कुरमी की परंपराएं आदिवासी जैसी, अनुसूचित जनजाति में शामिल होना चाहिए : ताला मरांडी 

Publisher NEWSWING DatePublished Mon, 02/19/2018 - 17:10

Pravin kumar

Ranchi : झारखंड के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा कुरमी समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने को लेकर विधायकों एवं सांसदों द्वारा की गयी अनुशंसा के बाद राज्य का राजनीतिक तापमान गर्म है. ग्रामीण अंचलों में भी अनुशंसा करने वाले सांसद-विधायकों का पुतला दहन एवं शवयात्रा आदिवासी संगठनों के द्वारा निकला जा रहा है. वहीं आम आदिवासी समुदाय के लोग अपने जल, जंगल और जमीन एवं आरक्षण में हिस्सेदारी के रूप में कुरमी और तेली समुदाय के लोगों को देखने लगे हैं. एक ओर कुरमी एवं तेली समुदाय खुद की रीति-रिवाज सामाजिक दस्तूर परंपरा के अनुसार आदिवासी होने का दावा कर रहे हैं और इसे अमलीजामा पहनाने के लिए विधायक एवं सांसदों से अनुशंसा भी करावा चुके हैं.

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कुरमी को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की अनुशंसा करने को लेकर आदिवासी समाज में एक ओर आक्रोश नजर आ रहा है, वहीं दूसरी ओर अनुशंसा करने वाले सांसदों और विधायकों की राय आमजनों के समक्ष अब तक सामने नहीं आ पायी है. इसी कड़ी में सोमवार को विधायक ताला मरांडी ने इस मुद्दे पर अपनी राय न्यूज़ विंग से शेयर की.

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अनुशंसा के संबंध में क्या कहते हैं भाजपा विधायक ताला मरांडी

कुरमी समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाना चहिए. यह मेरा व्यक्तिगत राय है, मैं इसके ऐतिहासिक सच्चाई के आधार पर अनुशांसा किया हूं. यह ऐतिहासिक सच है कि कुरमी समाज भी अन्य आदिवासी समाज की तरह ही हैं, जिसे हमें स्वीकार करना चाहिए. झारखंड में आर्य आने से पूर्व कुरमी समाज की जीवन शैली, रहन-सहन,पूजा-पाठ एवं परंपरा आदिवासियों की तरह ही है. आर्य प्रभाव के कारण कुरमी समुदाय की कुछ परंपराओं पर प्रभाव दिखता है, जिस कारण कुछ बदलाव उनके समाज में दिखता है. ब्रिटिश सरकार ने क्षेत्र में शांतिपूर्वक शासन करने के लिए फूट डालो और शासन करो की नीति के तहत कुरमी समाज को आदिवासी की श्रेणी से अलग कर दिया था. मैं राज्य की जनता को जोड़ने और उनका सही विकास हो पाये, इसकी रजनीति करता हूं इसलिए मैंने कुरमी को आदिवासी सूची में शामिल करने की अनुशंसा की थी.

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कुछ लोग राजनीतिक स्वार्थ के लिए कर रहे विरोध

आदिवासी समाज में जो कुछ लोग जो विरोध कर रहे हैं वह अपने फायदे के लिए या राजनीतिक स्वार्थ के लिए विरोध कर रहे हैं. वर्तमान आदिवासी समुदाय को भय है कि उनका आरक्षण का कोटा कुरमी समाज हड़प लेगा, तो यह बेबुनियाद बात है, क्योंकि कुरमियों की आबादी आदिवासी की श्रेणी में आने के बाद उनका कोटा भी आदिवासी समाज में शामिल होगा, जिससे झारखंड में आदिवासियों की आवाज प्रखर होगी, उनका प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा और साथ ही राज्य की मूल बाशिंदों के अधिकारों का संरक्षण बेहतर तरीके से हो पाएगा .

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सब कर रहे थे हस्ताक्षर मैंने भी कर दिया : शशिभूषण सामड

चक्रधरपुर से झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक चुने गए शशि भूषण सामड ने कुरमी को आदिवासी का दर्जा देने के मुद्दे पर पूछे गये सवाल पर उन्होंने कहा कि अनुशंसा पत्र में सभी हस्ताक्षर कर रहे थे, तो मैंने भी हस्ताक्षर कर दिया. 1931 के पूर्व कुरमी भी आदिवासी की श्रेणी थे, इसलिए आदिवासियों को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है. सरकार को अनुसूची जनजाति में इन्हें शामिल करते हुये अलग से अरक्षण की व्यव्स्था करनी चाहिए. वर्तमान समय में आदिवासियों के लिए 26.02 प्रतिशत नौकारी में अरक्षण है, इसीमें से 2% आदिम जनजातियों को दे दिया गया है. जमीन के सवाल पर कहा कि आदिवासी जमीन के हस्तांतरण का खतरा तो है, लेकिन इससे कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा. सीएनटी एक्ट में कुरमियों की भी जमीन शामिल है, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगाा.

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कुरमी समाज खुद को क्षत्रिय बनने की भी की थी कवायद

उपलब्ध दस्तावेज के मुताबिक 29-30 दिसंबर 1894 को कुरमी सदर सभा की स्थापना लखनऊ में की गयी. कलांतर में यह संस्था अखिल भारतीय कुरमी क्षत्रिय महासभा रखा गया. आगे चल कर 1929 के मुजफ्फरपुर के 17वें अखिल भारतीय कुरमी क्षत्रिय महासभा में निर्णय लिया गया कि बिहार के कुरमी और छोटानागपुर के कुरमी (महतो) में कोई फर्क नहीं है. यह क्षेत्रिय मूल के वंशज है. इसी आलोक में 1913 में मिले कथित एवोरजिनल का मिला हुआ दर्जा उनके 17वें अधिवेशन के प्रस्ताव से विलोपित हो गया. स्वतंत्रता के बाद 1950 में जो जाति सूची बनी, उसमें छोटानागपुर के कुरमी को अत्यंत पिछड़ी जाति के एनेक्सर-1 में रखा गया और बिहार के कुरमियों को पिछड़ी जाति एनेक्सर-2 में रखा गया.

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