अंग्रेजिया कॉलेजिया बाबू हो, बुद्धि, शिक्षा और संस्कार से च्युत हो, अगर तुम्हारा मूल-गोत्र व पुरखे का नाम पूछ दिया जाए तो दाँत निपोड़ लोगे

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 04/17/2018 - 09:53

"खट्टरकाका "की डायरी से 

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खट्टारकका: आबह सी.सी. आई तोहर मोन किएक उतरल छौ।

सी.सी. मिश्रा: मोन इसलिए झुंझुआन और कोनादन कर रहा है कि आई मधुबनी पेंटिंग से सज्जनित मधुबनी रेलवे स्टेशन गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में स्थान स्थान बनाने से चूक गया। 7000 वर्ग फ़ीट दीवाल पर 180 कलाकारों ने दिनरात मेहनत कर मधुबनी पेंटिंग बनाया लेकिन रेलवे के हाकिम इतने ही मुर्खाधिपति थे कि उन्होंने रेकॉर्ड बनाने के अभियान की शुरुआत से पहले गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जरूरी रजिस्ट्रेशन करबाया ही नहीं था। सब उदास हैं। 

खट्टर काका: हौ जी क्या करोगे उत्तर भर (दिशा) वाला कुछ अधिक ही कबिकाठी होता है। कौआ छप्पड़ पर बैठ जाएगा तो सीढ़ी उतार लेगा की सीढ़ी के विना कौआ उतरेगा कैसे। अब रेलवे का ही ले लो कभी एक समय था कि लोहना लाइन में सिग्नल हमेशा गिरा ही रहता था इसलिए किसी ने छंद रचना कर लोहना स्टेशन को मिथिला के 10 महाबुरित्व मतलब महान बाहियात चीजों में शामिल कर दिया "स्टेशन में लोहना बुरि"
लेकिन यह मधुबनी पेंटिंग कैसा होता है मैं तो मिथिला पेंटिंग जानता हूँ। 

सी. सी. मिश्रा: इसे मिथिला पेंटिंग भी कहते हैं। पूरे विश्व में यह तो मधुबनी पेंटिंग के नाम से विख्यात है।

खट्टर काका: हौ जी "बाप पेट में और पुत गेल गया" वाला बात करते हो। पहले मिथिला या मधुबनी। 45 साल पहले जो जिला बृहत्तर दरभंगा से काट कर बनाया गया हो उस जिला के नाम पर तुम लोगों ने मिथिला की हजारों साल से चली आ रही लोककला जो मिथिला के सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न भाग रहा है, का नामकरण कर दिया। मिथिला की लोककला को एक जिला अपने नाम पर केवाला (रजिस्ट्री) करवा लेगा।

सी.सी. मिश्रा: कक्का एक जापानी रिसर्चर मिथिला भ्रमण में आया था उसने इस कला के बारे में विश्व को यह कहते हुए अवगत करबाया था की यह मधुबनी पेंटिंग है। आप उसके रिसर्च पर  कैसे सवाल कर सकते हैं। 

खट्टर काका: इ चीनी जापानी ने सिर्फ मधुबनी ही देखा पूरा मिथिला नहीं। शेष मिथिला में महिलाएं और ललनाएँ क्या चित्र बनाती हैं। कोई चीनी जापानी विदेशी कुछ बोल दिया वह तुम लोगों के लिए ब्रह्म लकीर हो गया। मिथिला चित्रकला क्या है यह समझने के लिए भाष्कर कुलकर्णी और उपेंद्र महारथी जैसे कला मर्मज्ञों को पढ़ो जिन्होंने अपना जीवन इस कला को सीखने समझने में लगा दिया। उपेंद्र ठाकुर को पढ़ो लक्ष्मीनाथ झा का शोध पढ़ो।

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सी.सी. मिश्रा: कक्का किसी भी विषय को समझने के लिए विकिपीडिया सबसे प्रमाणित श्रोत है वहाँ भी इसे मधुबनी पेंटिंग ही कहा गया है। खैर आपको इंटरनेट समझाने का समय नहीं है। मधुबनी पेंटिंग के बारे में पहली जानकारी तीस के दशक में हुए भूकंप के दौरान हुई थी जब राहत कार्य मे जुटे अंग्रेज़ अफसरों ने घर की दीवाल पर बने चित्र देखे। आप तो सभी के योगदान को नकार देते हैं। इस चित्रकला में मधुबनी का स्वर्णिम योगदान है इसलिए मधुबनी पेंटिंग के रूप में ख्याति मिली। मधुबनी का जितवारपुर, रांटी, मंगरौनी ऐसे कितने नाम गिनाऊँ जहाँ के कलाकारों ने इस कला को ऊंचाई दी। 

