झारखंड हाईकोर्ट : 2017-18 में दर्ज हुए 6273 पीआईएल, पेंडिंग 6276, सिविल और क्रिमिनल मिलाकर 90778 केस लंबित

Publisher NEWSWING DatePublished Mon, 04/23/2018 - 16:01

Akshay Kumar Jha
Ranchi:
झारखंड हाईकोर्ट में दायर होने वाला पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) यानी जनहित याचिका के आंकड़ें चौंकाने वाले हैं. पिछले साल यानी 2017-18 की बात करें तो जितने पीआईएल हुए, उससे तीन ज्यादा पीआईएल बीते वित्त वर्ष में पेंडिंग रह गये. रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय से लिये गये आंकड़ों के मुताबिक बीते वित्त वर्ष में कुल 6273 पीआईएल लोगों की तरफ से हाईकोर्ट में दायर किये गये. साल के अंत में पेंडिंग पीआईएल की संख्या 6276 बतायी जा रही है, जो दायर पीआईएल से तीन ज्यादा हैं. जबकि 6708 पीआईएल डिस्पोजल किये गये. हालांकि यह मालूम नहीं चल सका कि 2016-17 के कितने पीआईएल पेंडिंग थे, जिसे 2017-18 के आंकड़ों के साथ जोड़ा गया. जिन पीआईएल का डिसपोजल हुआ ,उसमें पेंडिंग केस ज्यादा हैं. ये सारे आंकड़े एक अप्रैल 2017 से लेकर 31 मार्च 2018 तक के हैं. 

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रांची में कौन करता है पीआईएल की सुनवाई 

आंकड़ों के साथ-साथ ये जानना भी जरूरी है कि दायर पीआईएल की सुनवाई कौन करता है. झारखंड हाईकोर्ट में नयी व्यवस्था बनने के बाद जो भी नये पीआईएल दायर हो रहे हैं. उनकी सुनवाई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीएन पटेल की डबल बेंच करती है. 2017-18 के पहले के जितने भी पीआईएल हैं उनकी सुनवाई कोर्ट नंबर12 के जज अपरेश कुमार सिंह को करनी है. यानी 2017-18 वित्त वर्ष में जितने पीआईएल हुए उन सबकी सुनवायी चीफ जस्टिस डीएन पटेल ही कर सकते हैं. दूसरा कोई जज नहीं. वहीं जितने क्रिमिनल केस की अपील होगी, उसकी सुनवाई कोर्ट नंबर तीन के जज एचसी मिश्रा करते हैं. 

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सख्त कानून न होने की वजह से होती है देर, कोर्ट कस सकता है नकेल

पीआईएल की सुनवाई में देरी होने की सबसे बड़ी वजह सरकार या पार्टी की तरफ से जवाब ना दे पाना होता है. ऐसे में पीआईएल पेंडिंग होने की संभावना बढ जाती है. दरअसल ऐसा कोई सख्त कानून ही नहीं है कि पार्टी को इतने दिनों की समय सीमा में जवाब देना है. समय सीमा ना होने की वजह अक्सर सरकारी मामलों में सरकार के संबंधित विभाग की तरफ से जवाब देने में देर की जाती है,  ताकि मामले अटके रहें. लेकिन कोर्ट चाहे तो पार्टी की तरफ से जवाब ना देने को गंभीरता से ले सकता है. रांची हाईकोर्ट में ही कई ऐसे मामले देखे गये हैं, जिसमें जवाब देने में देर किये जाने के बाद कोर्ट की तरफ से फटकार के साथ जुर्माना भी लगाया गया है. अभी हाल में ही कोर्ट ने नगर निगम के एक मामले की सुनवाई करते हुए निगम पर जवाब देने में देर किये जाने पर एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया था. जिसके बाद सरकार को कोर्ट की तरफ से एक अच्छा मैसेज गया था. वहीं कोर्ट अगर चाहे तो जवाब ना देने की सूरत में सबूत के आधार पर फैसला सुना सकता है. यह सिर्फ और सिर्फ कोर्ट की मर्जी पर निर्भर करता है. ऐसा मामले भी रांची हाईकोर्ट में देखे गये हैं कि जवाब देने में देर करने की वजह से कोर्ट ने सबूत के आधार फैसला सुनाया हो. 

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एक नजर हाईकोर्ट पर

जजों के स्वीकृत पदः 25

फिलहाल कार्यरत जजः 17

लंबित सिविस केसः 46623

लंबित  क्रिमिनल केसः 44155 

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आखिर कैसे होता है पीआईएल

पीआईएल फाइल होते ही सबसे पहले पीआईएल नंबर मिलता है. उसके बाद उसे डिफेक्ट सेक्शन भेज दिया जाता है. डिफेक्ट सेक्शन में पीआईएल की जांच की जाती है. वहां देखा जाता है कि पीआईएल में कुछ मिसिंग तो नहीं है. यहां से फिर पीआईएल को लावाजिमा भेज दिया जाता है. यहां पीआईएलकर्ता पीआईएल में कुछ मिसिंग होने पर या डिफेक्ट होने पर उसे ठीक करता है. यहां से सीधा पीआईएल सुनवाई के लिए भेज दिया जाता है.

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