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पांचवीं अनुसूची आदिवासी अधिकारों की गारंटी

पांचवीं अनुसूची स्मृति-दिवस पर खास पेशकश

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आज से ठीक सत्तर साल पहले संविधान-सभा में पांचवीं अनुसूची पारित करते हुए की गई बहस से समझा जा सकेगा कि आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर कौन कहां खड़ा था.

पांचवीं अनुसूची के नाम पर फ़ैलाई जा रही उल-जलूल बातों का सच भी इसी बहस में छुपा है. गौर करने की बात है कि एक तरफ़ राष्ट्रीय नेताओं के आदिवासी मामलों पर स्थापित विचार, संविधान निर्मात्री सभा में उनके भाषण और पांचवीं अनुसूची के अंतिम पाठ के प्रावधानों में बहुत अंतर है.

अंबेडकर, ठक्कर और मुंशी के बयान दिखाते हैं कि संविधान निर्माताओं की आदिवासी-स्थिति की समझ और संवेदनशीलता कितनी उथली थी. जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासी की अकादमिक परिभाषा देने की चुनौती का जवाब नहीं दिया; और फिर किसी ने परवाह नहीं की. आज़ाद हिंदुस्तान में आदिवासियों के साथ हुआ यही सबसे बड़ा ‘ऐतिहासिक अत्याचार’ है.

पांचवीं अनुसूची पर संविधान-निर्मात्री सभा की बहस का हिंदी में सार (5 सितंबर, 1949)

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डा. अंबेडकर ने (फ़रवरी 1948 के प्रारूप-संविधान में शामिल अठारह पैरा वाली पांचवीं अनुसूची से अलग) पांचवीं अनुसूची का नया मसौदा पेश करते हुए इसकी खास बातों पर रोशनी डाली.

संविधान में जनजाति सलाहकार परिषद की व्यवस्था सिर्फ़ अनुसूचित क्षेत्रों में की जा रही है, जबकि इन क्षेत्रों से बाहर रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रपति बाद में ज.स.प. गठन की अनुमति दे सकेंगे.

पैरा 5(1) के तहत शांति और सुशासन के लिए अधिसूचनाएं जारी करने में अब जनजाति सलाहकार परिषद की कोई भूमिका नहीं होगी. पैरा 6 के तहत अनुसूचित क्षेत्र तय करना राष्ट्रपति के ऊपर छोड़ा जा रहा है, क्योंकि अभी इस संविधान में यह कह पाना कठिन है कि ये क्षेत्र कौन से होंगे.

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पैरा 7 इसलिए दिया गया है ताकि संसद आगे चलकर इस पांचवीं अनुसूची को समाप्त कर सके. वैसे भी हमेशा के लिए राज्यों के भीतर राज्य बनाने का कोई तुक नहीं है. प्रस्तुत संशोधनों के विषय में सभी सहभागियों और विषय-विद्वान श्रीमान ठक्कर से मशविरा कर लिया गया है.

नज़ीरूद्दीन अहमद ने कहा कि जनजाति सलाहकार परिषद का काम राज्यपाल को सलाह देना होना चाहिए और इसीलिए इसके सभी बीस सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल ही करें. किसी अधिनियम को निरस्त करने का नहीं, राज्यपाल को सिर्फ़ यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि कौन सा अधिनियम लागू नहीं होगा.

पैरा 5(5) से विनियमों को ’तत्काल’ राष्ट्रपति के अनुमोदन को भेजने की बाध्यता हटा दें, इस हड़बड़ी की ज़रूरत नहीं. शिड्यूल कास्ट में जैसे ’एस’ और ’सी’ को कैपिटल केस किया मायने बड़ा लिखा है वैसे ही शिड्यूल ट्राईब में भी करें.

जयपाल सिंह ने कहा कि हर स्थान पर अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जनजाति को साथ-साथ लिखना चाहिए ताकि सारे आदिवासी इसमें शामिल हो जाएं. अनावश्यक उलझनें हटा कर स्पष्ट कर दीजिए कि राज्यपाल की रिपोर्ट वार्षिक होगी.

