संक्षेप में जानें क्या लिखा है पत्र में चीफ जस्टिस को चार वरिष्ठ जजों ने

Publisher NEWSWING DatePublished Fri, 01/12/2018 - 15:08

New Delhi: सुप्रीम कोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश जे चेलामेश्वर और अन्य तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों ने न्यायपालिका से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर आज संवाददाता सम्मेलन किया. यह ऐतिहासिक रूप से भारत में पहले कभी नहीं हुआ था. न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एम बी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा द्वारा मामलों के आवंटन समेत कई मामले उठाये. उन्होंने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा है.

न्यायमूर्ति चेलामेश्वर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और बीते दिनों में बहुत कुछ हुआ है. जब तक इस संस्था को संरक्षित नहीं किया जाता, इस देश में लोकतंत्र जीवित नहीं रहेगा. हमने भारत के चीफ जस्टिस को समझाने का प्रयास किया कि चीजें सही नहीं हैं. दुर्भाग्यवश हम असफल रहे. वहीं न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि कोई भी वरिष्ठता को लांघ नहीं रहा और हम देश के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं.

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संक्षेप में जाने क्या लिखा है पत्र में -

आदरणीय मुख्य न्यायाधीश,

बेहद निराशापूर्वक और दुख के साथ हम आपको पत्र लिख रहे हैं. पिछले कुछ न्यायिक आदेशों से पूरी न्यायिक व्यवस्था और हाईकोर्ट की स्वायत्तात प्रभावित हो रही है. इसका असर चीफ जस्टिस के प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी पद रहा है.

देश में तीन, बॉम्बे, कलकत्ता और मद्रास हाईकोर्ट की स्थापना के समय से ही न्यायिक प्रशासन की अपनी एक परंपरा रही है. सुप्रीम कोर्ट से करीब 100 साल पहले से ये नियम हाईकोर्ट में लागू हैं. चीफ जस्टिस को जजों का रोस्टर बनाना होता है.

उनमें से एक स्थापित सिद्धांत के तहत चीफ जस्टिस को केसों के बंटवारे का अधिकार है. यह उनका कार्यक्षेत्र है कि वे किन जजों/बेंच को किस केस की सुनवाई का जिम्मा सौंपते हैं, लेकिन इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि कानूनी या तथ्यात्मक रूप से अन्य जजों के उपर चीफ जस्टिस की सर्वोच्चता है.

ये सिद्धांत सभी जजों पर लागू होते हैं. यह इस देश के न्यायिक प्रशासन में बिलकुल साफ़ है कि चीफ जस्टिस केवल अपने साथी जजों में से प्रथम हैं. इससे ज्यादा कुछ और व्याख्या नहीं है. रोस्टर में सबकुछ तय है. ऐसे में किसी बेंच या कोर्ट द्वारा सुने जा रहे मामलों पर टिप्पणी सर्वोच्चता के अभिमान से प्रेरित लगते हैं, जबकि बेंच की संरचना और संख्या बल के आधार पर सम्मान होना चाहिए.

इन सिद्धांतों का उल्लंघन न्यायिक व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है. और इसके परिणाम न्यायिक संरचना की अखंडता को प्रभावित कर सकता है.

हमें दुख है कि तय दोनों नियमों का पालन नहीं हो रहा है. इसका असर हमारे देश के न्याय प्रशासन पर पड़ेगा. वह प्रभाव दीर्घकालिक होगा. जीफ जस्टिस केस असाइन करने में सेलेक्टिव व्यवहार कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा को शर्मिंदगी से बचाने के लिए हम खुले तौर पर अधिक नहीं कह रहे, लेकिन इस आचरण ने सर्वोच्च न्यायालय की छवि को नुकसान पहुंचाया है. हम आपसे कहना चाहेंगे कि 27 अक्टूबर 2017 को आरपी लथूरा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में जनहित को ध्यान में रखा जाये. इस मामले में मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर बिना देरी के तय हो.

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