मोमेंटम झारखंड का फोर्थ ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी मना सरकार थपथपा रही अपनी पीठ, मगर रोजगार की तलाश में पाकुड़ से हर दिन पलायन कर रहे 200-300 मजदूर

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 04/28/2018 - 14:24

Sweta Kumari

Ranchi : साल 2017 में फरवरी का महीना झारखंड के लिये बेहद खास रहा था. क्योंकि 15  फरवरी 2017 को राजधानी रांची दुल्हन की तरह सजी थी. जिधर भी नजर जाये, उधर लाइटिंग और मोमेंटम झारखंड के चमचमाते पोस्टर नजर आ रहे थे. बैनरों से शहर पटा हुआ था. हर दीवार ऐसी सजी थी, जैसे रांची को मेंहदी रची हो. देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी कई बड़ी कंपनियों के मालिक झारखंड आये थे. आयोजन में 210 एमओयू हुए और 3,10,277 करोड़ के निवेश का करार कंपनियों ने किया. 11,000 से ज्यादा रजिस्टर्ड डेलिगेट्स आये, जिसमें 600 डेलिगेट्स विदेशी थे. कितना निवेश हुआ, निवेश के नाम पर कितने झूठ बोले गये, यह अब सब जानते हैं. बहरहाल, सरकार ने 27 फरवरी को देवघर में उसी मोमेंटम झारखंड का फोर्थ ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी मनाया. इसमें भी करोड़ों के निवेश और हजारों को रोजगार देने वादा सरकार की ओर से किया गया. पर उसी देवघर से 153 किमी दूर पाकुड़ जिला है. जहां से हर दिन 200 से 300 लोग पलायन कर रहे हैं. आप किसी भी दिन पाकुड़ रेलवे स्टेशन पर जाकर मजदूरों के पलायन करने का जायजा ले सकते हैं. 

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पाकुड़ स्टेशन से पलायन करते मजदूर

मोमेंटम के बाद जगी थी रोजगार की आस

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मोमेंटम झारखंड की तस्वीर

जिस दिन 15 फरवरी 2017 को झारखंड सरकार मोमेंटम झारखंड आयोजित कर रही थी. भव्य समारोह मना रही थी. उससे 15 दिन पहले ही दो फरवरी को मनरेगा दिवस था. झारखंड में मनरेगा मजदूरों की संख्या 78.53 लाख है. इनमें से 43.09 मजदूरों को जॉब कार्ड मिला हुआ है. जॉब कार्ड वाले 21.44 लाख मजदूर कार्यशील हैं. 27.18 लाख मजदूर कार्यशील हैं. वर्ष 2017 में मनरेगा मजदूरों की मजदूरी में बढ़ोतरी सिर्फ एक रुपया प्रति दिन किया था. फिलहाल झारखंड में पाकुड़ ही नहीं पूरे राज्य से लोग इसलिए पलायन कर रहें हैं, क्योंकि झारखंड में उन्हें रोजगार नहीं मिलता. मनरेगा के तहत एक तो काम मिलती नहीं, दूसरी काम मिलने पर जो मजदूरी मिलती है, उससे मजदूरों को परिवार चलाना मुश्किल होता है.

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 यहां भी लाखों की संख्या में मजदूर काम करते हैं. मोमेंटम झारखंड में हुए एमओयू के बाद ना सिर्फ राज्य के बेरोजगार युवा बल्कि मजदूरों में भी आस जगी कि उन्हें राज्य में बेहतर काम और अच्छा पैसा भी मिलेगा. लेकिन धरातल पर यह हकीकत एक साल बाद भी सच साबित नहीं हो पाया. इसके अलावा साल 2017-2018 में मनरेगा मजदूरों की मजदूरी झारखंड सरकार ने महज एक रुपया बढ़ाई थी और 2018 में मजदूरी में किसी तरह का कोई इजाफा नहीं हुआ. वहीं इस वर्ष भी इसमें किसी भी तरह की वृद्धि नहीं की गई है. मनरेगा मजदूरों को राज्य में जो मजदूरी दी जाती है, वह न्यूनतम मजदूरी से भी कम है. ऐसे में झारखंड से मजदूर अब दूसरे राज्यों में पलायन करने लगे हैं. झारखंड में मनरेगा मजदूरों की मजदूरी 230 रूपये सरकार ने तय की हे. लेकिन मजदूरों को सिर्फ 168  रूपये ही मजदूरी मिलती है.  

