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मुख्यमंत्री जी, आउट ऑफ कंट्रोल हो रहा सिस्टम

Surjit Singh

- 18 अक्टूबर को सभी अखबारों में खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय का बयान छपा है. उन्होंने मुख्यमंत्री रघुवर दास और मुख्य सचिव राजबाला वर्मा के काम करने के तरीके पर सवाल उठाया है. दैनिक भास्कर में पेज- दो पर एक छोटी खबर यह भी है कि कैबिनेट की बैठक में मुख्यमंत्री ने जब मुख्य सचिव से राशन कार्ड डीलिट करने के बारे में पूछा,  तो मुख्य सचिव ने ऐसा आदेश देने से इनकार कर दिया. जबकि सरयू राय ने कहा कि उनके पास आदेश देने का वीडियो उपलब्ध है.

- हिन्दी दैनिक  हिन्दुस्तान में पेज-14 पर खबर है. चाईबासा के मंझगांव के कुमारडुंगी सामुदायिक अस्पताल में गर्भवती महिला चार घंटे तक तड़पती रही. एंबुलेंस नहीं मिला. इस कारण बेहतर इलाज के लिए दूसरी जगह नहीं ले जा पाया गया. दर्द से तड़प-तड़प कर उसकी मौत हो गयी.

- हिन्दी दैनिक भास्कर में पेज-13 पर खबर है कि प्रसव पीड़ा से महिला छटपटाती रहीं, डॉक्टर इलाज करने नहीं आए. फोन पर ही इलाज बता दिया. शिकायत करने पर प्रभारी सिविल सर्जन मामले की जांच कर रहे हैं. यह घटना गिरिडीह के किसी सुदूर इलाके के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की नहीं है  बल्कि जिला मुख्यालय में स्थित सदर अस्पताल की है.

- एक और खबर सभी अखबारों में किसी न किसी पन्ने पर है. वह है मुख्यमंत्री के सचिव सुनील वर्णवाल का बयान. बयान है : मर जायेगी तब देंगे पैसे क्या ? वह एक झुलसी लड़की के इलाज को लेकर बोल रहे थे. मुख्यमंत्री ने 20 दिन पहले लड़की के परिजन को 1.50 लाख रूपये की आर्थिक सहायता देने का आदेश अपने जन संवाद कार्यक्रम में दिया था. अफसरों ने अब तक रूपये नहीं दिए.

- हिन्दी दैनिक प्रभात खबर ने एक पूरे पन्ने की रिपोर्ट छपी है. खबर के साथ शहर में फैली गंदगी की तसवीर भी है. प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा की टिप्पणी के साथ. जिसमें कहा गया है कि राजधानी में गंदगी का अंबार लगा हुआ है. कोई देखने वाला नहीं. जनता जाग जायेगी तो दिक्कत होगी.

- एक वाक्या और. खासकर पत्रकारों के लिए जरुरी है. साल भर पहले 23 अक्टूबर 2016 पत्रकार जयप्रकाश सिंह की मौत हो गयी. वह रांची एक्सप्रेस में काम करते थे. काम करके घर लौटते वक्त वह सड़क दुर्घटना के शिकार हुए थे. मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद रघुवर दास ने पत्रकारों की मौत होने पर पांच लाख रूपये नकद देने का फैसला लिया था. कई पत्रकारों के परिजन को यह लाभ मिला भी है. लेकिन जयप्रकाश सिंह के परिजन को अब तक इसका लाभ नहीं मिला. उनके परिजनों ने हर जगह गुहार लगायी. मेरी जानकारी है कि करीब छह माह पहले मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव संजय कुमार को भी इस बात की जानकारी दी गयी थी. उन्होंने तत्काल भुगतान का आश्वासन भी दिया था.

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मर जायेगी, तब पैसे देंगे क्या....

राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, आप जीरो टॉलरेंस की बात करते रहें हैं. अब आपके आदेश का पालन 20 दिन बाद भी नहीं होता. आपके सचिव को कहना पड़ रहा है कि “मर जायेगी, तब पैसे देंगे क्या ? ” आखिर अफसरों को किसका आदेश चाहिए? सरकारी जांच रिपोर्ट की ही बात करें, तो पिछले महीने कुपोषण के कारण नवजात बच्चों के मरने की खबर से राज्य की बदनामी हुई थी. अब खबर आ रही है; कहीं एंबुलेंस के बिना प्रसव पीड़ा से तड़प-तड़प कर महिलाएं मर रहीं हैं तो कहीं प्रसव पीड़ा से तड़प रही महिला का इलाज डॉक्टर फोन पर ही करने लगते हैं. अस्पतालों में एंबुलेंस उपलब्ध नहीं है. क्यों ?  एंबुलेंस के लिए वाहनों की खरीद तो डेढ़ साल पहले कर ली गयी थी. फिर एंबुलेंस क्यों नहीं बनी? क्यों बार-बार टेंडर रद्द किया जाता रहा ? आखिर कौन है जिम्मेदार, इन सबके लिए. तो क्या स्टेट आउट अफ कंट्रोल हो गया है. 

