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राजनैतिक प्राथमिकता बनने के इंतज़ार में झारखंड के मनरेगा मज़दूर

SIRAJ DUTTA

Ranchi, 05 November: राज्य के काम करने वाली जनसंख्या से अन्य राज्यों में पलायन करने वाले लोगों का अनुपात 2015-16 में देश में सबसे अधिक झारखंड का था. रघुवर दास सरकार ने रोज़गार के प्रति अपनी सोच को दर्शाने के लिए एक नया नारा  दिया है – “हर हाथ को काम”. लेकिन पिछले तीन वर्षो में झारखंड के मनरेगा मज़दूरों के समय पर काम व भुगतान के अधिकारों का व्यापक स्तर पर उलंघन इस सरकार की रोज़गार के प्रति उदासीन रवैये को दर्शाती है. 

राज्य में मनरेगा के तहत रोज़गार का सृजन 2013-14 में 436.22 लाख मानव-दिवस से बढ़ कर 2016-17 में 707.59 लाख मानव-दिवस तक पहुंचा तो है, लेकिन यह भी काम की ज़रूरत के अनुरूप बहुत कम है. 2011 के सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना के अनुसार 50 प्रतिशत से भी अधिक ग्रामीण परिवार अकुशल मज़दूरी पर निर्भर थे, लेकिन 2016-17 में केवल 32 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को ही मनरेगा में काम मिल पाया. ऐसे परिवारों को भी 100 दिन काम के अधिकार के बदले औसतन केवल 40 दिन ही काम मिला. आदिवासी व दलित परिवारों को मिल रहे रोज़गार का अनुपात 2013-14 में लगभग 50 प्रतिशत से घट कर इस वर्ष 38 प्रतिशत हो गया है. पूरे 100 दिन का रोज़गार पाने वाले परिवारों का अनुपात भी 2013-14 में रोज़गार पाने वाले कुल परिवारों के 6 प्रतिशत से गिर कर 2016-17 में केवल 2.13 प्रतिशत हो गया है.

यह भी चिंताजनक है कि 2016-17 से अभी तक स्थानीय प्रशासन द्वारा 6 लाख से अधिक परिवारों का जॉब कार्ड रद्द कर दिए गए हैं. राज्य सरकार द्वारा फर्जी कार्डों को हटाने के लिए एक “सत्यापन” अभियान चलाया गया था, लेकिन विभिन्न प्रखंडों से सूचना मिल रही है कि मनरेगा में काम करने के इच्छुक सैंकड़ों परिवारों के कार्ड भी रद्द किए जा रहे है. ऐसे परिवार अपने काम के अधिकार से वंचित हो रहे हैं पर सरकार अभी तक इस अभियान में पाए गयी  फ़र्ज़ी कार्डों की संख्या नहीं बता पाई है.

समय पर मज़दूरी ना मिलना अभी भी राज्य के मनरेगा मज़दूरों के लिए अहम समस्या है. झारखंड सरकार ने अपने 1000 दिन पूरे होने के अवसर पर यह दावा किया था कि अब 94 प्रतिशत मजदूरों का भुगतान समय पर हो रहा है. यह आंकड़ा मनरेगा के MIS पर आधारित है जिसमें भुगतान को ससमय माना जाता है अगर फंड ट्रांसफर ऑर्डर (FTO) को कार्य-सप्ताह के 15 दिनों के अन्दर अनुमोदित कर दिया जाता है, जो कि केवल अर्ध-सत्य को दर्शाती है. हाल ही में झारखंड समेत देश के 10 राज्यों के 3446 ग्राम पंचायतों में 2016-17 में हुए मज़दूरी भुगतान पर एक शोध से पता चला है कि झारखंड में FTO के अनुमोदन के बाद मज़दूरों के खाते में पैसे पहुंचने में औसतन 9 दिन लगते हैं.

राज्य में बड़े पैमाने पर मज़दूरी लंबित होने के ऐसे अनेक कारण हैं जो मनरेगा कार्यान्वयन का ऑनलाइन प्रणाली पर निर्भर होने से जुड़े हैं एवं MIS के लंबित भुगतान के आंकड़ों में नहीं झलकते हैं. जैसे, MIS में मज़दूर के आधार संख्या की गलत एंट्री, आधार के साथ गलत बैंक खाते की जुड़ाव, मस्टर रोल में बिना नाम के मज़दूरों से काम करना, बिना मज़दूरी भुगतान किए ही योजनाओं को MIS में बंद कर देना आदि.

उल्लंघनों के लिए कुछ प्रमुख कारण है जिस पर सरकार द्वारा कोई पहल नहीं की गयी है. राज्य के अधिकांश पंचायतों में इन्टरनेट व कंप्यूटर की दुरुस्त व्यवस्था नहीं है. अनेक प्रखंडों में पर्याप्त रोज़गार सेवक नहीं हैं. एक तिहाई से अधिक ग्राम पंचायतों में पंचायत सेवक नहीं हैं. स्थानीय प्रशासन में मज़दूरों के प्रति जवाबदेही नहीं है.  मनरेगा कानून के कार्यान्वयन की समीक्षा करने के लिए राज्य रोज़गार गारंटी परिषद, जिसके अध्यक्ष मुख्य मंत्री स्वयं हैं, को कम-से-कम हर 6 महीने में बैठक करनी है. लेकिन, पिछले तीन वर्षो में परिषद की केवल एक बैठक हुई है और बैठक में लिए गए कई निर्णयों पर कुछ कार्रवाई नहीं हुई है.

राज्य में हो रहे सामाजिक अंकेक्षणों में यह देखा गया है कि ठेकेदार एवं स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर मनरेगा राशि की फ़र्ज़ी निकासी की जाती है. अधिकांश ठेकेदार किसी-न-किसी राजनैतिक दल की स्थानीय इकाई के सक्रिय सदस्य होते हैं. इस भ्रष्टाचार के गंठजोड़ को मिले राजनैतिक संरक्षण के कारण शायद मज़दूरों के अधिकारों का उलंघन राज्य की राजनैतिक चर्चाओं का हिस्सा नहीं बनता है. झारखंड विधान सभा के पिछले दो सत्रों में विधायकों द्वारा उठाए गए सवालों के विश्लेषण से यह पता चलता है कि मज़दूरों के मुद्दों पर बहुत कम चर्चा हुई है. झारखंड सरकार की लापरवाही के कारण राज्य के लाखों मज़दूरों का 15 सितम्बर 2017 से भुगतान लंबित है पर विपक्षी दलों की चुप्पी भी मज़दूरों के प्रति उनके रवैये को दर्शाती है.

सिमडेगा की संतोषी कुमारी की मौत राशन ना मिलने की वजह से हुई है, लेकिन गाँव में मनरेगा अंतर्गत कोई काम ना चलना भी परिवार की वर्तमान स्थिति के लिए ज़िम्मेवार है. अगर रघुवर दास सरकार “हर हाथ को काम” के नारे को हकीकत में बदलना चाहती है, तो सभी मज़दूरों के काम के अधिकार को सुनिश्चित करना होगा. इसके लिए मुख्य मंत्री को मनरेगा के कार्यान्वयन से ठेकेदारों को हटाने एवं स्थानीय प्रशासन को मज़दूरों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए राजनैतिक प्रतिबद्धता दिखानी होगी.

नोटः उपरोक्त आलेख लेखक के निजी विचार हैं.

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