वैसे मुझे भरोसा है कि सरकारें इस बारे में चौकस रहेंगी. अधिसूचनाएं जारी करने में पहले की तरह ज.स.प. की भूमिका होनी चाहिए. यह नया मसौदा एक गुप्त वार्ता से आया है और बतौर आदिवासी प्रतिनिधि मुझ से सलाह नहीं ली गई.

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ज.स.प. सिर्फ़ सलाह देने वाली संस्था न रहे बल्कि इसकी अनुशंसा बंधनकारी हो. ज.स.प. एक जीवंत संस्था बने सिर्फ़ दिखावटी चीज़ नहीं; इसे बस एक भारी नाम ही नहीं सार्थक काम करने की शक्तियां भी दें.

युधिष्ठिर मिश्रा ने कहा ज.स.प. तो अनुसूचित जनजाति वाले सभी प्रांतों में होनी चाहिए. सामान्य प्रशासन में भी इसकी भूमिका होनी चाहिए; 5(1) की अधिसूचनाएं ज.स.प. की सलाह पर होनी चाहिए. अनुसूचित जनजाति को हर स्थान पर अनुसूचित क्षेत्र के साथ जोड़कर लिखें, ताकि अभी प्रचलित ’टेनेंसी लॉ’ बचाए जा सकें.

प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना ने कहा कि अ.ज.जा. और अनुसूचित क्षेत्रों की मौजूदगी एक कलंक है, छुआ-छूत की तरह. इनका बहुत तेज़ी से विकास किया जाना चाहिए. ताकि यह सामान्य वर्ग के लोगों के समकक्ष आ जाये, और यह सीधे तौर पर केंद्रीय सरकार की ज़िम्मेदारी है. इसलिए इस अनुसूची में राज्यपाल की जगह  ’राज्यपाल की सलाह से राष्ट्रपति’ ऐसा लिखा जाये.

ज.स.प. के नियम राष्ट्रपति को बनाने चाहिए. राज्यपाल स्वयं संसद द्वारा पारित विधेयक को संशोधित या निरस्त नहीं कर सकते. अधिसूचनाएं भी राष्ट्रपति की अनुशंसा के बाद ही जारी हो. पैरा 6(1) में अनुसूचित क्षेत्र तय करने का काम संसद करे न कि राष्ट्रपति. दस साल बाद (शिड्यूल कास्ट और शिड्यूल ट्राईब जैसा) कोई उप-मानव समूह नहीं रहने चाहिए.

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ब्रजेश्वर प्रसाद ने पिछले दिन के ’स्टेट्समैन’ अखबार का हवाला देते हुए कहा, यह चिंता होनी चाहिए कि आदिवासी जन-प्रतिनिधि अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करेंगे या आदिवासी हितों का. ज.स.प. का प्रावधान मूल मुद्दे से बचने की कोशिश जैसा है; आदिवासियों को मुफ़्त शिक्षा, दवा और आजीविका की जरूरत है और देश के दूसरे लोगों से कहीं ज्यादा, इसलिए केंद्र सरकार को सीधे इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

प्रांतों द्वारा अपनी सीमाएं बड़ी रखने की प्रवृत्ति ने हमें रोक दिया है कि हम सीधे सभी अनुसूचित क्षेत्रों को केंद्र-शाषित बना दें. ज.स.प. में सिर्फ़ आदिवासी विधायक ही होने चाहिए. (कानून बना सकने की शक्ति देने की बजाए) संविधान में ही सीधे आदिवासियों की ज़मीन के हस्तांतरण पर रोक का प्रावधान करिए. आज की स्थिति में गैर-आदिवासियों के कब्ज़े वाली ज़मीन तो वापस न ली जाये लेकिन आगे अब और ज़मीन अदिवासियों के हाथों से नहीं जानी चाहिए.