जीरो टॉलरेंस, विकास के 1000 दिन...वगैरह-वगैरह

व्यवस्था सड़-गल गयी है. और अब इसकी सड़ांध बाहर फैलने लगी है. जहां कोई किसी की नहीं सुनता. कोई किसी के आदेश की परवाह नहीं करता. सुशासन के, ईमानदारी के, जीरो टॉलरेंस के 1000 दिन में ऐसा क्या हो गया कि अब अफसरों को आपका आदेश भी काम करने के लिए बाध्य नहीं कर रहा. दरअसल, इन 1000 दिनों में सिस्टम टूट गया है. अफसरों की हेरारकी (पदक्रम) खत्म हो गया है. ऐसी चर्चा है, चार-पांच अफसर सबकुछ चला रहे हैं. बाकी के अफसर किनारे पड़े हैं.

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सरयू राय ने जो बयान दिया है, वह गंभीर है. उन्होंने जनसंवाद कार्यक्रम पर तो सवाल उठाये ही हैं.  मगर ये सवाल खुद आपके घर से उठे हैं. विपक्ष ने आरोप नहीं लगाया है. जबाव आपको देना पड़ेगा.  आप खुद भी कमेटी बनाकर मूल्यांकन कर लीजिये. जनसंवाद कार्यक्रम में जो आदेश दिए गए, उनमें से कितने का पालन हुआ. जो कार्रवाइयां की गयीं, वे सही थे या गलत ? फिर रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दीजिये. नहीं तो कल को यह बड़ा मुद्दा बनेगा. अभी कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं, कल सड़क पर लोग पूछने लगेंगे. रही बात कैबिनेट में सरयू राय के सवाल और मुख्य सचिव राजबाला वर्मा के जबाव का. तो खबर के मुताबिक सरयू राय ने कहा है कि उनके पास वीडियो है. वीडियों मंगा कर देख लीजिये. अगर सरयू राय कैबिनेट में झूठ बोल रहे हैं, तो उन्हें बरखास्त करिये और अगर मुख्य सचिव ने झूठ बोला, तो उन पर कार्रवाई होनी चाहिए. 

घर से ही खिलाफत की आवाज

खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने जो दूसरा सवाल मुख्य सचिव राजबाला वर्मा को लेकर उठाया है, उसमें कोई नयापन नहीं है. पर पहली बार किसी ने परदे से बाहर निकल कर सार्वजनिक रूप से कहा है. वैसे भी मुख्य सचिव राजबाला वर्मा चुनाव आयोग से ब्लैक लिस्टेड अधिकारी हैं. चार घोटाले में भी उनका नाम आया था. ऐसे अफसर का मुख्य सचिव होना ही हैरत की बात है. खैर, सचिवालय के किसी भी क्लर्क को बुलाकर विश्वास में लेकर पूछ लीजिये, क्या चल रहा है सरकार में. पता चल जायेगा. आपको पता चल जायेगा कि कैसे एक अफसर टेंडर मैनेज कर रहा है. कैसे विकास कार्यों में लगे संवेदकों को काली सूची में डालने और फिर काली सूची से बाहर करने का खेल चल रहा है. क्यों एक मुख्य सचिव रैंक के अफसर सीधे इंजीनियरों या कनीय अफसरों के साथ बैठक करते हैं.

जितने भी सड़क निर्माण के बड़े टेंडर निकलते हैं, उनमें कैसे सिर्फ दो कंपनियां ही एल-वन या एल-टू होती हैं. किस आइएएस अफसर की मिलीभगत से जमशेदपुर में हर दिन तकरीबन 2.50 करोड़ रुपये की बिजली चोरी हो रही थी. किस ब्यूरोक्रेट के इशारे पर शराब के सरकारी दुकानों में पुरानी व्यवस्था के लोग ही कीमत बढ़ा कर शराब बेच रहे है. इसमें किस ब्यूरोक्रेट का रिश्तेदार शामिल है.

खुद किसी सखी मंडल की सदस्य से वह मोबाइल फोन मंगवाकर देख लीजिये, कैसी है ? पता चल जायेगा. पता चल जायेगा कि कैसे आपके ही नाम पर महिलाओं को ठगा गया. आपने भी उस कंपनी (कार्बन) का नाम नहीं सुना होगा, जिससे अफसरों ने एक लाख मोबाइल सेट (आउटडेटेड) खरीद ली. वैसे अफसरों के पास एक दलील है कि मोबाइल की खरीद ई-टेंडर के जरिये की गयी. तो क्या ई-टेंडर के जरिये कचड़ा खरीद लेंगे. इसी के लिए उन्हें सर्वोच्च पद पर रखा गया है. हर माह लाखों की सैलरी के अलावा अन्य सुविधाएं मिलती हैं. इन सबके लिए कौन-कौन अफसर जिम्मेदार हैं. किस विभाग के किस अफसर ने प्रज्ञान यूनिवर्सिटी को मान्यता दिलवायी. एक वैसे व्यक्ति को आपके साथ खड़ा करके तसवीर खिंचवा दी, जो एमबीबीएस का फरजी सर्टिफिकेट बेचता था. जिन कंपनियों की औकात मात्र एक लाख रुपये की है, उनसे सैकड़ों करोड़ का एमओयू करवा दिया. किसकी जिम्मेदारी है, कंपनियों के बारे में पता करने की. समय रहते उन पर लगाम नहीं लगा, तो स्थिति और खराब ही होगी.

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बहुत अच्छी लेख पुरे सिस्टम का भेद खुल गया keep it up

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I think d cm of jharkhand should read dis nd k9 wat is going on in his state..BJP...kuch Karo yaar...itna complain...my god...

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State ki isthi ke darsata ek behtar story

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