शराब के धंधे पर सरकारी सिंडिकेट का कब्जा, ठेंगे पर सरकारी नियम, बिना कैबिनेट की मंजूरी के बदल दिए जाते हैं कानून (1)

Publisher NEWSWING DatePublished Mon, 06/11/2018 - 16:14

-'गंदा' है पर 'धंधा 'है ये...

Akshay Kumar Jha

Ranchi: रघुवर सरकार ने 14 जुलाई 2017 को एक कानून पास किया. कानून के मुताबिक सूबे में शराब बेचने का काम अब सरकार को करना था. पूरे धंधे से प्राइवेट लोगों को बाहर कर दिया गया. ऐसा करने के पीछे सरकारी बयान आए कि इससे शराब व्यवसाय पर हावी सिंडिकेट का खात्मा हो जाएगा. सरकार नकली शराब बेचने पर रोक लगाएगी और सरकारी खजाने में इजाफा होगा. लेकिन इन तीनों बातों में से एक भी बात फिलवक्त पूरा होता नहीं दिख रहा है. शराब के व्यवसाय में प्राइवेट सिंडिकेट खत्म हुआ तो सरकारी स्तर पर ही सिंडिकेट खड़ा हो गया. कुछ महीने पहले 17 जान जाने के बाद यह साबित हुआ कि नकली शराब का धंधा राज्यभर में हो रहा है और जेएसबीसीएल (झारखंड स्टेट बिवरेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड) मुनाफे से काफी दूर है. भले ही सरकार जेएसबीसीएल के अधिकारियों को शराब नीति को सुधारने के लिए दूसरे राज्य भेजे. लेकिन जेएसबीसीएल को मुनाफा तभी संभव है, जब विभाग के कुछ अधिकारी अपनी जेब को भरने से ज्यादा जरूरी सरकारी खजाने को भरना समझे.

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कैबिनेट के नियम को दरकिनार कर लिया शॉप सुपरवाइजर को हटाने का फैसला

सरकार की तरफ से जो गजट तैयार हुआ, उसके कानूनों को बदला जा रहा है. गजट के नियमावली संख्या 23 में साफतौर से इस बात का उल्लेख है कि जेएसबीसीएल के खुदरा दुकानों में शराब की आपूर्ति के लिए दुकान पर्यवेक्षक (Shop Supervisor)  जिला उत्पाद कार्यालय में आवेदन देंगे. आवेदन के आधार पर अधीक्षक उत्पाद आयुक्त या सहायक उत्पाद परमिट निर्गत करेगा. परमिट के आधार पर शराब की आपूर्ति की जाएगी. इसका मतलब शॉप सुपरवाइजर जिस कंपनी की शराब और जितने मात्रा में निर्गत करने के लिए आवेदन देगा, उसी कंपनी की शराब और उतने मात्रा में शराब निर्गत की जाएगी. नियमावली संख्या 28 में साफ लिखा है कि एक शॉप सुपरवाइजर 10-15 दुकानों का समूह बना कर उनके लिए काम करेगा. सभी शॉप सुपरवाइजर आर्मी से रिटायर्ड जेसीओ होंगे. अगर इनका काम संतोषजनक नहीं रहा तो, सहायक आयुक्त या अधीक्षक उत्पाद इन कर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई की अनुशंसा जेएसबीसीएल से करेंगे. अनुशंसा पर जेएसबीसीएल को संज्ञान लेगा और प्रशासनिक कार्रवाई करेगा. लेकिन इस मामले में कैबिनेट के फैसले को दरकिनार कर जिस तरह का फैसला जेएसबीसीएल की तरफ से लिया गया वो चौंकाने वाला है.

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जीएम फाइनेंस ने आदेश निकालकर शॉप सुपरवाइजर की नियुक्ति ही रद्द कर दी

कैबिनेट के फैसले और सरकार के गजट के कानून को ठेंगा दिखाते हुए जेएसबीसीएल ने एक नायाब काम किया. जेएसबीसीएल ने जीएम फाइनेंस मनोज कुमार के हस्ताक्षर से एक आदेश निकला. आदेश में सभी शॉप सुपरवाइजर की संविदा एक महीने की नोटिस के बाद खत्म कर देने को कहा गया. आदेश में कहा गया कि जिलों में खुदरा दुकानों के सफल संचालन के लिए रिटायर्ड जेसीओ (शॉप सुपरवाइजर)  की नियुक्ति जिस काम के लिए की गयी थी, उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा है. इसलिए व्यवसायिक हितों के लिए सभी शॉप सुपरवाइजर की संविदा खत्म करने का निर्णय लिया जाता है. संविदा समाप्त होने की तारीख नोटिस के एक महीने बाद की होगी.

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एक भी अनुशंसा जिले से नहीं आया, फिर भी संविदा खत्म करने का आदेश

कैबिनेट से पास नियमावली की बात करें तो उसमें शॉप सुपरवाइजर के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई करने से पहले सहायक उत्पाद आयुक्त या अधीक्षक उत्पाद को जेएसबीसीएल को अनुशंसा करना था. अनुशंसा के बाद जेएसबीसीएल इस पर संज्ञान लेता. लेकिन बिना किसी अनुशंसा के ही शॉप सुपरवाइजर के पद को ही खत्म कर दिया गया. न्यूज विंग के पूछे जाने पर जीएम फाइनेंस मनोज कुमार की तरफ से एक भी अनुशंसा की कॉपी नहीं दिखायी गयी. उन्होंने कहा कि बैठक में जेएसबीसीएल के आला अधिकारियों ने शॉप सुपरवाइजर के काम करने के तरीकों पर सवाल उठाए और मौखिक रूप से उनकी संविदा खत्म करने का निर्देश दिया गया. जिसके बाद आदेश निकाला गया है. साथ ही कहा गया कि ये जरूरी नहीं है कि कैबिनेट के आदेश को जेएसबीसीएल माने. मुनाफा के मद्देनजर जेएसबीसीएल किसी भी तरह के फैसले को करने के लिए स्वतंत्र है. श्री कुमार ने कहा कि मेरे हस्ताक्षर से आदेश निकाला गया है, लेकिन आदेश मेरा नहीं है, आला अधिकारियों का है.    

कल पढ़ें: आखिर जिला स्तर पर सहायक आयुक्त का औचित्य क्या है

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