खट्टारकाका: हौ जी हमको भी पता है कि तुम जैसे बुद्धिबधिया को समझाने से अधिक आसान काम कलकत्ता पैदल चले जाना है। फिर भी समझा रहा हूँ क्या पता कि तुम्हारी बुद्धि जो बाम हो चली है वह रास्ते पर आ जाए। ह ह अगर मधुबनी जिला नहीं बनता तो इस कला को लोग जानते ही नहीं। अगर योगदान पर ही नामकरण होना चाहिए तो तबके रेलमंत्री ललितनारायण मिश्र ने इस कला के प्रचार प्रसार और इसे व्यापार से जोड़ने के लिए बहुत कुछ किया। आज अगर मिथिला से बाहर लोग इस कला को जानते हैं तो उनकी बदौलत। उन्होंने तो जयंती जनता एक्सप्रेस को मिथिला पेंटिंग से सजा दिया था। तब तो मैं इस कला को ललितनारायण पेंटिंग नाम रखने के लिए आंदोलन करूँगा। सुनील दत्त ने अपनी एक फ़िल्म के सेट पर मिथिला पेंटिंग सजा रखा था तब मैं इसे दत्त पेंटिंग कहूँगा।

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सी.सी. मिश्रा: लेकिन वह लोग कलाकार नहीं थे। कलाकर थी गोदावरी दत्त जैसी महिलाएं और वो गाँव जिन्हें राष्ट्र जानता है।
खट्टारकाका: कलाकार तो सभी हैं और सभी कलाकारों माँ सरस्वती से आशीर्वाद के कारण ही मिथिला के इस लोककला को जीवंत कर रखा है। किसी को पुरस्कार मिला किसी को नहीं ऐसे में दूसरे का महत्व कम कहाँ हो जाता है। जिन महिलाओं ने इस कला को सदियों से इस कला को जेनेरेशन ट्रांसफर किया उनका क्या। तुम्हारे अनुसार मधुबनी के कुछ गाँव इस कला के बहुत बड़े केंद्र हैं  इसलिए इसका नामकरण मधुबनी पेंटिंग सही है। तब तो दरभंगा का बरहेता, बहादुरपुर, कबिलपुर, बलभद्रपुर, खराजपुर, पनिचोभ गाँव भी इस कला का बहुत बड़ा केंद्र है तब तो इन स्थानों के नाम पर नाम होना चाहिए। तब समस्तीपुर, पूर्णिया, जनकपुर, चंपारण, दिनाजपुर वाले भी कोर्ट में अर्जी दाखिल कर इस पेंटिंग का नाम अपने इलाके के नाम और करने का माँग करें क्योंकि वह स्थान भी आदिकाल से मिथिला पेंटिंग का बहुत बड़ा केंद्र रहा है। तुम लोग एक खास खोल में रहते हो और खास प्रकार के ढोल  बजाते हो इसलिए तुम लोगों को दूसरे कलाकारों के बारे में जानकारी नहीं होती है जिन्होंने गुमनामी गरीबी और शोषण में जीवन बिताते हुए मिथिला पेंटिंग को जीवंत बनाए रखा। कबीरपुर गांव की गौड़ी देवी ने अपने जीवन काल में 10,000 से अधिक लड़कियों और लोगों को मिथिला पेंटिंग में दक्ष बना दिया बेचारी को जीवन में कभी न किसी स्टेज पर बुलाया गया ना ही कभी किसी सम्मान के लायक समझा गया मिथिला पेंटिंग को  बेचकर मालामाल होने वाले माफिया उस का शोषण करते रहे और ऐसे ही एक दिन हाथ में कूँची लिए स्वर्ग सिधार गई। 
सी. सी. मिश्रा : हां ऐसे इक्के-दुक्के हो सकते हैं जिन को उचित सम्मान नहीं मिला।
खट्टरकाका: तुम अपने सीमित ज्ञान के सहारे बकलोली कर रहे हो। बरहेता गांव में शिवा कश्यप और उसके परिवार ने गीत गोविंद पर आधारित मिथिला पेंटिंग की सीरीज चित्रित कर दिया इस परिवार ने मिथिला पेंटिंग पर दर्जनों शोधपरक पुस्तके लिखी है जाओ इन्हे पढ़ो।

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सी. सी. मिश्र: अगर इसे मिथिला पेंटिंग ना कह मधुबनी पेंटिंग कहा जाए तो आपको क्या समस्या है कला तो वही रहेगी।
खट्टरकाका: यहाँ मेरे निजी विचार और समस्या महत्वपूर्ण नहीं है। मिथिला पेंटिंग को मधुबनी पेंटिंग कह प्रचारित करना मिथिला और मैथिली विरोधियों का बहुत बड़ा षडयंत्र है जिसे तुम जैसे लोग नहीं समझते हैं और न समझना चाहते हैं। मिथिला विरोधी तो अरसे से इस अभियान में लगे हैं कि जिस जिस चीज में मिथिला जुड़ा हो उसका सर्वनाश कर दो या उसका अर्थ और क्षेत्र सीमित कर दो। और इस अभियान को समर्थन और फंडिंग करती है मगध शासन और हिंदी के एजेंडा वाले। मिथिला पेंटिंग के साथ भी यही हो रहा है वैसे ही जैसे मिथिला से मिथिलांचल हो गया फिर मिथिला को काटपीट कर सीमांचल कोशिकांचल बनाया जा रहा है। वैसे ही जैसे मैथिली को खत्म करने के लिए अंगिका और बज्जिका खड़ा किया जा रहा है। 

