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#JharkhandPolice की लापरवाहीः मृतक पर टेरर फंडिंग का केस, निर्दोष को भी जेल भेजने का आरोप

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Saurav Singh

Ranchi:  झारखंड पुलिस फरार अपराधियों और नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई में अपनी लेटलतीफी के लिए अक्सर आरोप झेलती है. लेकिन झारखंड पुलिस का एक कारनामा इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है.

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पिछले दो महीने में लापरवाही के ऐसे तीन मामले सामने आए है. जिनमें झारखंड पुलिस पर टेरर फंडिंग के मामले में मृतक लोगों पर केस करने का आरोप लगा तो वहीं चतरा और धनबाद में निर्दोष लोगो को जेल भेजने का आरोप लगाया गया है.

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राज्य में जहां एक तरफ पुलिस जनता की रक्षा करने की बात कहती है तो वहीं दूसरी ओर कुछ मामले में पुलिस अपनी झूठी वाहवाही लूटने के लिए गलत अनुसंधान कर निर्दोष को जेल भेज रही है. राज्य में पुलिस के गलत अनुसंधान के कारण कई लोगों को निर्दोष होते हुए भी जेल जाना पड़ा है.

राज्य में इस तरह के कई मामले सामने आये हैं, जिस वजह से पुलिस अपनी ही कार्यप्रणाली को लेकर सवालों से घिर गयी है. जानिए ऐसे राज्य पुलिस के लापरवाही के तीन मामले.

गांजा तस्करी के आरोप में भेजा था जेल देनी पड़ी क्लीन चिट

धनबाद पुलिस ने 25 अगस्त 2019 को पश्चिम बंगाल के जिस ईसीएल कर्मचारी चिंरतीज घोष को गिरफ्तार कर गांजा तस्करी के आरोप में जेल भेजा था, उसी को क्लिनचीट देनी पड़ी. चिंरतीज घोष को धनबाद कोर्ट से जमानत मिल गयी.

वह एक अक्टूबर को जेल से रिहा हुआ. लेकिन इस पूरे प्रकरण से पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं. दरअसल, निरसा थाना क्षेत्र में पुलिस ने 25 अगस्त 2019 को 40 किलो गांजा बरामद किया था. इसके बाद मीडिया के सामने आकर एसडीपीओ विजय कुमार कुशवाहा और थाना प्रभारी उमेश प्रसाद सिंह ने अपनी पीठ थपथपाई थी.

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गांजा बरामदगी को बड़ी उपलब्धि बताया था. साथ ही यह भी कहा था कि एसएसपी के निर्देश पर यह कार्रवाई हुई. गांजा टबेरा गाड़ी में रखा हुआ था. पुलिस की कहानी के अनुसार, छापेमारी के दौरान चालक और तस्कर भाग निकले थे. बाद में पुलिस ने ईसीएल के झांझरा प्रोजेक्ट के कर्मचारी चिरंजीत घोष को गांजा तस्कर बताते हुए गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था.

दोषी की बजाये चतरा पुलिस ने निर्दोष को कोर्ट में किया पेश

चतरा जिले के टंडवा थाना पुलिस के द्वारा निर्दोष युवक को दोषी बनाकर कोर्ट में पेश करने का मामला सामने आया है. युवक का नाम मनीष कुमार सिंह है. अपनी खामियों को छिपाने की नीयत से मामले के जांच अधिकारी ने असली दोषी के ढूंढने की जगह निर्दोष युवक मनीष कुमार सिंह को गिरफ्तार किया और फिर फर्जी नाम से जेल भेज दिया.

हालांकि इस मामले का जल्द पर्दाफाश हो गया. आइओ सचिदानंद सिंह की इस हरकत के लिए जज ने कोर्ट में ही पुलिस को फटकार लगायी और युवक को छोड़ने का आदेश दिया. दरअसल, टंडवा थाना में दर्ज कांड संख्या 112/18 में लेकु सिंह नामक शख्स को गिरफ्तार करना था.

लेकिन कार्रवाई करते हुए मामले के आइओ सचिदानंद सिंह ने लेखु के बजाय गांव के ही मनीष कुमार सिंह नाम के निर्दोष युवक को गिरफ्तार कर उसका चालान कर दिया था. इतना ही नहीं, आइओ ने मामले में मनीष के नाम के बाद उर्फ लेखु लिख दिया था.

टेरर फंडिंग के मामले में मृतक व्यक्ति पर केस करने का आरोप

चतरा जिले के मगध, आम्रपाली, अशोका और पुरनडीह कोल परियोजनाओं से लेवी वसूली से जुड़े टेरर फंडिंग के मामले में मरे हुए लोगों पर भी पुलिस ने एफआइआर दर्ज कर दी है. पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब एफआइआर में आरोपी बनाए गए जानकी महतो की पत्नी सीमा देवी ने मामले की निष्पक्ष जांच कराने के लिए गृह सचिव और डीजीपी से गुहार लगायी.

सीमा देवी ने कई ऐसे साक्ष्य उपलब्ध करवाए जिनसे यह पता चलता है कि कई मृत व्यक्तियों पर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की है. बता दें कि चतरा पुलिस ने टीपीसी उग्रवादियों के संरक्षण में पैसा उगाही को लेकर विस्थापित विजैन ग्रामीण संचालन समिति और ट्रांसपोर्टरों पर एफआइआर दर्ज की थी.

गिरफ्तार आरोपियों के जुर्म कबूलने पर पुलिस ने 77 लोगों को नामजद आरोपी बनाया था. सीमा देवी के मुताबिक, सुरेश गंझू, बांधो उरांव की मौत हो चुकी है. लेकिन इनकी संलिप्तता बताते हुए भी प्राथमिकी दर्ज कर दी गई. सीमा देवी ने दावा किया है कि जांच में कुछ अन्य आरोपी भी मृत निकलेंगे. उन्होंने कहा कि पुलिस ने गलत तथ्यों पर एफआइआर दर्ज की है.

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