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आयोजन सरकारी समारोह का

    "व्यंग्य"

     मुझे एक पुराने कबाड़खाने से एक डायरी मिली है,जो किस साल की है इसका पता नहीं चल रहा है. लेकिन देखने से लगता है की सैंकड़ों वर्ष की है. आमजनों के हित के लिए उसका तस्किरा करता हूं.

कहीं किसी देश के एक राज्य  के किसी बड़े रियासत में अचानक से राजा और रियासतदार की तरफ से, उनके हुक्म की तामिल में सरकारी आयोजन होने लगे. जनता स्तब्ध हो गयी. कुछलोग जाकर देखने भी लगे. उत्सुकता से वे चले जाते. वहां सरेआम राजा और रियासतदारों की झूठी तारीफ की जाती और कोई सच्चाई या बुरा-भला कहता उसे जलसा करानेवाले बिना समय गंवाए ही वहीं सरेआम दण्डित भी कर देते. दशहत और खौफ का माहौल बनता चला गया. जलसा करने का काम दबंगों को ही सौंपा जाने लगा ताकि कोई चूं-चपड़ न कर सके. जो एकबार जाते तो दूबारा जाने की इच्छा नहीं रखते. समारोह देखकर जो तारीफ नहीं करते, राजा और उनके कारिंदों की जयजयकार नहीं करते उनके पीछे दबंगों को लगा दिया जाता. या तो वे समर्पण कर देते या फिर वे अदृश्य हो जाते.

 उसी शहर में रामसागर जी रहा करते थे. वे अपने इलाके के काफी दबंग आदमी थे. एक समय था कि पूरे शहर में कहीं भी कोई गुंडागर्दी हो, रंगदारी का मामला हो, बाजी लगती कि यह काम रामसागर जी का है और जरुर ही वे किसी पुलिस-थाने में होंगे. शर्त लगई जाती. रामसागर जी पुलिस-थाने में पाए जाते. लेकिन शाम होते-होते वे फिर सरेआम चौक-चौराहे पर खुलेआम अपने चेलों के साथ घूमते नजर आ जाते. वे कभी जेल नहीं गए. उनके पुलिस-थानेवालों, हाकिम-हुक्मरानों से बड़े आत्मीय और नजदीकी सम्बन्ध थे.

तब उनकी उम्र मात्र 20-25 वर्ष की थी. 30-35 वर्ष की आयु प्राप्त होते-होते रामसागर जी के पास किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. बड़ी हवेली, अनेक नौकर-चाकर, चेले-चपाटी, सुख-सुविधा के सारे साधन, एक अदद सुन्दर पत्नी, दो अदद छोटे-छोटे प्यारे बच्चे. रियासत के सभी महाजनों के यहां जमा खाते और उनमें लाखों में जमा राशि, जो सूद पर लगाए जाते. अब वे अपने चेलों-चपाटी के मार्फत ही पुराने काम करते. मुसाफिर खानों, सरायों, कोठों, मदिराशाला/मयखानों, जुआखानों, अड्डे, अन्नाज की थोक-मण्डी आदि से हर महीने बंधी-बंधाई मोटी रकम खुद आ जाती थी. वे अब इससे बोर होने लगे थे. फिर जमा पैसा निवेश मांगता है. इसलिए उन्होंने समारोह कराने का धंधा शुरू कर दिया. इसके लिए विशेषज्ञ भी रख लिए. कागजी, फर्जी कई गद्दियां खोल लिए गए. रामसागर जी की जिंदगी मजे में चल रही थी. लेकिन कभी भी थाना-पुलिस, हाकिम-हुक्मरानों को कोई कमी या शिकायत नहीं होने दी.

वे दिन में एक बार राजा के द्वारा सुरक्षा के लिए दिए गए सिपाही और कई निजी लठैतों के साथ राजा/रियासतदार के दफ्तरों में घूम लेते. राजा/रियासतदार के हुक्म या उसकी आड़ से होने वाले सरकारी जलसे का कोई न कोई काम किसी न किसी हाकिम से उन्हें मिल ही जाता. जिस दिन काम नहीं मिलता वे भुगतान पाने में हो रही दिक्कतों को जानते और उनको दूर करने में लग जाते. दूर भी कर लेते. किसी भी बिल के पेमेंट में रामसागर जी को किसी से दिक्कत नहीं हुई. किसी ने हिम्मत भी नहीं की. आये दिन शहर में राजा या रियासतदार के हुक्म के नाम पर कोई न कोई जलसा होता रहता. न भी होता तो रामसागर जी की कागजातों में शहरी क्षेत्र से लेकर दूर-दराज देहातों तक में हो जाता. गवाहान के साथ भुगतान के लिए बिल के साथ लग जातीं. भुगतान भी जल्दी हो जाता. आपसी हिसाब भी सलट जाता. कोई दिक्कत या परेशानी नहीं होती. सारा मामला चुपचाप चलता.