सी.सी. मिश्रा: लेकिन मधुबनी पेंटिंग के साथ ऐसा नहीं होगा।
खट्टारककाका: तुम मूर्ख और आत्ममुग्ध मैथिल हो जिसके घर में अगर पूस महिने में आग लग जाये तो तो वह आग बुझाने के बजाय हाथ सेंकना शुरू कर देगा। मैथिली में सम्मान प्राप्त हिंदी वाले वो घुन्ना महादेव प्रफुल्ल कुमार सिंह "मौन"  वैशाली पेंटिंग वाला खुराफात शुरू कर चुके हैं और हिंदी मगध समर्थित अंगिका वाले मिथिला पेंटिंग को मंजूषा पेंटिंग कह एक अलग शैली का योजना बना रहे हैं। और यह आग तुम्हारे जितवारपुर, रांटी, मंगरौनी तक भी जाएगी।
सी. सी. मिश्रा: लेकिन मिथिला पेंटिंग का कोई ऐतिहासिक और साहित्यिक उल्लेख तो मिलता नहीं है।

खट्टरकाका: तुम लोग अंग्रेज़िया कॉलेजिया बाबू हो। तुम लोग बुद्धि, शिक्षा और संस्कार से इतने च्युत हो कि  अगर तुम लोगों से तुम्हारा मूल- गोत्र  और पुरखे का नाम पूछ दिया जाए तो दाँत निपोड़ लोगे। तुम लोग इंटरनेटिया जेनरेशन हो। पहले के समय में विवाह तय करने से पहले लड़के वाले लड़की के संबंध में पता करते थे की लड़की को लूरिभास और लिखिया पढिया आता है कि नहीं। इसका यह अर्थ होता था कि उक्त लड़की को चित्रकला और पारंपरिक गीत का ज्ञान है कि नहीं। पेंटिंग एक गृह कल आ रही है जिसके उत्पत्ति के बारे में किसी को जानकारी नहीं है किस कला को भूमि और दीवारों पर उकेरा जाता था जो प्रकृति के प्रकोप के कारण सुरक्षित नहीं रह सकी। मांगलिक अवसरों पर बनने वाला अरिपन मिथिला पेंटिंग है। 18 वी शताब्दी के कीर्तनिया नाटककार नंदीपति ने अपने कृष्णकेलिमाला नाटक में इसका वर्णन किया है। नाटक में कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर एक कुशल महिला द्वारा आंगन में कमलपत्र चित्र अंकित किए जाने का वर्णन हुआ है। रमापति के रुक्मिणीपरिनय नाटक में रुक्मणी के विवाह के समय अरिपन बनाने का प्रसंग आया है। उसी प्रकार रमापति ने मिथिला की अरिपन कला का एक विशिष्ट प्रवेध कमल पत्र अरिपन की चर्चा की है। कोहबर चित्रण भित्ति चित्र है जो मिथिला पेंटिंग है। बहुत सारे प्राचीन पांडुलिपि मिथिला चित्रकला
से सुशोभित है। इतिहासकार प्रोफेसर राधा कृष्णा चौधरी ने अपने संग्रह में छांदोग्य विवाह पद्धति नामक ग्रंथ की एक प्राचीन चित्र पांडुलिपि के होने की सूचना दी हुई है। मेरे घर में ऐसे दर्जनों प्राचीन ज्योतिष शास्त्र संबंधित पांडुलिपि हैं जिस पर मिथिला चित्रकारी देखने को मिलती है। मिथिला की संपूर्ण तंत्र पद्धति तो मिथिला पेंटिंग में छुपी हुई है। तो अब यह बताओ उस समय यह सभी चित्र क्या मधुबनी की महिलाओं ने आकर बनाया था क्या। पूर्णिया में क्या मधुबनी की महिलाएं जाकर चित्र करती थी।

सी.सी. मिश्रा: कक्का मिथिला और मैथिली के नुकसान की कीमत पर इसे  मधुबनी पेंटिंग क्यों कहें।

खट्टरकाका: हौ मधुबनी वाले विशेष ज्ञानी है। मिथिला पेंटिंग को देश विदेश में बेचकर धन्ना सेठ बने माफिया नहीं चाहते हैं कि इस चित्रकला को समग्र मिथिला की कला माना जाए क्योंकि ऐसे में राज्य और केंद्र से आने वाले सहायता अनुदान का बंटवारा हो जाएगा। जिस  मिथिला पेंटिंग को एक खास योजना के तहत मधुबनी पेंटिंग कहा जा रहा है उस पेंटिंग को बेच कर माफिया वारे न्यारे हो रहे हैं जबकि कलाकार बदहाली में जी रहे हैं। उनको उनके समय, कल्पनाशीलता और श्रम के एवज में दमरी तक नहीं दिया जाता है। हमारी माताएँ और बहनें आजीविका कमाने के साथ साथ कला को बचाने के लिए अपनी आँख खराब करती हैं जिनकी कला को बेच बेच कर माड़वारी व्यापारी सांढ़ हो गया है। कभी उन कलाकारों के भी हाल समाचार पूछ लो।

विजय देव झा के फेसबुक पेज से साभार

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