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स्टेशन पर शाम को लगता है मेला

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ट्रेन के इंतजार में मजदूर

शाम के वक्त अगर पाकुड़ स्टेशन को देखा जाये तो नजारा किसी मेले सा लगता है. क्योंकि हर दिन लगभग 300 से ज्यादा मजदूर जो लिट्टीपाड़ा और अमरापाड़ा से आते हैं , वे रोजगार के लिये  परिवार सहित पश्चिम बंगाल के वर्धमान चले जाते हैं. वहां ये मजदूर परिवार सहित धान कटाई के अलावा और दूसरे काम करते हैं और पैसे कमाकर फिर तीन महीने बाद वापसी करते हैं. जब इनके कमाये पैसे खत्म होने लगते हैं तो फिर से ये पलायन करते हैं. 

राज्य की रघुवर सरकार विकास के दावे करती है और कौशल विकास के अंतर्गत 25 लाख रोजगार देने की बात करती है. लेकिन अब तक सिर्फ 25 हजार को ही नियुक्ति पत्र बांट पायी है. सरकार का दावा है कि राज्य में मनरेगा के अंतर्गत मजदूरों को रोजगार मिल रहा है और वह सुखी हैं. लेकिन पाकुड़ स्टेशन का नजारा हर शाम चीख-चीखकर सरकार की सारी सच्चाई और दावे को बयां कर रहा है. पाकुड़ में कोल बलॉक के बंद होने के बाद से ही मजदूर ऐसे ही दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं.

बात करते हुए फफक पड़े मजदूर

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पलायन करते मजदूर

पलायन कर रहे मजदूरों से जब न्यूज विंग की टीम ने बात की तो उनकी साफ कहना था कि , झारखंड में काम नहीं मिल रहा तो परिवार चलाने के लिये पलायन करना ही एकमात्र उपाय है. कई मजदूरों ने तो यहां तक कहा कि राज्य की रघुवर सरकार सिर्फ मजदूरों और गरीबों के हित की बात करती है, लेकिन हमें कोई सुविधा नहीं मिल रही, ना तो बच्चों की पढ़ाई है और ना पेटभर खाना. ऐसे में परिवार के साथ पलायन करना ही एकमात्र सहारा है. जिससे हम कम से कम दूसरे राज्य में कमाकर अपना परिवार चला पा रहे हैं. न्यूज विंग टीम से एक महिला मजदूर बात करती हुई फफक पड़ी और बस इतना ही कह पायी कि राज्य में आदिवासियों का शोषण किया जा रहा है, साथ ही उसने बताया कि उसके पति के मरने के बाद वह पलायन करके ही अपनी और बच्चों का पेट मुश्किल से पाल रही है और कभी तो बच्चों को पानी पिलाकर ही सुलाना पड़ता है.

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कब सुनेगी सरकार

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ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा

पाकुड़ स्टेशन की जो तस्वीरें और वीडियो सामने आयी हैं, उसे देखने के बाद रघुवर सरकार भी अपने दावों पर यह सोचे कि आखिर जब झारखंड में मनरेगा के तहत मजदूरों को काम मिल रहा है तो आखिर ऐसी कौन सी वजह है कि मजदूर यहां से पलायन कर रहे हैं. साथ ही सरकार में बैठे ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा भी पलायन कर रहे मजदूरों पर अपनी नजरें इनायत करें. ताकि वह पलायन ना करें.     

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