साहब, आप बता दिया कीजिए कि मंदिर जायेंगे, उस दिन हमलोग नहीं जायेंगे

Publisher NEWSWING DatePublished Mon, 05/21/2018 - 13:31

मूकदर्शक

इतवार का दिन यानी हम जैसे सामान्य नौकरी-पेशा वाले लोगों के लिए सप्ताह का वो एक मात्र पूरा दिन, जिसे परिवार के साथ बिताया जाता है. फैमिली और बच्चों की डिमांड्स पूरी की जाती है. मगर  इतवार (20 मई) ऐसा कुछ नहीं हो पाया क्योंकि हमारे कार्यक्रम के साथ-साथ साहब का भी कार्यक्रम तय हो गया था. 

हम शहर (रांची) से कुछ दूर स्थित विख्यात माता के मंदिर जाने वाले थे.  इस बात से बेखबर कि साहब भी वहां जायेंगे. हम घंटे भर का सफर तय करके उस आध्यात्मिक माहौल में प्रवेश करने ही वाले थे कि बंदूकधारकों को देखकर चौंक गए. मंदिर से करीब ड़ेढ़ किमी. पहले, वहां ऐसा नजारा पहले कभी देखा नहीं था.  मंदिर में प्रवेश करने को व्याकुल सैंकड़ों लोगों की गाड़ियों की लंबी कतार ने हमारी रफ्तार पर जबरदस्त ब्रेक लगा दिया. कछुए की स्पीड से सरकती गाड़ियां और कदम-कदम पर खडे़ बंदूकधारक के कारण आमलोगों के दिल-ओ-दिमाग में बसा वह आध्यात्मिक क्षेत्र का रास्ता, आतंकित क्षेत्र लगने लगा. पूछने पर मालूम हुआ कि आज साहब भी दर्शन करेंगे, 10 बजे का टाईम है. इसलिए यह (कु) व्यवस्था है. वाहन को करीब डेढ़ किमी पहले ही रोकवा दिया गया. कहा गया पैदल ही जाईये. साहब, आप समझ सकते हैं वहां जाने वालों में सब न तो आप जैसे हेल्दी हैं और न ही आपके साथ चलने वाले  हट्टे-कट्टे कमांडो.  बुढ़े-बुजुर्ग, बच्चे व महिलाएं भी होती हैं. जरा सोचियेगा, वह कैसे मंदिर तक पहुंचे होंगे. और कैसे वापस वाहन तक आये होंगे, क्योंकि सीधा खड़ी चढ़ाई है. एक बार सोचियेगा जरुर कि उनके मन में आपके बारे में कैसे-कैसे ख्याल आ रहे होंगे.

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बहरहाल, सरकते-सरकते किसी तरह कुछ दूर और आगे गया,  लेकिन फिर भी उस जगह पर नहीं पहुंच पाया, जहां सामान्यतः पहुंचा जाता था. मंदिर का प्रांगण, छावनी में बदला हुआ मिला. कदम-कदम पर खड़े बंदूकबाज. कभी दुकानदारों को हड़काते, कभी लोगों को खरीददारी करने से रोकते, तो कभी दुकान बंद करने का दबाव बनाते. खुद को लगा जैसे कारगिल बाॅर्डर पर खड़ा हूं और अब बिना वीसा-पासपोर्ट के आगे नहीं जा पाउंगा.
सामान्य भक्तों की दशा तो पूछिए मत. लंबी लाइन में खड़े भक्त, पसीने से तर-बतर इधर-उधर छटपटाते हुए घूम रहे थे. सभी गेट पर तैनात. कोई थोड़ी पहुंचवाला भक्त हो, तो जुगाड़ लगाने की कोशिश में इधर-उधर हो रहा था. दरअसल, साहब और उनके शार्गिदों के दर्शन करने तक, सामान्य भक्तों के लिए माता का दर्शन लगभग बंद था. एक भक्त ने तो यहां तक कह डाला कि इतनी फौज लेकर कोई माता से मिलने आता है, पता नहीं किस मद में चूर है. दूसरे ने कहा, अरे भाई ये महिषासुर है, इतनी फौज लेकर एक बार वही आया था.

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निराश भक्तों के पास और कोई चारा नहीं था, सिवाय लौट जाने के. कड़कड़ाती धूप में लंबी कतार में खड़े बच्चे, महिलाएं, बुजूर्ग और आदमी को उस नयी व्यवस्था ने सिर्फ बेवकूफ बनाया. उनकी आस्था के साथ खिलवाड़ हुआ. करोड़ों का रहनुमा, लाखों का खर्च करके, सैंकड़ों सामान्य भक्तों की मुसीबत का कारण बनके माता को खुश करने गया. लेकिन हुआ क्या ? अहंकारियों से माता भी कभी खुश हुई हैं क्या ? अब इसे पूजा काअसर कहिए या कुदरत का कहर, उसी दिन शाम को शहर में आंधी आई, बिजली कड़कड़ाई, तेज बारिश हुई और कुछ लोगों की मौत हो गई. 

साहब, आप तो छोटी से छोटी बातों को भी अखबारों के पहले पेज पर बड़े-बड़े अक्षरों में छपवाने के लिए मशहूर हैं, होर्डिंग्स लगाकर बताने के लिए मशहूर हैं, फिर आप इतनी बड़ी जानकारी को सार्वजनिक करने से कैसे चूक गए. साहब एक गुजारिश है कि अब आप जब भी कभी मंदिर जाने का कार्यक्रम बनायें तो अखबार में विज्ञापन डलवा दें, टीवी-रेडियो पर बता दें कि आप किस मंदिर जायेंगे, यकीन मानिए, हमलोग उस दिन उस मंदिर में नहीं जायेंगे.

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