पलामू: राजनीतिक कारणों से फीका हुआ ऐतिहासिक दुबियाखांड़ कुंभ मेला, मेले में दिखी आदिवासी संस्कृति-परिसपंतियों का वितरण

Publisher NEWSWING DatePublished Sun, 02/11/2018 - 17:29

Daltonganj : पलामू जिला मुख्यालय डालटनगंज से करीब 10 किलोमीटर दूर रांची पथ पर दुबियाखांड़ के पास रविवार से दो दिवसीय आदिवासी कुंभ मेले की शुरूआत की गयी. मेले में जहां परिसंपतियों का वितरण किया गया, वहीं आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिली. प्रत्येक वर्ष यहां 11 फरवरी को दो दिवसीय आदिवासी कुंभ मेले का आयोजन किया जाता रहा है.

सरकारी योजनाओं से लाभान्वित हुए लोग 

मेले में विभिन्न विभागों द्वारा लाखों की परिसम्पतियों का वितरण किया गया. साथ ही मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत सामूहिक विवाह का भी आयोजन हुआ. गौरतलब है कि मेले में बतौर मुख्य अतिथि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री रामचन्द्र चन्द्रवंशी उपस्थित थे. कार्यक्रम में भाग लेने के लिए मुख्यमंत्री रघुवर दास को आमंत्रित किया गया था, लेकिन व्यस्तताओं के कारण वे इसमें भाग नहीं ले सकेंगे. मेले में बतौर मुख्य विशिष्ट अतिथि क्षेत्रीय विधायक आलोक चैरसिया उपस्थित थे. उनके अलावा जिला परिषद अध्यक्ष प्रभा देवी और उपाध्यक्ष संजय सिंह ने भी अपनी भागीदारी निभायी.

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गौरवशाली रहा है मेला 

अगर मेले के इतिहास पर नजर दौड़ायें तो यह काफी गौरवशाली रहा है. एक समय था, जब इस मेले की भव्यता के चर्चे न केवल अपने राज्य में बल्कि दूसरे राज्यों में भी सुनायी पड़ती थी, लेकिन अब मेले का वह शोर स्मृति-शेष बनकर रह गया है. अविभाजित बिहार में राजस्व मंत्री रहे इंदर सिंह नामधारी ने कुंभ मेले की तर्ज पर दुबियाखांड़ में आदिवासी कुंभ मेले की अपनी परिकल्पना को साकार किया था. इस कड़ी में सबसे पहले 1994 में श्री नामधारी ने पलामू के बेहद लोकप्रिय राजा मेदिनीराय (इन्हीं के नाम पर डालटनगंज का नाम मेदिनीनगर पड़ा) की प्रतिमा दुबियाखांड़ में स्थापित करायी और इस स्थल पर हर वर्ष आदिवासी कुंभ मेले (राजस्व मेला) के आयोजन की घोषणा की. उसके बाद हर वर्ष राजा मेदिनीराय की स्मृति में 11-12 फरवरी को वृहद मेले का आयोजन होने लगा.

आदिवासियों के विकास के लिए होता है मेला

आदिवासियों के सर्वांगीण विकास को मूर्त रूप देने के लिए इस मेले की बुनियाद रखी गयी थी. मेले को बहुद्देशीय बनाना था, जहां वनवासियों के लिए संचालित योजनाओं को मूर्त रूप दिया जा सके. श्री नामधारी चाहते थे कि वनवासियों के बीच पट्टे का वितरण मेले के दौरान हो, लाभुकों के बीच परिसंपतियों का वितरण हो और आदिवासियों को भी मुकम्मल स्वास्थ्य सुविधा प्राप्त हो. इसी वजह से मेले की कमान जबतक श्री नामधारी के हाथ में रही, मेला स्थल पर स्वास्थ्य शिविर भी लगाया जाता रहा, जहां रांची के चिकित्सकों की टीम इलाज किया करते थे. मेले के आकर्षण का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसके कवरेज के लिए देश के अन्य राज्यों से भी मीडिया की टीमें आया करती थीं.

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कई मुख्यमंत्री बने मेले के गवाह

जबतक मेले के आयोजन में श्री नामधारी ने अपनी दिलचस्पी बनाये रखी, तबतक इसकी ख्याति राज्य और देश में गूंजती रही. खासकर बिहार और झारखण्ड में इस मेले को काफी लोकप्रियता हासिल हुई. यही वजह है कि मेले के उदघाटन समारोह में अविभाजित बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, झारखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा सरीखे नेता शिरकत कर चुके हैं.

मेले पर हावी हुई राजनीति

कई वर्षों तक आदिवासी कुंभ मेले के सफल आयोजन से नामधारी की लोकप्रियता बढ़ने लगी और इसी के साथ मेले को लेकर राजनीति शुरू हो गयी. नामधारी विरोधी यह आरोप लगाने लगे कि मेले का आयोजन वोट बैंक के लिए किया जा रहा है. विरोधियों के आरोप से नामधारी काफी कुंठित हुए और उन्होंने धीरे-धीरे इस मेले से किनारा कर लिया और मेले की कमान पहले डीआरडीए और बाद में जिला परिषद के हाथ चली गयी.

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