गरियाने से मिथिला का विकास हो जाता है तो आईये हम सब मिलकर सियार की तरह हुँआ-हुँआ करें

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 04/14/2018 - 12:02

"खट्टरकाका" की डायरी से
Vijay deo jha

हुलेले करने से अगर मिथिला राज बन जाता है मिथिला का विकास हो जाता है. बिना इतिहास की जानकारी रखे  गरियाने से मिथिला का विकास हो जाता है तो आईये हम सब मिलकर सियार की तरह हुँआ-हुँआ करें. चुनाव का समय नजदीक है तो फाँकीबाज दिल्ली में मिथिला के विकास और रोडमैप पर सेमिनार करेंगें. तमगा देने में पैसा खर्च नहीं होता है इसलिए कुछ लोग भावविभोर होकर एक नेता को मिथिला का दुसरा ललित नारायण मिश्र कह प्रचारित कर रहे हैं. यह अलग बात है की उन्होंने  ललित बाबू के योगदान की रत्ती भर समझ  होगी. केंद्र में मोदी सत्ता में हैं और बिहार में नितीश कुमार तो उनको मिथिला की दुर्दशा के लिए गरियाया जा सकता है. यह वही मैथिल हैं जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को चुनाव में मुंह के बल गिरा दिया था. वह चुनाव ठीक उसके बाद हुआ था जब अटलजी ने मैथिली को संविधान के आठवें अनुसूची में शामिल करने और कोशी पर पुल बनाने की पुरानी माँग को पूरा किया था. मुझे भाजपा के छपरिया संस्करण पर आपत्ति है. मेरी आपत्ति और विरोध कांग्रेस से बचपन से है. कोशी बाँध का पैसा नेहरूजी  पंजाब लेकर चले गए. नेहरूजी को मिथिलाराज से घृणा थी और इसलिए जानकीनन्दन सिंह को राजनितिक बनवास झेलना पड़ा. मैथिली की हकमारी कोंग्रेसी जग्गनाथ  ने की.

लेकिन मिथिला के उद्योग धंधे के विनाश के बहस के बीच में उन शातिर बामपंथ और सोसलिस्ट के करतूतों की कभी चर्चा नहीं की गयी. इसे बौद्धिक बेईमानी कहिये या  इतिहास  समझ का अभाव.  सौ साल पुरानी एक श्वेत श्याम झोपडी इस शातिरपन का उदहारण है. दरभंगा जिले के लहेरिया सराय की यह तस्वीर जहाँ पर एक पुस्तक भंडार हुआ करता था. मैथिली के अनन्य सेवक, प्रकाशक और सन्त परंपरा के रामलोचन शरण जो हिन्दी के अध्यापक भी थे ने इसी जगह से मैथिली आंदोलन का प्रचार प्रसार किया था. यह भारत का सबसे बड़ा पब्लिकेशन हाउस हुआ करता था.  अब शायद पुस्तक भंडार नहीं रहा लेकिन कहानियाँ और दस्तावेज अभी भी कुछ लोगों के मन मस्तिष्क में शेष हैं. विशेष पढ़ने से पहले यह समझ लीजिए कि मैथिली साहित्य के हाश्य सम्राट हरिमोहनझा इन्हीं रामलोचन शरण की खोज थे.

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 स्मरणलोप के ग्रसित मैथिलों के लिए रामलोचन शरण  की तस्वीर दे रहा हूँ. रामलोचन शरण सीतामढ़ी के रधौर गाँव के रौनियार वैश्य कुल के महगु साह के पुत्र थे. उस समय लहेरिया सराय पुस्तक भंडार की वजह से हिंदी और मैथिली के मूर्धन्य बिद्वानों और साहित्यकारों का तीर्थस्थल हुआ करता था. जो लोग मैथिली को ब्राह्मण और कायस्थ की भाषा कह कर प्रचारित करते रहे हैं, चूंकि वह खुद बहुत बड़े जातिवादी हैं इसलिए उन्होंने रामलोचन शरण के एकनिष्ठ सेवा को कभी जनसामान्य के बीच लाने ही नहीं दिया.

वह मिथिला नाम की पत्रिका चलाते थे मिथिलाक्षर का पहला प्रिंटिंग फरमा उन्होंने ही तैयार करवाया था. संभवतः उगना महादेव ने रामलोचन बाबू को महाकवि विद्यापति के साहित्य और जीवन को जन सामान्य के बीच लाने के लिए ही चुना था. लहेरियासराय का विद्यापति हाई स्कूल के स्थापना और विद्यापति पर्व मनाने की परंपरा के साथ साथ उन्होंने खुद को विद्यापति को ही समर्पित कर दिया---विद्यापति पदावली, विद्यापति प्रेस, विद्यापति पंचांग.