इससे आदिवासियों में भारत के लिए वफ़ादारी बढ़ेगी. हमें यूरोप की तरह से आदिवासियों के विद्रोह की संभावनाएं नहीं छोडनी चाहिए. ब्याज का धंधा संविधान द्वारा ही निषेध कर दीजिए; वैसे भी यह सरकार का काम है, निजी क्षेत्र का नहीं.

लक्ष्मीनारायण साहू ने कहा अनुसूचित क्षेत्र संसद द्वारा तय होने चाहिए. ज.स.प. के एक चौथाई पद मिशनरीज़ को मिलनी चाहिए. एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा हमें विकसित प्रजातियों जैसे कि उड़ीसा के ’डांबी’ और ’पाणी’ को अनुसूची से बाहर करना होगा. पिछले मसौदे में जो विवाह, उत्तराधिकार और मान्यताओं का ज़िक्र था वह अच्छा था.

अलगाव की भावना को दबाने के लिए ज.स.प. में कुछ गैर-मूलवासियों को होना चाहिए. अनुसूची दस, बीस साल या उससे भी ज्यादा समय के लिए हो सकती है, हमें तेज़ विकास का दबाव डालने की जगह नज़दीकी बढ़ाने के क्रमिक प्रयास करने चाहिए.

बाबू रामनारायण सिंह ने कहा हम लोग ’पिछड़े इलाके/ एक्सक्लूडेड इलाके’ जैसे पदों से शर्मिंदा रहे हैं तो फ़िर इसे जारी रखने की यह कोशिश क्यों! आदिवासी बच्चों को मुफ़्त शिक्षा, सैन्य शिक्षा मिले, नौकरियों और भू-अधिकार में प्राथमिकता मिले, उसके बाद कोई विशेष व्यवहार नहीं होना चाहिए. एकीकृत राष्ट्र बनाने के लिए हमको अब जनता को अलग-अलग श्रेणी में बांट कर देखने की अंग्रेज़ों वाली प्रवृत्ति से बचना चाहिए.

जदुबंस सहाय ने कहा मूल मसौदा बहुत जड़ था, यह मसौदा अच्छा है. हमें राज्य सरकारों और गैर-सरकारी एजेंसियों पर भरोसा करना चाहिए. राज्यपाल की रिपोर्ट का दायरा अनुसूचित क्षेत्र से बढ़ाया जाये ताकि इनसे बाहर रहने वाले आदिवासी भी इसके दायरे में आ जाये. ज.स.प. को भूमि मामलों के निपटारे से दूर रखें. अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले हरिजन और पिछड़े वर्गों को भी भूमि दी जाए.

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ए.वी. ठक्कर ने कहा कि मसौदे के इस सुधार से (बस्तर, कांकेर, सरगुजा जैसे) रियासती इलाकों के आदिवासी भी सुरक्षा के दायरे में आए हैं. लुशाई और नागा क्षेत्रों का दौरा पहली बार हमारी उप-समिति द्वारा ही 1947 में किया गया और यह बात साफ़ हो गई है कि हमें उनको मुख्यधारा में शामिल करना ही होगा. जयपाल को आदिवासियों के बारे में जानकारी बढ़ाने के लिए बिहार से बाहर भी निकलना चाहिए, ताकि वह जटिलताएं समझ सकें.

सरगुजा के ओरांव, रांची के ओरांव के मुकाबले बीस गुना अधिक ’जंगली’ हैं. नए प्रांतों में बहुत अच्छा काम चल रहा है, मध्य प्रांत ने आदिवासी विकास का वार्षिक बजट पचास लाख रखा है. केंद्र पर पहले ही बहुत बोझ है, रियासतों (के विलय के खर्च) का मामला है, ऐसे में अनुसूचित क्षेत्रों का बोझ लादना भारी पाप होगा, यह प्रांतीय सरकारों का काम है. अगर हमें दस सालों में विकास का लक्ष्य पाना है तो सभी एजेंसियों को जिम्मेदारी लेनी होगी, सिर्फ़ केंद्र को नहीं!

