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विज्ञापन में विकास और जमीनी सच भूख से मौत

Manoj kumar

देश के खाद्य मंत्री रामविलाश पासवान ने क्लियर किया कि राशन के लिए आधार जरूरी नहीं. ज्ञातव्य है कि सिमडेगा की 11 वर्षीय बच्ची संतोषी की मौत बकौल उसकी मां कोयली देवी भूख से हो गयी है. कोयली देवी का बयान है कि आधार कार्ड नहीं होने से पीडीएस दूकानदार राशन नहीं दे रहा था. दूसरी तरफ इस दुखद त्रासदी पर विपक्ष हायतौबा मचा रही है. वहीं सत्ता पक्ष मौत का कारण मलेरिया को बता रहा है. सरकार को यह बताना चाहिए कि क्या कोयली देवी को राशन मिल रहा था ? क्या कोयली देवी के घर खाने को अन्न था ? दुर्भाग्य कोई भी सरकार भूख से होने वाली मौत को झुठलाने का ही काम करती है. सरकार अपने सिस्टम पर कभी अंगुली नहीं उठाती और अपने मातहत साहबों व बाबुओं के मार्फत यह सिद्ध करने में कामयाब हो जाती है कि मौत भूख से नहीं हुयी है. कभी-कभी तो लगता ही नहीं है कि हमारा देश एक कल्याणकारी देश है. एक तरफ चंद्नायन और मंगलयान से हमारा सर फक्र से ऊपर उठ जाता है, वहीं ऐसी घटनाएं हमें शर्मशार करती है. सरकार की असंवेदना सभ्य समाज को झकझोरने का काम करती है. यही झारखण्ड है जहां कुछ दिन पूर्व ही माननीय विधायकों के वेतन में चकाचौंध करने वाली बृद्धि हुयी थी. अगर अख़बारों में नियमित और निरन्तर छपने वाले विज्ञापनों को गौर करें तो होने वाले विकास पर छाती चौड़ी हो जाती है, पर क्या विकास का मतलब केवल इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास से है या मानव संसाधन के विकास से है. सड़कें, पुलों, स्मार्ट सिटी, मेट्रो, फैक्ट्रियों, बिजली आदि से ही विकसित राज्य नहीं बनता है, अपितु अपने नागरिकों के जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार कर ही विकसित राज्य की संकल्पना साकार हो सकती है. आज दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि सरकार कोई भी हो,किसी की भी हो वह विकास करने से ज्यादा विकास करते दिखने में विश्वास करती है. 

विपक्ष भी ऐसे मामलों के उजागर होने पर राजनीति करती है, पर पीड़ित परिवार के साथ खड़ा होना भी विपक्ष का दायित्व है. सत्ता पक्ष हर सकारात्मक काम जो सरकारी पैसों पर क्रियान्वित होती है, उसे अपने राजनीति चमकाने की गरज से गैर जरूरी उपक्रम करती है. होना यह चाहिए कि ऐसे जरूरी मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष कंधे से कंधा  मिलाकर काम करते. सरकार को भी यह याद रखना चाहिए कि जहां फैक्ट्रियाँ लगी, तथाकथित विकास हुआ जैसे जमशेदपुर, बोकारो आदि वहां आज भी गरीबी है. सरकार को जनता बनाती है, पर सरकार बनने के बाद यही सरकार जनता की न सुनकर ब्यूरोक्रेट की सुनने लगती है. सरकार को समझना चाहिए कि विज्ञापन से लोगों के आंखों में थोड़े समय के लिए धूल झोंका जा सकता है, पर सच्चाई नहीं बदली जा सकती है. सरकार को सनक से भी बचने की जरूरत है. माना आधार के कई फायदे हैं, पर आधार ही अंतिम सत्य नहीं है और न अंतिम लक्ष्य. अतएव 'मंजिल' से ज्यादा महत्वपूर्ण "रास्ते" कभी भी नहीं हो सकते हैं. 

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