पाकुड़ मनरेगा घोटालाः बीपीओ की ज्वानिंग 2013 की और कार्रवाई हुई 2011 की योजना पर, जिन्होंने 25 लाख रुपए की बंदरबांट की वो सभी महफूज

Publisher NEWSWING DatePublished Thu, 02/08/2018 - 16:43

Akshay Kumar Jha

Ranchi/Pakur: जिस जिले में रोजगार के दूसरे साधन नहीं हैं, वहां सरकारी योजनाओं में लूट किस कदर हैवह पाकुड़ में हो रहे मनरेगा घोटाला को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है. केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा देश में गरीबों को रोजगार की गारंटी देने के उद्देश्य से शुरू हुई, लेकिन पाकुड़ में कुछ अधिकारियों और बिचौलियों ने मिलकर इसे लूट-खसोट वाली योजना बनाकर रख दिया है. सबसे बड़ी बात कि घोटाले का पर्दाफाश हो जाने के बाद कार्रवाई के नाम पर आला अधिकारी अपने पसंदीदों को बचाने में लगे हैं और मामले में उन्हें फंसाया जा रहा है, जो योजना के वक्त उस प्रखंड में कार्यरत ही नहीं थे.

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एक ही जमीन पर दो बार बना तालाब, लूट लिए 25 लाख रुपए

पाकुड़ के अमड़ापाड़ा प्रखंड की पचुवाड़ा पंचायत में देवी लाल मुर्मू की जमीन पर दो बार तालाब बनाया गया. एक बार वित्त वर्ष 2009-10 में और दोबारा 2010-11 में. करीब 16 लाख की इस योजना की पूरी राशि प्रखंड में कार्यरत अधिकारी और कर्मियों ने डकार ली. दोबारा फिर से लूट के इरादे से योजना की शुरुआत की गयी. इस बार भी करीब 16 लाख रुपए डकारने की बात थी, लेकिन बिचौलिए और प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ करीब नौ लाख रुपए ही लग पाए. जाहिर तौर पर इस लूट में वो सभी लोग शामिल थे, जो उस वक्त पाकुड़ में अमड़ापाड़ा प्रखंड में मनरेगा योजना को देख रहे थे, लेकिन फिर भी गौर करने वाली बात ये है कि  कार्रवाई उनपर होती है, जो बाद में प्रखंड में पदास्थापित होते हैं.

घोटाला हो और उसमें फंसे भी ना, यह काम कोई बच्चों का नहीं

घोटाले को बड़ी चालाकी से अंजाम दिया गया. पकड़े जाने पर उतनी ही चालाकी से बचने का भी काम मामले में फंसे बिचौलिए और प्रशासनिक अधिकारी कर रहे हैं. लूट के इरादे से दोबारा जब देवी लाल मुर्मू की जमीन पर काम शुरू किया गया. योजना की मस्टररोल के मुताबिक 2011 के जनवरी महीने में एक तारीख से लेकर सात तारीख तक काम हुआ. वहीं सितंबर महीने में तीन तरीख से लेकर नौ तारीख तक काम हुआ. एमबी यानि (मेजरमेंट बुक) की रिपोर्ट के मुताबिक (जिसे कनीय अभियंता तैयार करते हैं) योजना की 85 फीसदी राशि निकाली जा चुकी थी. 15,69000 की योजना में 13,45473 राशि विपत्र के रूप में दिखायी गयी थी. वहीं 8,38353 रुपए की निकासी हो चुकी थी. योजना की बची 4,34470 राशि की मांग एमबी में की गयी थी. यह रिपोर्ट 29 सितंबर 2012 की है.   

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जिस बीपीओ पर कार्रवाई हुई, वो घोटाले के वक्त कार्यरत ही नहीं

इसके बाद इस योजना में घोटाले का पर्दाफाश हो जाता है. इस घोटाले में तीन लोगों पर कार्रवाई होती है. बीपीओ गोपाल गौतम की संविदा रद्द कर दी जाती है, लेकिन चौंकाने वाली बात ये कि बीपीओ गोपाल गौतम 13 मार्च 2013 को पाकुड़ के अमड़ापाड़ा प्रखंड में अपना योगदान देते हैं. योजना की 85 फीसदी राशि की बंदरबांट इससे पहले ही हो चुकी होती है. लेकिन फिर भी कार्रवाई के रूप में संविदा उस बीपीओ की रद्द की जाती है, जो घोटाले के वक्त अमड़ापाड़ा प्रखंड में कार्यरत ही नहीं थे. मामले को लेकर गोपाल गौतम ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. पीएमओ और सीएमओ में भी शिकायत दर्ज करायी गयी है. जल्द ही वो सारे नाम सामने आने वाले हैं, जिन्होंने 25 लाख रुपए की बंदरबांट की.

इन लोगों की जवाबदेही थी योजना की

योजना में घोटाला उसकी शुरूआत से ही शुरू हो चुका था. लाखों रुपए की बंदरबांट हो चुकी थी, लेकिन उनलोगों में से किसी पर कोई कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है, जिनकी योजना को लेकर जवाबदेही बनती है. सभी की नौकरी भी जारी है. योजना में जब लूट हो रही थी, तो उस वक्त प्रखंड के बीडीओ रोशन शाह थे (जो फिलहाल पाकुड़ सदर के बीडीओ हैं), बीडीओ ज्ञानेंद्र कुमार (ये अभी दुमका के रानेश्वर प्रखंड में बीडीओ हैं)बीपीओ सुधांशु शेखर सिंह थे (जो फिलहाल देवघर सदर ब्लॉक में बीपीओ हैं), कनीय अभियंता संजय कुमार अग्निवेश थे, पशुपालन पदाधिकारी डॉ. दिलीप थे. मनरेगा सहायक सर्वेश कुमार थे (यह अभी हिरणपुर प्रखंड में मनरेगा सहायक हैं. RTI से यह खुलासा हुआ है कि डीसी ने डीडीसी से पूछा है कि इनपर कार्रवाई क्यों नहीं हुई है). मामले को लेकर बीपीओ गोपाल गौतम (जो योजना के वक्त पाकुड़ के अमड़ापाड़ा ब्लॉक में कार्यरत ही नहीं थे), पंचायत सचिव जाकिर हुसैन और रोजगार सेवक सत्येंद्र कुमार पर प्रशासन ने अपना डंडा चलाया है.

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