मुनिस्वामी पिल्लै ने कहा आदिवासी बड़े क्षेत्र में बहुत बिखरे हुए से हैं तो उनके लिए प्रांतीय चुनाव में अपना प्रतिनिधि भेजना कठिन होगा इसलिए ही ज.स.प. खास है. ज.स.प. के एक चौथाई अनारक्षित पदों में सिर्फ़ ज़मीनी अनुभव और आदिवासी संवेदना के लोगों को ही रखना चाहिए. इसकी सलाह बंधनकारी होनी चाहिए. विकास के लक्ष्य के लिए दस साल बहुत कम हैं.

जयपाल सिंह ने कहा कि ठक्कर को हासिल साहूकारों की मदद के बिना भी मैं भारत के सभी आदिवासी इलाकों में घूमा हूं. पिछले ग्यारह सालों से गैर-आदिवासियों में आदिवासियों के स्वाभिमान और सांस्कृतिक जटिलताओं की समझ बढ़ाने के लिए काम किया है. आप पहले आदिवासियों की भाषा तो सीखें; आदिवासी समस्या को वैज्ञानिक दृष्टि से देखिए, राजनीतिक से नहीं. आदिवासी के लिए हम जो करना चाहते हैं उसके लिए उसे खुद तैयार करने की कोशिश में पहले आदिवासी चेतना को समझिए.

रियासतों के विलय से काफ़ी कुछ बदला है, अब उड़ीसा में अपने आदिवासियों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए संसाधन ही नही हैं, केंद्र से तदर्थ मदद मिले. मध्य प्रांत प्रशासन पचास लाख की बजट प्रावधान राशि में एक शून्य और बढ़ाए तो कोई बात है. राष्ट्रपति को आयोग के द्वारा दस-बीस सालों में तरक्की की समीक्षा करवानी होगी, तब तक हमारी परीक्षा खत्म नहीं होती.

’आदिवासी’ न की जनजाति या आदिम-जाति हो आधिकारिक नाम. हमें समुचित आदर दें और अगर अंग्रेज़ों की तरह ही देखना है तो बेहतर है आप हमें छोड़ दें.

बिस्वनाथ दास ने कहा कि 1909 से 1935 तक फैलाई गई सांप्रदायिकता के धब्बे बहुत नुकसान और पीड़ा से छूटे हैं, अब हम फ़िर से ऐसी अनुसूची द्वारा समाज को बांटने का काम क्यों कर रहे हैं! हम वैश्विक समानता और मूलभूत अधिकारों के हिमायती हैं, फ़िर इस विषाणु का क्या काम! अंग्रेज़ों ने आदिवासियों और अनुसूचित क्षेत्रों को म्यूज़ियम बनाकर रखा. यहां अपनी मौजूदगी की ज़रूरत को सही साबित करने के लिए. प्रारूप समिति द्वारा साझा सहमति बनाने के लिए कुछ अनौपचारिक प्रयास किए गए थे, कोई षडयंत्र-सभा नहीं हुई थी जैसा कि आरोप लगाया गया है. इंपीरियल होटल में ठहरने वाला आदमी (जयपाल सिंह मुंडा) अपनी तुलना ठक्कर बापा से कर रहा है.

यह संशोधित मसौदा कुछ मुश्किलें पैदा कर सकता है, क्योंकि अब काफ़ी सारे लोग आदिवासी होने का दावा करेंगे. विकास के लिए जितनी ज़मीन और धन चाहिए ले लो लेकिन ये विभाजक शब्द ’आदिवासी’ छोड़ दो. वर्तमान दीवान या राजप्रमुखों को दी गई आजीवन मान्यता के चलते वे आदिवासियों से मिलकर मुश्किलें पैदा कर सकते हैं. क्योंकि अगर ज.स.प. ने अनुशंसा कर दी तो राष्ट्रपति के लिए उसे रोकना मुश्किल होगा. प्रांतीय कानून सुरक्षा देने के लिए काफ़ी हैं, यह मुद्दा संविधान में रखने की ज़रूरत नहीं.

