खतरे में है झारखंड की पंचायती राज व्यवस्था

Publisher NEWSWING DatePublished Mon, 05/21/2018 - 12:34

Kumar Sanjay

झारखंड के संदर्भ में अब यह साबित हो चुका है कि वर्तमान सरकार राज्य में विकेंद्रीकृत अभिशासन प्रणाली को सुनियोजित तरीके से समाप्त करने पर तुली हुई है. मुख्यमंत्री जी के आदेश पर राज्य के मंत्रीमंडल के द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि राज्य के सभी 32,000  गांवों में ग्राम विकास समिति तथा आदिवासी विकास समिति का गठन कर ग्रामीण विकास का कार्य किया जायेगा. छोटे-छोटे विकास कार्यों की जिम्मेदारी इन्हीं विकास समितियों के जिम्मे होगी. ये समितियां पांच लाख रुपए तक के काम कराएंगी. ग्रामीण विकास विभाग (पंचायती राज्य) के इस प्रस्ताव को 13 मार्च 2018 को कैबिनेट ने मंजूरी भी दे दी है. लेकिन इन समितियों का निर्माण और इनके माध्यम से ग्रामीण विकास का कार्य कराया जाना संविधान के 73वें संशोधन के खिलाफ तो है ही साथ ही यह झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में लागू 5वीं अनुसूची का भी खुल्ला-खुला उल्लंघन है.

झारखंड में पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने के बाद से राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों को विशेष गति देने के लिये ग्राम पंचायतों को ग्राम विकास से संबंधित आयोजन/ नियोजन और क्रियान्वयन का अधिकार और जिम्मा दिया गया है और इस पंचायती राज व्यवस्था को कानूनी मान्यता भी प्राप्त है, साथ ही राज्य के विभिन्न विभागों ने अधिसूचना जारी कर तमाम तरीके की संबंधित गतिविधियां भी पंचायतों को सौंपी है. लेकिन ठीक इसके उल्टे राज्य सरकार पंचायती राज संस्थानों को मजबूत करने के बदले में ग्राम विकास समिति तथा आदिवासी विकास समिति के माध्यम से मनमाने तरीके से नियम एवं कानूनों को ताक पर रखकर ग्राम पंचायत के अस्तित्व और इसकी उपयोगिता पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है.

राज्य सरकार के द्वारा झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001  की धारा 71 के अनुसार ग्राम पंचायतों की स्थायी समितियों का गठन कर उनको कार्य भी सौंपे गये हैं और इसके लिये पंचायती राज विभाग के द्वारा 16 मई 2011 को अधिसूचना भी जारी की गई थी. लेकिन इन सबके विपरीत पुन: इसी विभाग के द्वारा गैर-कानूनी  तरीके से ग्राम विकास समितियों को स्थापित किया जा रहा है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राज्य सरकार के इस निर्णय से राज्य में एक बिचौलियों का एक बड़ा वर्ग खड़ा हो जायेगा क्योंकि इन समितियों के बनते समय स्थानीय समुदाय, संवैधानिक संस्था ग्राम सभाऔर पंचायतों की कोई भूमिका नहीं है, साथ ही इनकी कार्यप्रणाली में ऐसे कई दोष हैं जिससे कि लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरणकी दिशा और कमजोर होंगीमसलन प्रखंड स्तरीय अधिकारियों को ही सारा प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार दिया गया है.

झारखंड 5वीं अनुसूची का इलाका है और आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका को सर्वोपरि माना गया है और इसके लिये 1996 में केंद्रीय कानून पेसा के तहत गांवों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिये ग्राम सभा को विशेष शक्तियां सौंपी गयी हैं. साथ ही झारखंड पंचायती राज अधिनियम की धारा 10 में भी ग्राम सभाओं को अधिकार एवं कार्य दिये गये हैं. पेसा कानून के तहत आदिवासी क्षेत्रों की विशेष जरूरतों का ध्यान रखते हुए ग्राम सभा को मजबूत करने पर विशेष ध्यान देने से ही स्थायी तौर पर क्षेत्र के लोगों का उत्थान हो सकता है. चौंकाने वाली बात यह है कि सरकार के द्वारा पेसा को लागू करने के लिये उचित व न्यायसंगत नियम ना बनाकर आदिवासी विकास समिति के माध्यम से पेसा कानून की मूल भावना को ही खत्म किया जा रहा है.

