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किशोरावस्था में गर्भधारण जानलेवा

पवन ठाकुर:-NEWS WING Ranchi, 09 September :कम उम्र में किशोरियों का गर्भधारण करना ही उनकी जान का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है. किशोरावस्था में गर्भधारण करना ही किशोरियों की मौत का सबसे बड़ा कारण है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया है कि प्रसव के समय संक्रमण या बीमारी हो जाता है जिस कारण हर साल लाखों किशोरियों की मौत हो जाती है या वे किसी ना किसी रूप से जख्मी हो जाती हैं. इस समस्या का सबसे बड़ा कारण गर्भनिरोधकों से अनभिज्ञता बताया गया है. दुनिया के बहुत से देशों में यह आम बात है कि लड़कियों की बहुत कम उम्र में शादी हो जाती है. शादी के बाद ही वे अक्सर गर्भवती हो जाती हैं, लेकिन शारीरिक रूप से वे बच्चा पैदा करने के लिए तैयार नहीं होती. किशोरियों के प्रसव एवं गर्भधारण की समस्या पर आज रोशनी डाल रही हैं स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉक्टर गोपा चौधरी.

किशोरावस्था के दौरान होते हैं कई बदलाव

डॉक्टर चौधरी कहती हैं कि 13 वर्ष से 16 वर्ष के उम्र की लड़किया बचपन की दहलीज तुरंत पार कर किशोरावस्था में प्रवेश करती हैं. किशोर से वयस्क होने के क्रम में साधारणत: प्रथम मासिक के बाद लड़कियों में सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक एवं जैविक बदलाव भी आते हैं. यह किशोरावस्था से वयस्क होने का संधि उम्र होता है. वहीं भारतीय कानून 18 वर्ष के उम्र की लड़कियों को विवाह करने की मान्यता देती है. ऐसा इसलिए हैं क्योंकि इस उम्र में लड़कियों का यौन संबंध के लिए मानसिक, शारीरिक एवं जैविक विकास हो चुका होता है. वैसे गर्भधारण का उचित समय 20 से 35 साल होता है.

छोटी उम्र में शादी है बड़ा कारण

हमारे समाज में छोटी उम्र में शादी करने का चलन काफी प्रसिद्ध है. जल्दी शादी हो जाने के कारण बच्चे भी जल्दी पैदा हो जाते हैं जो कि मां बनी कम उम्र की किशोरियों के लिए बेहद खतरनाक है. कम उम्र की युवतियों का शरीर उतना विकसित नहीं हो पाता है कि वह अपने अंदर एक शिशु को पर्याप्त मात्रा में पोशक तत्व दे सके और पाल सके. नतिजतन मां के साथ-साथ गर्भ में पल रहे उसके शिसु पर भी काफी बुड़ा असर पड़ता है.

किशोरावस्था में गर्भधारण करने से होने वाली कठिनाई

डिलिवरी में परेशानी

किशोरावस्था में गर्भधारण को जोखिम के दायरे मे माना जाता है. इस उम्र में किशोरी का पूरी तरह से शारीरिक विकास नहीं हो पाता. उनकी कमर की हड्डियां इस उम्र में पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती. इसका परिणाम यह होता है कि डिलिवरी के समय परेशानी होती है, जो बच्चे के साथ ही मां के स्वास्थ्य के लिए भी घातक है.

संक्रमण

किशोरियों में संक्रमण का खतरा प्रसव संबंधी कारण ज्यादा होता है. यह खतरा उस हालत में और अधिक बढ़ जाता है जब डिलिवरी डाक्टर की देख-रेख के बिना या सही जगह पर नहीं होती है. इस दौरान टेटनस और बैक्टीारिया से उत्पपन्न होने वाले संक्रमण का खतरा और अधिक हो जाता है.

