चारा घोटाला, राजबाला वर्मा, स्पष्टीकरण और सरकार, दोषी कौन ? 

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 01/13/2018 - 16:02

Surjit Singh

चारा घोटाला. एकीकृत बिहार के समय का सबसे बड़ा घोटाला. संभवतः उस वक्त का देश का सबसे बड़ा घोटाला. सीबीआई ने इसकी जांच की. जांच में कई राजनेता और प्रशासनिक महकमे के लोग फंसे. जेल गए. सीबीआई ने जिन अफसरों को खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने लायक साक्ष्य नहीं पाये, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई चलाने की अनुशंसा की. जिस पर कोर्ट ने लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही चलाने का आदेश दिया.  झारखंड के मुख्य सचिव राजबाला वर्मा पर भी विभागीय कार्रवाई चलनी है. 14 साल बीतने के बाद भी राजबाला वर्मा के खिलाफ न तो विभागीय  जांच शुरु हुई और न ही कोई कार्रवाई हुई.  इसके लिए कौन जिम्मेदार है ? राजबाला वर्मा खुद या सरकार ? 

विभागीय कार्रवाई शुरु करने से पहले संबंधित अफसर से स्पष्टीकरण पूछा जाता है. इसमें एक तथ्य यह है कि अगर संबंधित अधिकारी स्पष्टीकरण ना दे, तब क्या होगा ? एेसी स्थिति में यह माना जाता है कि संबंधित अधिकारी को अपने बचाव में कुछ नहीं कहना है. सरकार अपनी कार्रवाई शुरु कर सकती है. सामान्यतः स्पष्टीकरण से संबंधित पत्रों में सबसे नीचे यह लिखा भी होता है कि अगर आप तय समय तक स्पष्टीकरण नहीं देते हैं, तो यह माना जायेगा कि आपको इस मामले में कुछ नहीं कहना. देश का कानून भी किसी व्यक्ति को खुद के खिलाफ बयान देने के लिए बाध्य नहीं करता है. इस तरह आज जो शोर मच रहा है कि राजबाला वर्मा ने स्पष्टीकरण का जवाब नहीं दिया. तो इसमें राजबाला वर्मा की कोई गलती नहीं नजर आती. 

फिर गलती किसकी है ? जानने के लिए इन तथ्यों पर गौर करें.

- पहली बार 26 अगस्त 2003 को तत्कालीन मुख्य सचिव ने राजबाला वर्मा से स्पष्टीकरण मांगा. राजबाला वर्मा ने कोई जवाब नहीं दिया. तब झारखंड में अर्जुन मुंडा की सरकार थी.

- इसके बाद तकरीब हर वर्ष उस वक्त मुख्य सचिव के पद पर रहे व्यक्ति ने राजबाला वर्मा को स्पष्टीकरण का रिमाइंडर भेजा. लेकिन उन्होंने किसी का जवाब नहीं दिया. इस दौरान राज्य में सरकार की बागडोर सबसे अधिक समय तक अर्जुन मुंडा के हाथ में रही. फिर शिबू सोरेन, मधु कोड़ा और हेमंत सोरेन के हाथ में.  राजबाला वर्मा पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी इन सब पर थी.

- 24 मार्च 2014 को राज्य में हेमंत सोरेन की सरकार थी. तब के मुख्य सचिव आरएस शर्मा ने भी राजबाला वर्मा को रिमाइंडर भेजा. हमेशा की तरह राजबाला वर्मा ने इसका जवाब नहीं दिया. रघुवर सरकार ने उसी हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा राजबाला वर्मा पर कार्रवाई की मांग कर रही है. 

- यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि राजबाला वर्मा एकीकृत बिहार के समय तब के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की करीबी रही थीं. लालू प्रसाद की सरकार राजबाला वर्मा पर मेहरबान रहती थी. बदले में राजबाला वर्मा भी लालू प्रसाद की मदद कायदे-कानून से बाहर जाकर करती थीं.

- 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड बनने के बाद और वर्ष 2003 से लेकर अब तक राजबाला वर्मा सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर ही पदस्थापित होती रहीं. मतलब यह कि वह सरकार के विश्वासपात्र अफसरों में मानी जाती रहीं. इस दौरान जो भी अधिकारी मुख्य सचिव के पद पर रहे, उनकी जिम्मेदारी थी कि वह राजबाला वर्मा पर विभागीय कार्यवाही शुरु करे. लेकिन किसी भी मुख्य सचिव ने यह काम नहीं किया. 

- वर्तमान सरकार, जिसके मुखिया रघुवर दास हैं. रघुवर दास ने भी अब तक राजबाला वर्मा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है. विपक्ष आरोप लगा रहा है कि मैनहर्ट मामले में राजबाला वर्मा ने रघुवर दास पर प्राथमिकी दर्ज करने की इजाजत नहीं देकर जो एहसान किया था, रघुवर दास अब उसी एहसान का बदला चुका रहे हैं.

दुबारा रिमाइंडर क्यों

राजबाला वर्मा द्वारा स्पष्टीकरण का जवाब नहीं देने का मामला मीडिया में आने के बाद रघुवर दास की सरकार ने राजबाला वर्मा से 15 दिन के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया. यह किस लिए. जब स्पष्टीकरण नहीं देने के लिए राजबाला वर्मा पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है और स्पष्टीकरण देने की समय सीमा एक बार नहीं दो दर्जन से अधिक बार समाप्त हो चुकी है. तब रघुवर सरकार सीधे विभागीय कार्रवाई क्यों शुरु नहीं कर रही. क्यों इस बारे में दुबारा स्पष्टीकरण मांग रही. साफ है कि रघुवर दास की सरकार अब राजबाला वर्मा पर कार्रवाई नहीं करना चाहती. सरकार चाहती है कि लोग एक बार फिर से इस बात को भूल जाएं और अगले महीने राजबाला वर्मा सेवानिवृत्त हो जाएं. 

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