सीजेआई के समर्थन में मुंबई के वकील,  पंजाब- हरियाणा हाई कोर्ट में महाभियोग के प्रावधान को चुनौती

Publisher NEWSWING DatePublished Wed, 04/25/2018 - 20:53

NewDelhi :  राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू द्वारा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियेाग नोटिस खारिज किये जाने के बाद इसके समर्थन और विरोध में राजनीति जेार पकड़ रही है. राहुल गांधी संविधान बचाने निकल पड़े हैं. इस क्रम में सीजेआई के समर्थन में अब न्यायिक लड़ाई भी शुरू हो गयी है. इसे लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर द जजेज (इनक्वायरी) एक्ट 1968 के एक प्रावधान को चुनौती दी गयी है. उधर मुंबई के वकील सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा के समर्थन में खड़े हो गये हैं. वकीलों ने बांबे हाई कोर्ट के सामने जस्टिस दीपक मिश्रा के समर्थन में हस्ताक्षर अभियान चलाया. बता दें कि चंडीगढ़ के अधिवक्ता हरि चंद अरोड़ा ने अपनी याचिका में इस एक्ट से महाभियोग का प्रावधान को हटाने की मांग की है.  

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228 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं

याचिका में कहा गया है कि 228 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं,  ऐसे में उनका स्वार्थ कानून के साथ हितों का टकराव वाला है. कई सांसद  वकालत भी करते हैं. ऐसे सांसद यदि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी जज को पद से हटाने का प्रयास करते हैं तो यह हितों के टकराव का मामला बनता है.  तो ऐसा प्रावधान जो कुछ सांसदों को जजों को पद से हटाने के लिए उन्हें प्रस्ताव लाने की अनुमति देता है, वह संविधान के अनुच्छेद 124(4) की मूल भावना के खिलाफ है.  कहा कि संविधान के अनुच्छेद 124(4) में जजों को पद से हटाने का उल्लेख किया गया है.  संवैधानिक प्रावधान के तहत जजों को साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाया जा सकता है. 

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जनहित याचिका पर 26 अप्रैल को होगी सुनवाई

हरि चंद अरोड़ा की जनहित याचिका पर 26 अप्रैल को सुनवाई की जायेगी. अधिवक्ता अरोड़ा ने अपनी याचिका में कांग्रेस की अगुआई में सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा को पद से हटाने के लिए राज्यसभा के सभापति को नोटिस देने का उल्लेख करते हुए कहा कि संसद में कुल 797 सदस्य हैं. इनमें से  सिर्फ 64 सांसदों के नोटिस पर हस्ताक्षर हैं. यानी इन सांसदों की तादाद सिर्फ आठ फीसद है.  अरोड़ा ने कहाये सांसद  न्यायिक प्रणाली के लिए शर्मिंदगी का पर्याय बने. कहास कि इस तरह के महाभियोग प्रस्ताव खारिज होते हैं तो भी न्यायिक तंत्र को अपूरणीय क्षति हो जाती है.  

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