     रामसागर जी की दिनचर्या व्यस्त रहती. सुबह सात बजे से वे तैयार होकर अपने दालान में बैठ जाते. थोड़ी देर में उनका अपना दरबार लगता. वे अपने घर आये लोगों से साढ़े नौ बजे तक मिलते. इस समय राजा या रियासतदार के अलग-अलग दफ्तरों के बाबू या बड़े बाबू, थाना-पुलिस के हाकिमान आते. लेन-देन, आपसी हिसाब की विशुद्ध परम्परा का विधिवत निर्वहन किया जाता. कभी हिसाब में कोई गड़बड़ी नहीं हुई,सबका हिस्सा निकालकर भरोसेमंद कारिंदों के मार्फत हाकिमों-हुक्मरानों को भेज दिया जाता. कभी कुछ पहले-बाकि बाद में-जैसी सुविधा हुई या जैसा टी होता , जहां जैसा होता रामसागर जी सलट लेते. धीरे-धीरे उनकी पहुंच राजा के अधीन अगल-बगल की कई रियासतों में भी होने लगी. देखते-देखते कई जगह उनका कारोबार मुकाम पर पहुंचने लगा. राजा और रियासतदारों का खूब प्रचार, गुणगान जलसों के माध्यम से होने लगा. नायाब तरीके भी खोज निकाले जाते. इस खेल में सबको मजा आ रहा था. राजा और रियासतदार भी खुश थे. उनकी अपनी या उनकी हुकूमतों की कारगुजारियां सामने नहीं आ रही थीं.

सब दिन बराबर नहीं होते. एकबार एक रियासत में एक नये हाकिम साहब आए. उन्होंने रामसागर जी का बिल रोक दिया. जांच करने का आदेश दे दिया. बिल सात लाख का ही था. इतनी छोटी राशि उनके लिए मायने नहीं रखती थी, लेकिन रामसागर जी भीड़ गए. पचास हजार और खर्च हुए. जांच रिपोर्ट उनके पक्ष में हो गयी, उन्होंने चैन की सांस ली. अब वे लग भीड़कर उस बड़े हाकिम साहब के नजदीकी हो गए. उनका जो साथ एकबार बना वह उनके उंचे से उंचे ओहदे दिलाने तक साथ चला. साथ में धंधे में लगाने के लिए बड़ी रकम भी बड़े हाकिम साहब के द्वारा दी जाने लगी, जिसके सूद का दर भी टी रहता. वे अपने बड़े हाकिम साहब को और आगे बढ़ाने के लिए भी अलग से जलसा करवाने लगे. जिसमें और भी बड़े से बड़ी हाकिम-हुक्मरानों को बुलाया जाने लगा और उनकी मर्जी के अनुसार उनसबों को कीमती से कीमती माल-असबाब, तोहफे दिए जाने लगे. इस तरह इन जलसों के पेट से रामसागर जी के लिए बड़े लोगों के महाजन बन जाने का मौका पैदा हो गया. इसमें कई और लोग चुपके से सबकी नजर बचाते हुए जुड़ते गए. रामसागर जी के पेट से कभी कोई राज़ नहीं निकला.

कुछ ही सालों में रामसागर जी के नक्शे-कदम पर चलते हुए उनके एकलौते साले ने अपने रियासतदार से मिलकर जलसा करने/कराने का इस तरह नया काम शुरू कर दिया.

    यह पढ़ते-पढ़ते मुझे नींद आ गयी. सपने में रामायण का वह प्रसंग देखा, जिसमें रावण द्वारा अपहृत माता सीता- त्रिजटा से लंका के अशोक वाटिका में हुए एक संवाद में इस आशय की बात कहती हैं-यह सपना मैं कहीं विचारी, हुए सत्य गए दिन चारी. मेरी नींद झटके से खुल गयी. अब नींद उड़ गयी है. 

 

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