खूंटीः ‘रोगो हर’ गांव को रोग-अकाल से दूर रखने की परंपरा

Publisher NEWSWING DatePublished Wed, 05/02/2018 - 14:25

Khunti

ने सले रींगा केदा

कालोमोचीइ रिगाया:

चीलकातेबु आसुलेया होडोमो

इस साल तो अकाल हुआ है, क्या आने वाले साल भी अकाल हो जायेगायदि अकाल हो जाएगा तो हमलोग अपने शरीर का पालन पोषण कैसे करेंगे   अपने शरीर की बीमारियों को कैसे दूर करें, क्या हम सुख और चैन से कैसे जी सकते हैं… 

यह मुंडा गीत बताता है कि आदिवासी गांवों में स्वास्थ्य सेवा की क्या हालत है. खूंटी जिला में कई स्वास्थ्य उपकेन्द्र तो बने, लेकिन इनपर अक्सर ताला लटका रहता है. वही एएनएम के भरोसे इलाके की स्वास्थ्य सुविधा टिकी है. ऐसे में मुंडा समाज को रोग से लड़ने और खुद को स्वास्थ्य रखने की पंरपरा पर आज भी भरोसा कायम है.

jhkl

‘रोगो हर’ मुंडा समाज की परंपरा

‘रोगो हर’ मुंडा समाज की एक पुरानी परंपरा है. मुंडा गांव में हर जीव जन्तु को रोग से दूर रखने के लिए मनाया जाता है. कुड़बाडीह गांव की बुजूर्ग महिला रूचु टूटी ‘रोगो हर’ के बारे में जानकारी देते हुए कहती है, हम लोग अपने गांव से रोग, अकाल को दूर भगाने के लिए गांव की सभी महिलाएं साल में एक बार गांव से  निकलते है. सबसे पहले गांव की महिला घर से पुरानी हाड़ी को निकालती है उस हाड़ी को सजाया जाता है. फिर गांव की महिलाएं पहान के घर में जमा होती हैं. पहान काले मुर्गे की बलि देता है और बताता है कि गांव के किस सीमान से बीमारी आने वाली है. पूजा सम्पन्न होने के बाद नाचते-गाते हुए महिलायें हाड़ी, राख, पुराना झाड़ू लिए पहान द्वारा बताये हुए गांव के सीमान तक जाती हैं. गांव के सीमान में सभी महिलाए अपने-अपने हाड़ी को फेंक कर घर लौटती है. इस पूरे आयोजन में पुरूषों की भागीदारी नहीं के बराबर होती है. गांव के लोग मानते हैं इस कारण उन्हें गंभीर और जानलेवा बीमारियों का शिकार नहीं होना पडता है.

ghbhmबदहाल है स्वास्थ्य व्यवस्था

रांची से 43 किलोमीटर तैमरा-खूंटी पथ पर मुण्डा आदिवासी बहुल गांव कुड़बाडीह आज भी बीमारियों और रोग को दूर भगाने के लिए अपने परंपरागत विश्वास के ही सहारे है. यह हाल झारखंड के उन तमाम ग्रामीण इलाकों का है. लोग  बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. जंगल ही उन्हें जीवन देता है या फिर पलायन. इसके  अलावे उनके पास जीने का कोई साधन नहीं है. खेती वर्षा पर निर्भर है और इस इलाके में अक्सर अकाल पड़ता है. लोग याद करते हैं कि अकाल के कारण ही बिरसा मुंडा ने संघर्ष की शुरूआत की थी लेकिन आज तक अकाल को दूर करने का कोई ठोस उपाय नहीं किया गया है. पेयजल के लिए भी महिलाओं को मीलों भटकना पड़ता है और अब तो उस पर कई तरह का पहरा है. कुजराम, तिलमा, जोजोहातू, बुड़ाडीह, सिलादोन में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र का भवन बना हुआ है लेकिन वहां आज तक स्वास्थ्यकर्मी नजर नहीं आये. झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों का ऐसा ही हाल है. रूची टूटी बताती है कि परिवार और गांव में किसी तरह रोग तकलीफ रोग से सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभावित होती है. इसलिए हमलोग अपने गांव से रोग को भगाने का काम कर रहे है पता नहीं यह गांव बीमारी मुक्त हो सकेगा कि नहीं लेकिन लोगों को भरोसा इसी पर है .

इसे भी पढ़ेंःकेंद्र की नीतियों के खिलाफ किसान महासंघ का एलान : देशभर में 1-10 जून तक आपूर्ति रहेगी ठप

ghjngjm

मान्यता-रीति रिवाज तो अपनी जगह हैं, लेकिन लचर स्वास्थ्य व्यवस्था से ग्रामीण खासे परेशान रहते हैं. ग्रामीण मानते हैं कि कई लोग बीमारी के शिकार होते हैं और मरते हैं. सलगाडीह गांव की पदमानी मुंडा कहती है आज भी हमारे गांव में स्वास्थ्य सुविधा उपल्बध नहीं है. गांव में सिर्फ एएनएम बच्चों को टीका देने के लिए आती है. इसके बाद अगर गांव में कोई बीमार होता है तो उन्हें खूंटी या रांची इलाज के लिए जाना पड़ता है. ऐसे में हम लोग अपनी पंरपरा के अनुसार खुद को बीमारियों से दूर रखने का काम करते है. अपनी पंरपरा और ज्ञान के आधार पर ही हजारों साल से हम लोग खुद को जीवित रखे हुए हैं.

दुनिया मजाक उड़ा सकती है, लेकिन गांव से रोग दूर करने की है पंरपरा

एक ओर जहां देश डिजिटल इंडिया की ओर बढ़ रहा है वही झारखंड के गांव में रोगों से दूर रखने की इस पंरपरा का मजाक बनाया जा सकता है. लेकिन जरूरत इस बात की है कि इस हालात को संवेदना के साथ देखा-समझा जाए. दुनिया के सबसे बड़े नोबल पुरस्कार प्राप्त लेखक मार्केज इन परंपराओं और विश्वासों को गहरायी से समझने की सीख देते है.

इसे भी पढ़ेंःभाजपा के तीन पूर्व विधायकों ने मॉब लिंचिंग के दोषियों की रिहाई को लेकर दिया धरना, हत्या के दोषी 11 गो रक्षकों के परिवार को किया सम्मानित

हालांकि, इनबातों से ये साफ है कि सरकार और प्रशासन गांव में स्वास्थ्य सुविधा पहुंचा पाने में असफल दिखती है. बीमारियों के इलाज के आधुनिक साधन तो है, लेकिन जरुरतमंद तक सुलभ नहीं हैं. वही दूसरी ओर आदिवासी अंचल के लोग या तो अब भी गांव के ओझा-गुणी पर निर्भर हैं या फिर वे अपने विश्वासों से खुद की रक्षा करने के लिए बाध्य हैं. 

न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.