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निशाने पर लिये जा रहे हैं आर्थिक मंदी के आलोचक

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Faisal Anurag

हंगामा बरपा हुआ है. कारपारेट लीडर राहुल बजाज के एक वक्तव्य भर से. स्वस्थ लोकतंत्र में तो उनकी बातों को गंभीरता से लेते हुए नीतियों की समीक्षा की जानी चाहिये. लेकिन जिस तरह राहुल गांधी पर राजनीतिक हमले हो रहे हैं, वही प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि उन्होंने जो कुछ कहा वह तथ्यातमक है. राहुल बजाज ने गांधी के हत्यारे को संरक्षण देने के साथ मॉब लिंचिंग तक का सवाल उठाया.

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लेकिन दोनों ही मामले में गुह मंत्री लचर जवाब दे कर निकल गये हैं. भाजपा के विभिन्न घटक अब राहुल बजाज को निशाने पर ले रहे हैं. यहां तक कि जमनालाल बजाज, जो राष्ट्रीय संघर्ष के सिपाही थे, को कांग्रेसी साबित करने के लिए तथ्यों से खिलवाड़ किया जा रहा है. राहुल बजाज तो दरअसल इसी माहौल को उजागर कर रहे थे. जो अब दिख रहा है. सरकार की आलोचना को ही राष्ट्र की आलोचना में बदल दिया गया है.

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भारत में नेहरू के जमाने से सरकारों पर तीखे प्रहार होते रहे हैं. अनेक ऐसे नेता भारत में लाकप्रिय हुए जब उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ बातें की और उनकी नीतियों पर प्रहार किया. लेकिन 2014 के बाद से लोकतंत्र की इस स्वाभाविक प्रवृति को राष्ट्रद्रोह माना जाने लगा है.

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यही नहीं आर्थिक क्षेत्र में सवाल उठाने वालों के खिलाफ प्रहार तेज हो जाता है. अमर्त्य सेन और डॉ मनमोहन सिंह निशाने पर रहे ही हैं. नोबल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी हाल ही में निशोन पर लिये गये जब उन्होंने अमेरिका में दिये गये एक भाषण में भारत के विकास के आंकड़ों को ले कर चिंता प्रकट की. भाजपा के एक सांसद हैं जो झारखंड के गोड्डा से चुनाव जीत कर जाते हैं.

निशिकांत दूबे उनका नाम है. दलितों को अपना पैर धुलवा कर उस पानी को पिलाने के आरोप के बावजूद पार्टी में उनका सम्मान है. हाल के दिनों में वे अपने को आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ के रूप में भी पेश करने लगे हैं. झारखंड में कारपारेट के बड़े दिग्गजों की खुलेआम वकालत करने के साथ सीएनटी एसपीटी एक्ट को खत्म तक किये जाने की वे बात कर चुके हैं. लोकसभा में उन्होंने अब एक ताजा बयान दिया है जो चर्चा में है. उन्होंने कहा है कि जीडीपी कोई रामायण या बाइबिल की तरह पवित्र नहीं है, जो सच्चा ही हो.

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वह विकास का कोई मानक भी नहीं है. उन्होंने ससटेनेबल डेवलमेंट (सतत विकास) की बात भी की है. जिस सतत विकास की बात वे कर रहे हैं उसका तो उनकी पार्टी और उनके ही आर्थिक विचारों और नीतियों से छत्तीस का रिश्ता है. लेकिन उनका यह तर्क लगातार गिरते जीडीपी के आंकड़े के बचाव के लिए दिया गया है. कल तक मोदी सरकार की तेज विकास गति की बात करने वाले ये नेता जिस तरह की बातें कर रहे हैं, वास्तव में यही बता रहा है कि आर्थिक सवालों को ले कर न तो वे चिंतित हैं और न ही संवेदनशील.

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के नजरिये से देखा जाये तो कोई बड़ा संकट आर्थिक क्षेत्र में नहीं है. वे तो यह भी नहीं मान रही हैं कि कोई आर्थिक मंदी के हालात हैं. बहुत देर से ही सही लेकिल अब वे कहने लगी हैं कि केवल सुस्ती है. लेकिन घबराने की कोई जरूरत नहीं है. पियूष गोयल जो मानते हैं कि बेरोजगारी बेहतरीन आर्थिक स्थिति का ही प्रतिफलन है ने, दावा किया है कि 2020 में भारत 10 प्रतिशत जीडीपी रेट के साथ बढ़ेगा.

लेकिन 4.5 प्रतिशत से 10 प्रतिशत इकोनामी कैसे होगी यह नहीं बता रहे हैं. उनका बयान तब आया है जब दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियों ने भारत के ग्रोथ रेट को लगतार कम किया है. सरकार के स्तर पर कहीं नहीं दिखता है कि वह लोगों का विश्वास हासिल करने के लिए सचेष्ट है. आर्थिक नीतियों पर सुझाव देने वालों को हिकारत से देख्राने की प्रवृति दिख रही है.

डॉ मनमोहन सिंह के सुझावों के बारे में जब निर्मला सीतारमण से पूछा गया, तो उन्हेंने केवल धन्यवाद कह दिया. ऐसी उपेक्षा की भावना किसी अहंकार का ही परिचायक है. देश में मंहगाई चरम पर है. भारत में 100 रुपये किलो प्याज बिक रहा है. लेकिन चैनलों को चिंता पाकिस्तान में प्याज के बढ़े भाव को ले कर है. भारत ने तुर्की से प्याज मंगाने का निर्णय तो लिया है लेकिन उससे भारत की समस्याओं का हल तो नही होने जा रहा है. इस संकट से जाहिर है कि कृषि उत्पादकता संकट में है. और किसानों पर उसका बुरा असर हो रहा है. देश के अनेक हलकों में किसानों का दर्द विभिन्न रूपों में फिर उभर कर सामने आने लगा है.

इस बीच एक और नोबल लारेट पाल क्रुगमेन ने कहा है कि बेरोजगारी भारत के विकास की कथा को खत्म कर रही है. उनकी चेतावनी बेहद गंभीर है. उन्होंने कहा है कि मैनुफैक्चरिंग इंडस्ट्री के विकास के बिना भारत की हालत बेहद गंभीर हो रही है.

भारत की अर्थव्यवस्था को ले कर उन्होंने अनेक चेतावनी दी है. जिसे इकोनामिक टाइम्स ने प्रकाशित भी किया है. लेकिन मोदी-शाह की जोड़ी ने झारखंड के चुनाव अभियान में धारा 370, राष्ट्रवाद और एनआरसी को ले कर ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज कर दी है. आर्थिक विशेषज्ञ इस प्रवृति को अर्थव्यवस्था के लिए घातक ही नहीं विनाशकारी भी बाताते रहे हैं.

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