनी को स्वस्थ रखने के लिए शरीर को कैसा खाना दें, जानते हैं डायटीशियन डॉक्टर श्वेता जायसवाल से. 

Dr. Shweta Jaiswal
Dr. Shweta Jaiswal

भारत में लगभग 70 लाख लोग किडनी की समस्या से ग्रसित

डॉक्टर श्वेता बताती हैं कि 30 वर्ष की आयु के बाद किडनी की कार्य क्षमता हर दस वर्ष में 10 प्रतिशत कम हो जाती है. ऐसे में किडनी पर अतिरिक्त भार देने से बचना चाहिए. भारत में लगभग 70 लाख लोग किडनी की समस्या से ग्रसित हैं. 
किडनी शरीर के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य करता है. जैसे 125 डाइहाइड्रॉजिलिक कोलिफेरोल को बनाता है जो विटामिन डी का एक्टिव रूप है. किडनी के ढंग से कार्य नहीं करने के कारण हड्डी की बीमारी हो जाती है. एरिथ्रोपीटिन का निर्माण नहीं हो पाता जिससे शरीर में रेड ब्लड सेल की कमी हो जाती है. रेनिन का निर्माण भी नहीं हो पाता है जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रण में नहीं रहता है. 

अन्य समस्याओं को भी जन्म देती है किडनी की बीमारी 

सबसे पहले glomerulonephritis होता है, जिसमें पेशाब में खून आना एवं प्रोटीन की मात्रा आना इसके मुख्य लक्षण हैं. oedema, सांस का फूलना, सोडियम एवं पानी के जमा होने के कारण होता है.
Glomerulonephritis में आहार में सबसे पहले तरल पदार्थ की कमी करनी चाहिए. ऐसा करने से oedema को कम किया जा सकता है. तरल पदार्थ में दूध, दही, छांछ, कॉफी, फल का रस, सांभर, रसम, करी की गिनती की जाती है. पानी की मात्रा कम होने के कारण मरीज के तकलीफ को ध्यान में रखते हुए खट्टे कैंडी एवं च्युइंगगम चबाकर मुंह को गीला रख सकते हैं. ऊर्जा की मात्रा बराबर 80 कैलोरी प्रति किलो शरीर के वजन के हिसाब से लेनी चाहिए. जो चीनी, मधु, ग्लूकोज, साबूदाना, फैट एवं तेल से मिलता है.

सही और पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व लेना जरूरी

एक व्यक्ति को प्रतिदिन 20-40 ग्राम प्रोटीन की मात्रा लेनी चाहिए. लेकिन अनुरिया (anuria) की उपस्थिति में प्रोटीन को बंद कर देना चाहिए. दाल, बदाम यूरिया की मात्रा को बढाते हैं. चावल में प्रोटीन की मात्रा कम होती है एवं गेहूं के आटे में उत्तम क्वालिटी की होती हैं. कैल्शियम की मात्रा प्रतिदिन के लिए एक ग्राम होनी चाहिए. शरीर में सोडियम की मात्रा ओलिगुरिया (oliguria) एवं रक्त चाप पर निर्भर करता है. शरीर को 500-1000 ग्राम सोडियम की मात्रा प्रतिदिन लेनी चाहिए. इसके लिए पापड, अचार, सूखी मछली, चिप्स, फल, फल का रस, सूप, केन्ड फूड, स्कैवश नहीं लेना चाहिए. पोटाशियम शरीर में ही बनता है और जब किडनी ठीक से काम नहीं करता है तो यह हार्ट बीट को असंतुलित करने का काम करता है और अंततः उसे रोक देता है. फॉसफोरस भी मानव शरीर के लिए बहुत जरूरी है. यह सभी खाद्य पदार्थो में पाया जाता है. दूध, चीज, मटर, नट्स, सूखे बीन्स इसके श्रोत हैं. ज्यादा फॉसफोरस लेने से खून में फॉसफोरस की मात्रा बढ़ जाती है और यह हड्डी से कैल्शियम को छीन लेता है, जिससे हड्डी कमजोर हो जाती है.

nephrotic syndrome
nephrotic syndrome

नेफ्रोटिक सिंड्रोम है कडनी की दूसरी समस्या 

डॉ श्वेता बताती हैं कि किडनी की दूसरी समस्या नेफ्रोटिक सिंड्रोम है. इसमें उच्च रक्तचाप एवं हीमेचुरिया (मूत्र में रक्त) नहीं होता है, एनीमिया एवं नाइट्रोजन जमा नहीं होता है. इस स्थिति में प्रोटीनयूरिया अर्थात पेशाब से प्रोटीन की मात्रा बराबर निकलती रहती है एवं शरीर में पानी जमा (oedema) हो जाता है. इस तरह की स्थिति में मरीज को कम प्रोटीन, अधिक कार्बोहाइड्रेट, कम नमक, कम वसा एवं कम मात्रा में तरल पदार्थ का सेवन करना चाहिए. नेफ्रोटिक सिंड्रोम मरीज को कैलोरी की मात्रा पर्याप्त मात्रा में लेनी चाहिए. भूख कम होने की वजह से इन लोगों को खाने के लिए बढ़ावा देना चाहिए. प्रोटीन की मात्रा शरीर के वजन के हिसाब से लेना चाहिए. ऐसे में नमक की मात्रा 2-3 ग्राम प्रतिदिन से ज्यादा नहीं लेनी चाहिए. प्रोटीन की क्वालिटी को बढ़ाने के लिए दाल को चावल या गेहूं के आटे में मिला कर बनाना चाहिए. अंडा या मुर्गा को प्रतिदिन के आहार में शामिल करना चाहिए. साथ ही विटामिन सी को प्रमुखता से लेना चाहिए. 

