संतालपरगना में संस्कृति के रंग बिखरे, छटियर मनाने में जुटा संताल समाज

Publisher NEWSWING DatePublished Sun, 03/04/2018 - 15:23

DUMKA:  झारखंड की सांस्कृतिक भावधारा काफी समृद्ध रही है। संताल समुदाय में विभिन्न रीति-रिवाजों, जीवनशैली एवं समाजिक संस्कारों का निर्धारण अनुभवजन्य ज्ञान पर आधरित है. समाज के जीवन-संस्कार को त्योहार की तरह मानाया जाता है. इन दिनो संतालपरगना में संथाल समुदाय छटियर मनाने में जुटा है, जिसका संताल समाज में महत्वर्पूण स्थान है. समाज में मनाया जानेवाला यह महोत्सव समाज में ऊर्जा का संचार करता है. छोटे-छोटे पर्व-त्योहारों के जरिये समाज की एकजुटता भी निरंतर बनी रहती है.

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क्या है मान्यता छटियर के बारे में

संताल आदिवासियों की मान्यता है कि ''छटियर'' के बिना किसी भी संताल का शादी नही हो सकता है. एक मान्यता यह भी है कि अगर किसी महिला व पुरुष का ''छटियर'' नही हुआ है तो उनके द्वारा किसी भी प्रकार की पूजा इष्ट देवता और पूर्वज ग्रहण नही करते है. ''छटियर'' के बिना किसी भी व्यक्ति को सिरमापुरी (स्वर्ग) में जगह नहीं मिल सकती है. कभी बच्चा या वयस्क बिना ''छटियर'' के किसी कारणवश मृत्यु हो जाता है तो उसका अंतिम संस्कार करने के पहले उसका ''छटियर'' करना अति आवश्यक है. क्योंकि ऐसा नहीं करने पर उस बच्चे या वयस्क को सिरमापूरी (स्वर्ग) में जगह नहीं मिल पायेगी और उसकी आत्मा की शांति के लिये कोई भी भोग उस मृतक को नहीं मिल पायेगा. ''छटियर''  दो तरह के होते है.''जोनोम छटियर''  और ''चाचु छटियर'' .बच्चे के जन्म के तीन से पांच दिन के अन्दर बच्चों का  ''छटियर'' किया जाता है,तो उसे ''जोनोम छटियर''  कहा जाता है. जो बच्चे उस समय किसी कारणवश छटियर नही करा पाते है वे शादी के पहले तक अवश्य करा लेते है, जिसे ''चाचु छटियर''  कहा जाता है. ''छटियर'' बच्चा-बच्ची,पुरुष-महिला दोनों का होता है. इसमें इष्ट देवताओं और पूर्वजो के नाम से विनती-बाखेड़ (प्राथना) की जाती है.

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संथाल समाज में छटियर में क्या होता है

छटियार की तस्वीर
छटियार की तस्वीर

''छटियर'' में गांव के लिखाहोड़ (गांव को चलाने वाले) नायकी,मंझी बाबा,जोग मंझी,गुडित,प्राणिक,भक्दो को सबसे पहले उनके शरीर पर तेल और उनके सिर,कान में सिंदूर लगाया जाता है. उसके बाद ''धय बूढ़ी''(गांव के बच्चे के जन्म के समय सहयोग करने वाली महिला) बच्चों पर पानी छिड़क कर शुद्धिकरण करती है और उन बच्चों को तेल लगाती. जिसके बाद धर्म गुरु विनती-बखेड़(प्रार्थना) करते हैं और अन्त में सभी मांदर की थाप पर थिरक उठते हैं. जामा प्रखंड के कुरकुतोपा गांव में दिसोम मारंग बुरु युग जाहेर आखड़ा और ग्रामीणों द्वारा ''छटियर'' बहुत धूम-धाम के साथ मनाया गया. इस अनुष्ठान को ''छटियर'' गुरु बाबा मंगल मुर्मू के द्वारा संपन्न कराया गया. इस अनुष्ठान में कुल 25 बच्चों का छटियर संस्कार किया गया। जिसमें संबंधित परिवारों और आसपास के लोग भी शामिल हुए।

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25बच्चों का किया गया चाचु छटियर

आनंद विभोर लोग
आनंद विभोर लोग
 


गुरु बाबा मंगल मुर्मू ने समीर मुर्मू,रोहित टुडू,प्रदीप टुडू,सुनिता सोरेन,चुनि सोरेन,जेम्स सोरेन,पिंटू सोरेन,अभिषेक मरांडी,आशीष मरांडी,राजीव मुर्मू,सरिता मुर्मू,कंचन मुर्मू,निसू टुडू,अनिकेत मुर्मू,उषा टुडू,एनोस टुडू,हेमलाल टुडू,रंजित मुर्मू,अजय मुर्मू,रफायल टुडू,रेखा टुडू,अरबिंद मुर्मू,एबिका टुडू,ठाकरन टुडू और असमिका टुडू कुल  पच्चीस(25) बच्चों का ''चाचु छटियर''  किये. इस अवसर पर सुनिराम टुडू,बालेश्वर टुडू,सोनोत मुर्मू,संग्राम टुडू,बबुधन टुडू,बाबुराम मुर्मू,विलियम मुर्मू,नोरेन मुर्मू,लुखिराम मुर्मू,शिला सोरेन,मदन हांसदा,रोसेन हांसदा,बारिश मुर्मू,बुधरय मुर्मू,नथानियल मुर्मू के साथ काफी संख्या में महिला और पुरुष  उपस्थित थे.इस परंपरा की तह में कहीं न रहीं अपने पुरानी परंपरा और संस्कारों को बचाये रखने के उम्मीद भी है, ताकि अगली पीढ़ीं तक इसे पहुंचाया जा सके।

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