पोषण

गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त पोषण की आवश्यकता होती है परन्तु हमारे देश में करोड़ों लड़कियां कुपोषण तथा खून की कमी वाली स्थिति में बच्चे को जन्म देने के लिए बाध्य होती हैं. जो बच्चा व माता दोनो के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है. युवा अवस्था में शरीर को ज्यादा पोषण की आवश्यकता होती है तथा इसी दौरान गर्भधारण करने से, गर्भ व मां दोनो को एक साथ बराबर पोषण दे पाना कठिन हो जाता है.

लम्बे समय तक स्वास्थ्य समस्याएं

किशोरावस्था में गर्भधारण करने से इस दौरान होने वाली समस्याएं किशोरी को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है. जैसे-प्रजनन तंत्र को नुकसान पहुंच सकता हैं. प्रसव के दौरान होने वाली पीड़ाएं स्थायी रह सकती हैं. किसी प्रकार का संक्रमण हो सकता हैं या फिर गर्भाशय के फटने की आशंका भी रहती हैं.

बच्चे की स्वास्थ्य पर असर

कम उम्र में मां बनने पर समय से पहले शिशु के जन्म का खतरा बना रहता है. इसके अलावा कम वजन व अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं. किशोरावस्था में घर्भधारण के कारण बच्चे का विकास भी ठीक से नहीं हो पाता क्योंकि उन्हें जरूरी पोषक तत्व नहीं मिलते. नवजात मृत्यु दर बढ़ने का एक कारण किशोर गर्भावस्था भी है.

कम वजन का बच्चा

जन्म के समय बच्चे का वजन 2,500 ग्राम यानी ढ़ाई किलो से कम है तो उसे कम वजन का शिशु माना जाता है. कम वजन वाले बच्चों के जन्म की संभावना सामान्य माताओं की तुलना में उन माताओं में ज्यादा होती है जिनकी उम्र 20 वर्ष से कम होती है.

मां के स्वास्थ्य पर असर

किशोर गर्भावस्था के दौरान लड़कियों के शरीर में कई बदलाव होते हैं, जिसकी वजह से उन्हें चक्कर, बेहोशी की समस्या हो सकती है. किशोरियों के लिए उनकी नियमित दिनचर्या काफी मुश्किल भरी हो जाती है. खाने में पोषक तत्वों की कमी होने से वे कमजोरी महसूस करती हैं और कई प्रकार की बीमारियों का शिकार हो जाती हैं.

प्रीटर्म लेबर पेन

किशोर गर्भवती को एक आम गर्भवती महिला की अपेक्षा कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. किशोर गर्भावस्था में कई बार प्री टर्म लेबर पेन भी हो जाता है. इसके अलावा एनीमिया और हाई ब्लड प्रेशर की समस्या होने की आशंका भी बनी रहती है.

गर्भपात

किशोरावस्था में गर्भधारण कई बार चिंता का कारण बन जाता है और गर्भपात तक कराना पड़ सकता है जो कि किशोरी के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता हैं. स्वास्थ्य समस्याओं के साथ-साथ कई बार मौत का कारण भी बन सकता है.

90% किशोरियां होती हैं एनिमिया की शिकार

डॉक्टर चौधरी का कहना है कि भारत में लगभग 90% किशोरियां एनिमिया (रक्ताल्पता) की शिकार हो जाती है. जब शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है तो उसे एनिमिया कहा जाता है. अधिकतर किशोरियों में पाया जाता है कि उनका हीमोग्लोबिन 10% से कम होता है जो उनके लिए हानिकारक होता है. किशोरियों में एनिमिया की पहचान करना मुश्किल बात नहीं है.

इसके प्रमुख शारीरिक लक्षण हैं

कमजोरी महसूस होना, जल्दी थक जाना तथा चक्कर आना, जरा-सी भागदौड़ में सांस फूल जाना, आलसी और उदासीन हो जाना, चेहरे की रौनक चला जाना आदि. शरीर में खून की कमी अनेक परेशानियों को जन्म दे सकती है. शरीर में खून बनाने में आयरन के अलावा प्रोटीन और विटामिन की आवश्यकता होती है. किशोरियों के खान-पान पर विशेष ध्यान देकर इस कमी को पूरा किया जा सकता है.

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