गोमिया उपचुनावः ना होगी विकास की बात, ना ही बहस में तब्दील होगा कोई मुद्दा, जातिगत समीकरण से ही होगी जीत की राह पक्की

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 05/12/2018 - 09:27

Akshay Kumar Jha
Gomia
: चुनावी भाषणों में भले ही उम्मीदवार विकास का राग अलापे. कोई कहेगा हमने विकास किया. कोई कहेगा हम विकास कर रहे थे, साजिशन हमें रोक दिया गया. कोई कह सकता है हमें मौका दें विकास की गंगा बहा देंगे. लेकिन जीत का ताना-बाना इन भाषणों से नहीं बुना जा सकता. जीत पक्की किसी चीज से होगी तो वो है जातिगत समीकरण. 3,000 से लेकर 80,000 तक के वोटरों वाली जाति पर उम्मीदवारों की नजर गिद्ध की तरह है. जहां एक तरफ उम्मीदवार क्षेत्र का दौरा और भ्रमण कर रहे होते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके गुड लिस्ट वाले समर्थक जातिगत समीकरणों का गुणा-भाग कर रहे होते हैं. गोमिया और सिल्ली दोनों क्षेत्र महतो बहुल्य क्षेत्र है. ऐसे में जाहिर तौर महतो वोटरों पर पकड़ बनाना सभी उम्मीदवारों के लिए चुनौती है. इसी महतो वोटर को देखते हुए आजसू ने गोमिया विधानसभा के लिए गठबंधन तोड़ लिया. लेकिन इस बार गोमिया में तीन महतो उम्मीदवार भी मैदान में हैं. ऐसे में चुनौती काफी कड़ी हो गयी है. 

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कुरमी वोटर कर सकते हैं विधायकी पक्की

उम्मीदवारों की नजर हर जाति विशेष की वोट पर है. इसमें सबसे ज्यादा उम्मीदवारों को जो जाति भा रही है, वो जाति है कुरमी. कुरमी वोट गोमिया विधानसभा में सबसे ज्यादा है. गोमिया विधानसभा में कुल वोटरों की संख्या करीब 2,68,000 है. इनमें 30 फीसदी वोटरों की संख्या कुरमी जाति विशेष की है. इस हिसाब से इनकी संख्या क्षेत्र में करीब 80,000 है. जो सबसे बड़ा हिस्सा है. इस जाति की तरफ से जिसे एक मुश्त वोट पड़ जाए. उसकी जीत पक्की है. इसी जाति विशेष का वोट प्रतिशत देख कर मैदान में इस बार अभी तक तीन उम्मीदवार कुरमी जाति से हैं. आजसू से लंबोदर महतो, जेएमएम से बबीता देवी और निर्दलीय पार्टी से उमेश महतो अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. तीन उम्मीदवारों के रहने से चुनावी दंगल में ट्विष्ट आ गया है. अब किसी भी सूरत में इस जाति विशेष का वोट किसी एक उम्मीदवार को नहीं मिल सकता. ऐसे में आजसू और जेएमएम को एंटी बीजेपी वोट अपने पक्ष में लाने की जरूरत है. जिसपर दोनों दल के उम्मीदवार काफी काम कर रहे हैं. 

आदिवासी-मुस्लिम वोटर दे सकते हैं मैनडेट
कुरमी जाति के वोट के बाद दूसरी जाति जिस पर सभी उम्मीदवारों की नजर है, वह है आदिवासी-मुस्लिम और एससी जाति का वोट. इन तीनों जातियों के वोट को कोई अकेला उम्मीदवार अपने पक्ष में नहीं कर सकता. लेकिन आधे वोटरों ने भी किसी एक पक्ष में वोट कर दिया, तो जीत सुनिश्चित है. एक अनुमान के मुताबिक गोमिया विधानसभा क्षेत्र में 50,000 आदिवासी वोटरों की संख्या है. एससी वाटरों की संख्या यहां करीब 30,000 बतायी जा रही है और मुस्लिम वोटरों की संख्या करीब 25,000 है. ऐसे में इनकी संख्या करीब 1,10,000 हो जाती है. एससी वोटरों को अगर छोड़ दिया जाए तो आजसू और जेएमएम के उम्मीदवार पूरी शिद्दत से आदिवासी-मुस्लिम के वोट के अपने तरफ लाने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों पार्टियों का यह मानना है कि इस समुदाय का वोट बीजेपी को नहीं मिलेगा. लेकिन यह कहना भी अभी जल्दबादी होगी. क्योंकि पिछले बार विधानसभा चुनाव में इन वोटरों के वोट माधव लाल सिंह को मिले थे. 

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यादव, प्रजापति और तेली वोटर भी लुभा रहे हैं उम्मीदवारों को 
जिस जाति के वोटरों की संख्या विधानसभा क्षेत्र में कम है, उस पर सभी उम्मीदवारों की पैनी नजर है. इनमें यादव, प्रजापति, तेली, करमाली, रवानी और घटवार जाति के वोट हैं. एक अनुमान के मुताबिक क्षेत्र में यादव जाति के 5000, प्रजापति के 11,000 और तेली समुदाय के 15000 वोट हैं. दूसरी तरफ करमाली, रवानी और घटवार जाति के वोटरों की बात करें तो उनकी संख्या 15,000 से ज्यादा है. इन सभी जातियों की मिला कर करीब 45,000 वोटर क्षेत्र में हैं. लेकिन इन वोटरों पर किसी एक का बस नहीं है. वोटर बंटे हुए हैं. इसलिए किसी उम्मीदवार को इनके तरफ से एक मुश्त वोट पड़ना मुश्किल है. 

सिर्फ शहरी क्षेत्रों में हैं फॉरवर्ड
फॉरवर्ड जाति विशेष की वोट की बात करें तो बमुश्किल इनकी संख्या गोमिया विधानसभा में 13,000 होगी. वो भी ग्रामीण इलाकों में यह ना के बराबर है. कसमार के कुछ हिस्सों में ब्राह्मणों की संख्या है. लेकिन ज्यादातर फॉरवर्ड शहरी क्षेत्र जैसे स्वांग और आईएएल के क्षेत्रों में हैं. इन वोटरों पर डोरे डालने से अच्छा है कि उम्मीदवार ऐसे जाति विशेष के वोटरों पर डोरे डालेंगे जहां से इन्हें ज्यादा फायदा होगा. 

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