क्रॉनिक रेनल फेल्योर में बढ़ जाती है खून में यूरिया एवं क्रिएटिनिन की मात्रा

डॉ जायसवाल ने कहा कि किडनी की तीसरी प्रमुख समस्या क्रॉनिक रेनल फेल्योर है. इस स्थिति में खून में यूरिया एवं क्रिएटिनिन की मात्रा काफी बढ़ जाती है. इसमें किडनी की 90 प्रतिशत कार्य करने की क्षमता खत्म हो जाती है. इसके मुख्य कारण पेशाब के रास्ते में संक्रमण, उच्च रक्तचाप, कुछ बैक्टीरियल संक्रमण, पोलिसिस्टिक किडनी, डायबीटीज टाइप वन गाउट, पेट की सर्जरी इत्यादि है. इसके मुख्य लक्षण पेशाब का कम होना, पोटाशियम का बढ़ जाना, एसिडोसिस, शरीर का फूलना, उच्च रक्तचाप, असंतुलित हार्ट बीट, उल्टी होना, हिचकी आना, किडनी अस्थि-दुर्विकास (oesteodystrophy) इत्यादि है. 
इस तरह के मरीज को खाने-पीने का ख्याल अच्छे से रखना चाहिए. कयोंकि ऐसे मरीजों का वजन तेजी से कम होता है. मरीजों को डॉक्टर से सलाह लेकर अपना आहार लेना चाहिए. इन मरीजों को आहार के रूप में मुख्यतः कार्बोहाइड्रेट एवं वसा युक्त भोजन खाना चाहिए. प्रोटीन की मात्रा शरीर के वजन के हिसाब से घटाना या बढ़ाना चाहिए. अगर मरीज़ का क्रिएटिनिन किल्यरेनस 10-40 से कम होता है तभी प्रोटीन की मात्रा कम की जाती है. आहार में तरल पदार्थ की कमी की जाती है. सोडियम की मात्रा 2-3 ग्राम होनी चाहिए. ऐसे मरीजों को नमकीन पदार्थ जैसे नीमकी, भुजिया, गठिया, मिक्सचर इत्यादि चीजें नहीं लेनी चाहिए.

Dialysis
Dialysis

कब आती है डायलिसिस की नौबत 

डॉक्टर श्वेता जायसवाल बताती हैं कि डायलिसिस की स्थिति तभी आती है जब किडनी बिलकुल कार्य करना बंद कर देता है. यह डायलिसिस शरीर की गंदगी को जिसमें अत्यधिक नमक, अत्यधिक तरल पदार्थ एवं शेफ लेबल पोटाशियम, फॉसफोरस, क्लोराइड के लेबल को साधारण बनाए रखता है. डायलिसिस में मरीज का आहार एक साधारण इंसान की तरह ही होता है. इसके मरीज को 35 कैलोरी प्रति किलो शरीर के वजन के हिसाब से आहार लेना चाहिए. पर ध्यान रहे कि उनके आहार में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज्यादा हो. गेहूं का आटा, चावल का आटा, सूजी, मडुआ का आटा, ओट, दलिया से बनी चीजों में कार्बोहाइड्रेट होती है, अतः इनका सेवन करना चाहिए. इस स्थिति में प्रोटीन की मात्रा 1.1 ग्राम प्रति किलो होनी चाहिए. किन्तु सोडियम, पोटाशियम एवं फॉसफोरस की मात्रा कम ही लेनी चाहिए. उत्तम क्वालिटी की प्रोटीन के लिए अंडे का सफेद भाग 2-3 पीस प्रतिदिन लेना चाहिए. एक समय दाल जो गर्म पानी में लीच किया हुआ हो लेना चाहिए. उच्च फॉसफोरस वाले खाद्य पदार्थ को नहीं लेना चाहिए. तरल पदार्थ को सीमित करने के लिए चाय की मात्रा को कम एवं दूध न लेकर इससे बनी चीजें जैसे पनीर, छेना, गाढ़ा दही इत्यादि लेना चाहिए. पोटाशियम की मात्रा को कम रखने के लिए एक समय चावल, एक समय साबूदाना आटा की रोटी या चावल आटा की रोटी को प्राथमिकता देनी चाहिए.

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