कार्ल मार्क्स के 200 साल : क्रांतिकारी बदलाव की प्रासंगिक विचाराधारा

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 05/05/2018 - 17:11

Faisal Anurag

कार्ल मार्क्स ने न केवल समाज की नयी व्याख्या दी है, बल्कि उसे बदलने का रास्ता भी दिखाया है. दुनिया भर में यदि उनके विचार आज भी पूंजीवाद को चुनौती दे रहे हैं तो इसका कारण पूंजी  व्याख्या है.  पूंजी को समझने के लिए आज भी मार्क्सवाद ही एकमात्र वैज्ञानिक नजरिया है. दर्शन,राजनीति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मार्क्स की स्थापनाओं ने न केवल विचार के क्षेत्र में, बल्कि समाज और दुनिया को बदलने में ज्यादा प्रभावित किया है. दुनिया के हर कोने में यह एकमात्र विचारधारा है जिसका असर और अस्तित्व है. दुनिया के क्रांतिकारी बदलावों के आंदोलन का नेतृत्व यही विचारधारा कर रहा है. सोवियत संघ के विघटन के बाद भी मार्क्सवाद ही वह विचारधरा है जिससे पूंजीवाद सबसे ज्यादा घबराता है और इसे बदनाम करने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाता है. क्रांतिकारी बदलाव दरअसल एक वर्गसंघर्ष है, जिसे लंबा चलाना है. मार्क्स ने दुनिया के इतिहास के वर्गो के संघर्ष का इतिहास कहा है. दुनिया का सारा इतिहास  वर्ग संघर्ष का ही परिणाम है. इस संघर्ष की तार्किक परिणति पूंजीवाद का अवसान और समाजवाद की जीत है.

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कार्ल मार्क्स

मार्क्स के दर्शन ने प्रकृति के साथ समाज को समझने का नजरिया प्रदान किया है. मार्क्स कहते हैं कि हर वस्तु सतत गतिमान व परिवर्तन के निरंतर नवीकरण व विकास की अवस्था में रहती है, जिसमें सदैव कुछ उदित व विकसित होते रहता है. साथ ही कुछ का विलोप और ह्रास होता रहता है. यह प्रक्रिया दर्शन के क्षेत्र के साथ ही दूसरे क्षेत्रों में लगातार होती रहती है. मार्क्स ने मौलिक तौर पर दुनिया के बिखरे जनज्ञान को एकत्रित किया और उसे राजनीतिक सांस्कृतिक बदलाव का विचार बना दिया. मार्क्स ने ऐगेल्स के साथ मिल कर 150 साल पहले कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखा था. वह आज भी पूंजीवाद को चैन से सोने नहीं देता है.  

दुनिया के विचार,कला, संस्कृति सहित कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जिस पर मार्क्स के विचारों का गहरा प्रभाव नहीं है. मार्क्स का जन्म 5 मई 1818 को जर्मनी में हुआ था. बर्लिन यूनिवर्सिटी से उन्होंने  डॉक्टरेट किया. पत्रकारिता, शिक्षण सहित अनेक कार्य करते हुए अंततः उन्होंने दुनिया को बदलने का विचार प्रदान किया. मार्क्स के विचारों को लेकर पूंजीवादी दुनिया उसे चुका हुआ और अप्रासंगिक साबित करने की पूरजोर कोशिश कर रही है. मार्क्स के कुछ वैज्ञानिक निष्कर्षों को गलत साबित करने की कोशिश में अनेक तरह के भ्रम और भ्रांतियां पैदा की जा रही है. लेकिन पूंजीवादी तर्क स्वयं ही खारिज होते जा रहे हैं, क्योंकि वह पूंजी के गहराते संकट से निकलने का कोई स्थायी निदान नहीं निकाल पा रहा है. पूंजीवादी तंत्र की तमाम उपेक्षा के बाद भी मार्क्स की 200वीं जयंती पूरी दुनिया माना रही है और क्रांति के रास्ते की तलाश कर रही है. मेहनतकश वर्ग जानता है कि पूंजी मृत श्रम है, जो श्रमिकों का खून चूस कर जिंदा रहता है और यह जितना जिंदा रहता है उतना ही श्रमिकों का खून चूसता है. 

मार्क्स की विचारधारा गतिमान है. यही कारण है कि हर काल में हर परिस्थिति की वस्तुगत समझ का नजरिया मार्क्स ने प्रदान कर दिया है. मार्क्स के कैपिटल समय के साथ लगातार प्रासंगिक होते जा रहे हैं. इसका कारण यही है कि इस विचारधारा में गति है और अपने समय को अपनी परिस्थिति में विश्लेषित करने का तरीका प्रदान करती है. मार्क्स की कालजयी रचनाओं का निरंतर नया पाठ दुनिया कर रही है और अपने समय के हिसाब से उसे विश्लेषित कर रही है.

दर्शन और विज्ञान के साथ समाज विज्ञान के क्षेत्र में मार्क्स की स्थापनाओं का महत्व बना हुआ है. इसी तरह अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उन्हें खारिज करना संभव नहीं है. मार्क्स ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद,ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग संघर्ष और सर्वहारा के जनतंत्र के बारे में जो स्थापना दी है क्रांतिकारी बदलाव के सूत्र उसी में अंतर्निहित है. पूंजी, श्रम, मुद्रा और मजदूरी के बारे में उनकी व्याख्याएं अध्ययन का बुनियादी आधार है. धर्म के संदर्भ में उनकी मान्यताओं ने दुनिया में धर्मसत्ता को चुनौती दी है. सर्वहारा जनतंत्र ही वह आधार है जो सर्वहारा की तानाशाही के रास्ते विकसित होता है तथा पूंजी के वर्चस्व को खत्म करता है.

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