अंततः नोटतंत्र हार गया, अश्वमेध का घोड़ा रुक गया ..

Publisher NEWSWING DatePublished Mon, 05/21/2018 - 11:24
vijay jha
Bijay Jha

(विजय झा ने झारखंड भाजपा में महत्वपूर्ण दायित्व संभाले.  प्रदेश मंत्री और धनबाद जिला अध्यक्ष जैसे पदों के अलावा बियाडा के चेयरमैन भी रहे. फिलहाल वह संगठन से अलग हैं, लेकिन भाजपा के चाल, चरित्र, चिंतन और चेहरे पर अक्सर गंभीर प्रश्न उठाते रहते हैं. उनकी बातों में गहरी टीस दिखती है.
कर्नाटक प्रसंग में फेसबुक पर उनकी  20 मई को लिखा गया एक पोस्ट चर्चा में है. उसमें तीन-चार अंशों में कही गई बात यहां प्रस्तुत है, जो देश की मौजूदा राजनीति पर गहरी टिप्पणी है. कुछ लोग पार्टी धर्म निभाते हैं, कुछ लोग राष्ट्र धर्म निभाते हैं. लेकिन कुछ लोग पार्टीवाद में इतने रत हो जाते हैं कि उन्हें कुछ भी ग़लत दिखाई नहीं देता है.)

मैं सिद्धांत से भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा था. उन दिनों नीचे से ऊपर तक कांग्रेस का शासन था. किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि केंद्र में भाजपा की सरकार ऐसी बनने वाली है.

सरकार बनने पर दागी, अपराधी के पौ बारह होंगे, दलबदल, विधायक की हत्या पूर्व की ही भांति होगी, ऐसा किसी ने सोचा तक नहीं था. जिस R K SINGH ने पार्टी के सर्वमान्य नेता आडवाणी जी की मध्य रात्रि में गिरफ्तारी की और कपड़ा भी बदलने नहीं दिया था, वही R K SINGH आज सासाराम से भाजपा सांसद और केंद्र में मंत्री भी हैं. आज कार्यकर्ता उनका जयकारा लगाने को अभिशप्त हैं. कल्याण सिंह की निर्वाचित सरकार को भंग कर जो जगदंबिका पाल मुख्यमंत्री बन बैठे थे, जिसके विरोध में माननीय अटल जी वोट क्लब पर आमरण अनशन पर बैठे थे, आज वही जगदंबिका पाल भाजपा से सांसद हैं. कार्यकर्ता चाहे ना चाहे उन्हें उनका जिंदाबाद करना पड़ रहा है.

हम लोग जिस राजनीतिक गुंडई का विरोध विपक्ष में रहते हुए करते थे, आज पहले से अधिक स्थापित हो चुकी है. सत्ता में बैठे लोग खामोश हैं. सुशासन आज कोई मुद्दा नहीं रह गया है. बड़े नेताओं ने भी भ्रष्टाचार पर बोलना बंद कर दिया है. पहले विरोध किया जाता था, लेकिन सत्ता मिलते ही विदेशी चंदा को LEGALISE कर दिया गया. लोकपाल-लोकायुक्त की नियुक्ति चार साल के बाद भी नहीं हो पाई. हर सरकारी विभाग में कमीशन का रेट बढ़ा है.  खुलेआम लिया दिया जा रहा है. जहां 28% था, अब 33% लिया जा रहा है.  कोयले की लूट बढ़ी है. सभी रंगदार-माफिया पार्टी के सम्मानित सदस्य हैं.  मेरे समय में एक जिला का रंगदार पार्टी का सदस्य बनना चाहता था. बहुत दबाव बनाया गया मेरे कई अपने भी पैरवी करने लगे. रांची से पैरवी कराने के बाद भी मैंने पार्टी का सदस्यता नहीं दिया था. सोचा ना था सत्ता के लिए भाजपा इतना गिर जाएगी. डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दिनदयाल उपाध्याय, अटल जी, आडवाणी जी, कैलाश पति मिश्र जैसे विभूति से प्रभावित होकर मेरे जैसे लोग भाजपा से जुड़े थे. कभी सोचा ना था की भाजपा कभी जात की राजनीति या गिरोह की राजनीति करेगी. मेरे जो अपने जीवन मूल्य हैं, उससे समझौता नहीं कर सकता था. अतः घुट-घुट के दल में रहने से तो बेहतर था कि अलग हो जाऊं और मैंने अपने दिल की आवाज सुनी. दल के अंदर रहकर भी गलत चीजों का विरोध करता था. अगर आज दल में रहता तो और कार्यकर्ता की तरह घुट-घुट कर रहते हुए गलत चीजों पर मुंह बंद रखना पड़ता. जो मेरे लिए गंवारा नहीं था. सभी अपनों के दबाव के बावजूद मैंने DC से समझौता करने के बजाय जेल जाना बेहतर समझा था. मैं अपने उस DNA को जिंदा रखना चाहता हूं, मेरे करीबी रहे लोग मेरे स्वभाव से बहुत अच्छी तरह से परिचित हैं.

पार्टी ने अपने मूल चरित्र को सत्ता के लिए त्याग दिया तो मैंने भी अपने स्वभाव को बरकरार रखने के लिये पार्टी को त्याग दिया. 

आज पार्टी को शीर्ष तक ले जाने वाले हर गांव में जन-जन तक पहुंचाने वाले पूर्व राष्ट्रीय नेता अडवाणी जी का और जिनके नेतृत्व में कश्मीर के लाल चौक में जान पर खेल कर तिरंगा लहराया गया. आज इन दोनों की पार्टी में क्या स्थिति है पूरा देश वाकिफ है. 

vijay jha
झारखंड भाजपा के नेता रहे विजय झा ने लोगों की टिप्पणियों का जबाव देते हुए अपने फेसबुक पर जो लिखा...

डॉक्टर जोशी जी की विद्वता को दरकिनार करते हुए स्मृति ईरानी ( IA कि डिग्री वह भी न्यायालय में अभी विवादित है) को मानव संसाधन मंत्रालय जैसा अति महत्वपूर्ण विभाग देकर पूरे देश के साथ अन्याय किया जाता है. किरीट समौया के द्वारा जिस BSP के नेता पर जिस दिन दस हजार करोड़ का आरोप लगाया जाता है, उसके दूसरे ही दिन पार्टी में शामिल कर लिया जाता है. मुकुल रॉय के भाजपा में शामिल होते ही चिट फंड घोटाले की जांच खत्म हो जाती है. वहीं दूसरी ओर सांसद कीर्ति आजाद दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन में 500 करोड़ के घोटाले की जांच की मांग करते हैं, तो उन्हें पार्टी से सस्पेंड कर दिया जाता है. याद रहे दूसरों के लिए जब भाजपा अछूत हुआ करती थी, उस समय से वे पार्टी के लगातार सांसद हैं. पार्टी में संगठन-सत्ता से कोई भी उनके पक्ष ने बयान तक नहीं दिया. सोचा ना था जिस आंतरिक लोकतंत्र की दुहाई दी जाती थी, हमेशा कहा जाता था की सत्ता नहीं संगठन सर्वोपरि है, कीर्ति आजाद के मामले में संगठन की खामोशी क्यों ? ये कुछ ऐसे सवाल है जो आम कार्यकर्ता को आज भी सोने नहीं देते हैं, क्या ऐसी ही परिस्थिति के लिये मैंने जीवन के चार दशक होम कर दिये... ....और मेरे जैसे लाखों लोगों ने भी.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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