क्या कोल्हान सच में है एक अलग देश ? जानिए पूरी कहानी

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 06/02/2018 - 16:57

Pravin Kumar

Ranchi: कोल्हान प्रमंडल को भारत के बजाय ब्रिटिश देश का अंग मानने वाले 83 वर्षीय आदिवासी नेता रामो विरुआ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. शुक्रवार को चाईबासा पुलिस ने सदर थाने के महुलसाई इलाके से बिरूआ को गिरफ्तार कर लिया.मेडिकल चेकअप के बाद तुरंत पुलिस ने जेल भी भेज दिया. 20 साल पहले एकीकृत बिहार में एडीएम जैसे पद से सेवानिवृत होने वाले राज्य प्रशासनिक अधिकारी रह चुके रामो विरुआ कोल्हान को अलग देश मानता है और खुद को इसका स्वयंभू शासक बताता है. लेकिन कोल्हान की कहानी यहां से शुरू हो कर यहीं नहीं खत्म होती है. इसके पीछे सौ साल से ज्यादा का सच भी छिपा है. जिसे शायद अब भुला दिया गया है. जानते हैं क्या कोल्हान सच में एक अलग देश है?  

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विल्किन्सन रूल का दिया जाता है हवाला

कोल्हान का अपना एक अलग इतिहास रहा है. यहां की बहुत सारी बात आज भी इतिहास के पन्नों में दबी हुई हैं. ब्रिटिश शासन काल में वर्तमान कोल्हान इलाके का कमीश्नर सर थोमस विल्किन्सन हुआ करते थे. उनका इस इलाके में बड़ा जोर था. उस जमाने के कमीश्नर रहे विल्किन्सन के  नियमों का हवाला देकर कोल्हान को एक वर्ग अलग देश की तरह देखता और मानता है. इससे पहले भी विल्किन्सन रूल को आधार बना कर कोल्हान रक्षा संघ के द्वारा अलग राष्ट्र की मांग कि गई थी. वही ब्रिटिश काल में  पोड़ाहाट के राजा द्वारा राजस्व अदा करने की बात की गई थी और कोल्हान में जमीन का लगान बढ़ा दिया गया था, जिसके खिलाफ हो समुदाय का विद्रोह भी हुआ. इसके बाद कोल्हान क्षेत्र के तत्कालीन ब्रिटिश एजेंट, सर थॉमस विल्किन्सन ने ताकत के बल पर कोल्हान को कब्जा करने का प्रयास किया और कोल्हान के एक हिस्से को कब्जा कर पोड़ाहाट के राजा के अधीन कर दिया. वहीं ब्रिटिश फौज के इलाके को छोड़ते ही कोल्हान में फिर से विद्रोह की आग सुलगने लगी. 1837 में, विल्किन्सन ने कोल्हान का मुख्यालय चाईबासा को बनाया और अलग कोल्हान पृथक संपत्ति घोषित करने का फैसला किया. इसे आधार बनाकर कोल्हान में सरकार के विरोध में आवाज उठती ही रही है. 1977 में कोल्हान रक्षा संघ का गठन किया गया, जिसके प्रमुख नेता नारायण जोम्को, अश्विनी कुमार सवैया, लाल बोदरा, कृष्णा चन्द हेम्ब्रम थे . संगठन ने जल्द ही लोकप्रियता पाई और हजारों की संख्या में हो आदिवासी इसके सदस्य भी बन गये. संगठन की ओर से दो दिसंबर 1982 को कोल्हान के स्वतंत्रता दिवस  का आयोजन किया गया और कोल्हान को कॉमनवेल्थ का सदस्य बताकर कोल्हान सरकार की घोषणा की गई. इन नेताओं ने कोल्हान की स्वतंत्रता का मुद्दा लंदन से जेनेवा तक भी उठाया. लेकिन बाद में इन नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया. जिसके बाद अलग राष्ट्र की मांग दब गई. जिसे दोबारा रामो बिरूवा  हवा देने का काम कर रहे थे.   

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आखिर क्यों गिरफ्तार हुए रामो विरुआ

खुद को कोल्हान का खेवट नम्बर एक घोषित करने के बाद रामो बिरूआ ने  18 दिसंबर 2017 को अलग राष्ट्रीय ध्वज फहराने की तैयारी की थी. लेकिन जब प्रशासन को इसकी जानकारी मिली तो कार्यक्रम पर रोक लगा दी गई. इसके बाद रामू के समर्थकों ने कोल्हान में बड़ी सभा की घोषणा की थी, जिसे भी प्रशासन ने नहीं होने दिया.सरकार ने बिरूआ पर आरोप लगाया है कि वह खुद को खेवट नंबर 1 घोषित कर मुंडाओं से जमीन का लगान वसूली कर रहा है.कोल्हान में पिछले 36 सालों से बीच-बीच में कोल्हान क्षेत्र में ब्रिटिश राज मानदंडों का हवाला देते हुए एक अलग कोल्हान स्टेट सरकार की मांग का माहौल तैयार किया जाता रहा है. बिरूआ को पहले भी अरेस्ट किया जा चुका है ,वह लगातार पश्चिम सिंहभूम जिले के मंझारी पुलिस थाना क्षेत्र में सरकार विरोधी गतिविधियां चला रहा था. साथ ही  कोल्हान स्टेट सरकार के लेटरहेड के तहत जाति, आय और उम्र जैसे प्रमाण पत्र जारी करना शुरू कर दिया था.

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पूर्व में भी हुई थी गिरफतारी 

25 और 26 अक्टूबर 1981 को तथाकथित कोल्हान सरकार के कानूनी सलाहकार आनन्द टोपनो, रांची हाईकोर्ट के वकील और अश्विनी सवैया चाईबासा कोर्ट के वकील को गिरफतार कर जेल भेज दिया गया था.
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