के.एम.मुंशी ने कहा कि समिति द्वारा बिहार के श्रीमान सहाय के माध्यम से जयपाल जी को तीन बार बुलाया गया, लेकिन वे अनौपचारिक चर्चा में नहीं आए. आदिवासियों की स्थिति एक प्रांत से दूसरे प्रांत, यहां तक कि एक ज़िले से दूसरे ज़िले में अलग है. इसीलिए यह संशोधन लाया गया है. अनुसूचित जनजाति को समय रहते प्रांत के अन्य भारतीयों के समकक्ष लाना होगा, ताकि उन्हें राष्ट्रीय जीवन में समाहित किया जा सके.

जयपाल के हमसे मतांतर दो बिंदुओं को लेकर हैं- तथ्य और दृष्टि. भील, संथाल और नागा किसी भी तरह ’आदिवासी’ नाम के एक ही समूह में नहीं रखे जा सकते क्योंकि ये अलग-अलग सभ्यताओं और काल-खंडों से हैं. यह स्वयं आदिवासियों के लिए घातक होगा.

अनुसूचित जनजातियों को ऊंची-आक्रामक सभ्यता के नस्ल वालों के घातक प्रभाव से बचाने और उनके अपने स्वायत्त जीवन के विकास के लिए सुरक्षा देने की ज़रूरत है. हम चाहते हैं कि अपने दत्तक देश की गतिविधियों में आदिवासी और हिस्सा लें. इन्हें ’अलगाए हुए समुदाय’ या ’नन्हें गणतंत्र’ नहीं बनाना है.

अगर अ.ज.जा. को भी इस अनुसूची में हर जगह अनुसूचित क्षेत्र के साथ जोड़ दें तो कल शहर में रहने वाले आदिवासी भी विशेष लाभ की मांग करेंगे. अगर सामान्य प्रशासन को भी ज.स.प. के कामों में शामिल किया गया तो ज.स.प. के बिना कोई काम इन इलाकों में होगा ही नहीं. ज.स.प. किसी सीनेट की तरह तो राज्यपाल को सलाह नहीं दे सकती. यह विचार ही बेतुका है कि राज्यपाल मंत्री-मंडल के बजाए ऐसी किसी सभा की बात सुने. राज्यपाल को सिर्फ़ विनियमों के लिए ज.स.प. से सलाह करनी है.

जबकि अधिसूचनाओं के लिए हमारा पवित्र भरोसा प्रांतीय सरकारों में है. मेरे प्रांत में तो आशा भी नहीं करते कि आदिवासी (जन-प्रतिनिधि) ’मनी-लेंडर्स एक्ट’ का एक शब्द भी समझेंगे, इसीलिए ज.स.प. से ’अनुशंसा’ की जगह ’सलाह’ का प्रावधान किया है.

अनुसूचित क्षेत्रों की सीमाएं तय करना काफ़ी बारीक काम है, क्योंकि एक ज़िले से दूसरे ज़िले के हालात अलग हैं. इसलिए संसद में इसे कर पाना असंभव है. प्रस्तुत पुनरीक्षित मसौदा आदिवासियों के खुद के हित में है.

{इसके बाद सभापति के पूछने पर अंबेडकर ने कहा कि अंतिम बयान में उनके कहने के लिए कुछ नहीं बचा है. सदस्यों द्वारा प्रस्तावित सारे के सारे संशोधन सभा के मतदान में खारिज हो गए. जयपाल मुंडा जी ने ज.स.प. को प्रशासनिक ज़िम्मेदारी देने का अपना संशोधन प्रस्ताव वापस ले लिया. पांचवीं अनुसूची के पुनरीक्षित मसौदे को बिना किसी सुधार के सभा ने अंगीकृत किया.}

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