पता नहीं कि किसी के पास उनकी रचित मैथिली श्रीरामचरित मानस सुरक्षित है भी या नहीं, रामलोचन बाबू ने तुलसीदास के सभी ग्रंथ व साहित्य का मैथिली रूपांतरण किया था. इस उन्नत पब्लिकेशन हाउस को बर्बाद करने का श्रेय नदारी गांव के एक मैथिल सोसलिस्ट कुलानंद वैदिक को जाता है. 1947   वैदिक ने ऐसा हड़ताल करवाया की रामलोचन बाबू को हमेशा  के लिए प्रकाशन बंद कर देना पड़ा. हजारों बेरोजगार हो गए लेकिन  सोशलिस्टों को इससे क्या मतलब. इस की साथ-साथ रामलोचन बाबू की आयुर्वेदिक औषधि की फैक्ट्री हिमालय आयुर्वेद को बंद करवा दिया गया. हम लोगों में से बहुतेरों ने कभी कुलानन्द वैदिक का नाम इससे पहले  नहीं सुना होगा. लेकिन मैंने  रामलोचन शरण  के नाम से सभी परिचित हैं. एक ने सृजन में ऊर्जा लगायी और  दूसरे ने विनाश में.

वामपंथियों और सोशलिस्टों ने मिथिला के अन्य उद्योगों की यही हालत की. मिथिला के चीनी मिल को सोशलिस्ट सूरज बाबू घोर कर पी गए.  इन लोगों ने इतने हड़ताल करवाए की  मिल की हालत खस्ता हो गयी. इन्होने पंडौल के कपड़ा उद्योग की कामद तोड़ डाली. लेकिन चीनी मिलों की बर्बादी में बिहार के कुछ कॉंग्रेसी नेताओं ने अग्रणी भूमिका निभाई. इस बात की तस्कीद स्वयं तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू कर गए थे जब उन्होंने पटना में आम सभा के दौरान अपनी पार्टी के नेताओं को छोआ चोर लोहा चोर कहा था. उस दौरान छोआ घोटाले का मामला प्रकाश में आया था. मिथिला के चीनी मिल को इसलिए बर्बाद किया गया ताकि महाराष्ट्र के चीनी मिल फल फूल सकें.

कभी हायाघाट का अशोक पेपर मिल अपने बेहतरीन कागज़ उत्पाद के लिए जाना जाता था जिसका पुरे उत्तर और पूर्वी भारत के कागज़ बाजार पर कब्ज़ा था. बामपंथियों की नजर पड़ी. उमाधर सिंह मजदुर आंदोलन के नेता बन उभरे. मिल बंद हो गयी कर्मचारी बेरोजगार हो गए. मामला कोर्ट तक गया कोर्ट ने कहा की बकाया पगार दो और मिल को पुनः चालु करने का उपक्रम किया जाए. फिर उस उपक्रम के नाम पर भी घोटाला हुआ. उधर नितीश कुमार के किसी कृपापात्र की मिथिला के चीनी मिल की महँगी मशीन और जमीन पर कृपा दृष्टि पर गयी. जिन्हें यह अपेक्षा की वामपंथी और उसके बादरायण ब्रदर्स सोशलिस्ट और मगध सरकार मिथिला का हित करेंगें वो इतिहास पढ़ लें. इधर नितीश कुमार मिथिला की पुण्य भूमि सिमरिया (बेगूसराय) को एक नए विश्वविद्यालय के माध्यम से मगध में विलय करने की जुगत कर रहे हैं. सिमरिया के मैथिल शेष मिथिला की तरह नियतिवादी और सहनशील नहीं होते हैं वह विरोध करना जानते हैं. उन्होंने अंग्रेज़ों के जहाज को चलने नहीं दिया था तो नितीश बाबू कहाँ टिक पायेंगें.

 डिस्क्लेमर: ये सभी चित्र मेरे बाबूजी के आर्काइव से हैं जो मैथिल अमैथिल मेरे इस दुर्लभ तस्वीर को चोरी करेगा उस पर बाद में अपना क्लेम ठोकेगा उसको पिल्लू फड़ेगा उसका सातो बिदिया नाश.

विजय देव झा के फेसबुक पेज से साभार

 

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