ज्ञात हो कि क्षेत्र के 100 से ज्यादा घर वाले गावों में 11 और 100 से कम घर वाले गावों में 9 सदस्यीय आदिवासी विकास समिति बनेगी. आदिवासी विकास समिति में एक अध्यक्ष, एक सचिव और एक कोषाध्यक्ष होंगे. अनुसूचित क्षेत्रों और 50 फीसदी से अधिक एसटी आबादी वाले गावों में आदिवासी विकास समिति और शेष गांवों में ग्राम विकास समितियों का गठन किया जाएगा. समितियों के गठन के लिए पंचायत सेवक गांव के व्यस्क सदस्यों की आमसभा बुलाई जाएगी. कार्यकारी अध्यक्ष आमसभा के माध्यम से समिति के पदाधिकारियों व सदस्यों का चुनाव आम सहमति से कराएंगे.  लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि झारखंड में आम-सभा की कोई धारणा ही नहीं है. आम सभा के नाम पर सरकारी अधिकारियों के द्वारा विभिन्न योजनाओं का निर्णय एवं संचालन किया जा रहा है. जिसमें स्थानीय निकायों की कोई भूमिका नहीं है. इस प्रक्रिया के द्वारा सरकार अपने ही द्वारा बनायी गई ग्रामसभा काम-काज नियमावली-2003 का विरोध कर रही है.

एक और महत्वपूर्ण बात है कि योजना के लिए 80 प्रतिशत राशि सरकार देगी और 20 प्रतिशत राशि ग्रामीण श्रमदान के रूप में देंगे.  लेकिन ग्रामीण निर्धन परिवार किस प्रकार इस योगदान में शामिल हो पायेंगे, इसमें भी संदेह है.

सबसे अलोकतांत्रिक कार्य सरकार यह करने जा रही है कि इन समितियों को प्रभावी बनाने के लिये सरकार 14वें वित्त आयोग की राशि जो पंचायतों को सीधे केंद्र के द्वारा हस्तांतरित की जाती है, उसमें भी संशोधन करने का मन बना चुकी है और इस संदर्भ में 9मई 2018 को ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव के द्वारा चिट्ठी भी सम्बंधित विभागों को भेज चुकी है.  वर्तमान सरकार चाहती है कि 14वें वित्त आयोग की अनुशंसा के अनुसार मिलने वाली राशि का मालिकाना हक भी इन समितियों के पास हो जो कि केंद्र के निर्देशों का भी उल्लंघन है. मनरेगा कानून के अनुसार मनरेगा योजनाओं की कम-से-कम 50 प्रतिशत राशि ग्राम पंचायतों के माध्यम से खर्च होनी चाहिए. परंतु सरकार की मंशा है कि इस राशि का खर्च भी ग्राम विकास समितियां करें जो कि एक असंवैधानिक कदम है.

सरकार की इन समितियों का सभी वर्ग के लोग विरोध कर रहे हैं तथा गांवों में भी समितियों को बनाने के क्रम में भी काफी विरोधाभास नज़र आ रहा है. लेकिन सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंग रही है. झारखंड के 4400 ग्राम पंचायतों में से 3000 से भी ज्यादा मुखिया सरकार के इस कदम से काफी नाराज चल रहे हैं और जगह-जगह प्रदर्शन भी हो रहे हैं. लेकिन नतीजा कुछ भी निकल नहीं पा रहा है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो झारखंड में पंचायती राज व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो जायेगी, जो कि किसी भी सरकार के लिये लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये घातक है.

लेखक राज्य संयोजक, गवर्नेंस प्रोग्राम, प्रदान, झारखंड हैं. यह उनके निजी विचार हैं.

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