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सालाना 2 हजार करोड़ का ‘खेल’

|| झारखंड में डेंटल कॉउंसिल अध्यक्ष का फर्जीवाड़ा ||
रांचीः वनांचल डेंटल कॉलेज और डेंटल कॉउंसिल अध्यक्ष की मिलीभगत से हुए फर्जीवाड़े का खुलासा आज भले ही चंद सुर्खियों में सिमटता दिखे लेकिन सीबीआई ने जो जांच शुरू की है उसका दायरा बढ़ा तो देश भर में हड़कम्प मच सकता है। केवल डेंटल कॉउंसिल ऑफ इंडिया ही नहीं इसी सरीखे, मेडिकल कॉउंसिल ऑफ इंडिया, होमियोपैथी कॉउंसिल ऑफ इंडिया, आयुर्वेद और युनानी काउंसिल, आदि संस्थाएं ऐसी हैं जिनका कमोबेश ‘वर्किंग पैटर्न’ यही रहा है। यूं तो इन संस्थाओं का गठन इसलिए किया गया था कि इसमें चुनकर आये जानेमाने विद्वान पेशेवर अपनी सूझबूझ और लम्बे अनुभवों के बूते देश में इन विधाओं को लगातार उच्चस्तरीय मुकाम दिलायें और उच्चशिक्षा का स्तर बढ़े। लेकिन हालिया घटनाएं इशारा कर रही हैं कि नेक नीयत से बनायी गई ये संस्थाएं भ्रष्टाचार का गढ़ बनती जा रही हैं। पिछले दिनों मेडिकल काउंसिल के चेयरमैन केतन देसाई का जेल जाना, होमियोपैथी काउंसिल के रामजी सिंह का बीस लाख घूस लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया जाना और अब डेंटल कॉउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन दिव्येंदु मजुमदार सहित कई लोगों के खिलाफ सीबीआई छापामारी बता रही हैं कि हमारी ये संस्थाएं कैसे अकूत धन उगाही का केंद्र बन गई हैं। तय मानदंड और अहर्ताओं को पूरा नहीं कर पानेवाले निजी मेडिकल कॉलेजों, डेंटल कॉलेजों, आदि को मान्यता प्रदान करने के बदल भारी वसूली की जाती है। अधूरे अहर्ताओं के बावजूद कॉलेज में सीटों की संख्या दोगुनी कर दी जाती है और उन सीटों की बोलियां लगती हैं, जो प्रति सीट 10 लाख तक होती हैं। इसके अलावा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल का दर्जा, पोस्ट ग्रैजुएट शिक्षा की छूट, आदि कुछ ऐसे हथकंडे बन गए हैं जिससे हर साल करोड़ों के वारे न्यारे किये जा रहे हैं। जानकार मानते हैं कि देश भर में इन रैकेटियरों के ठिकाने खंगाले जाएं तो दो हजार करोड़ सालाना का गोरखधंधा खुल जाएगा।

पिछले दिनों एरनाकुलम हाईकोर्ट में दायर एक रिट याचिका पर केंद्र के निर्देशानुसार सीबीआई ने डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष दिव्येंदु मजुमदार, पलामू स्थित वनांचल डेंटल कॉलेज के चेयरमैन दिनेश सिंह, पलामू के नीलाम्बर पीताम्बर यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी फिरोज अहमद सहित कई लोगों के रांची, पलामू, कोलकाता, दिल्ली आदि ठिकानों पर छापामारी की। इसी प्रसंग में दिव्येंदु मजुमदार एवं वनांचल डेंटल कॉलेज तथा नीलांबर पीतांबर यूनिवर्सिटी के बीच का झगड़ा झारखंड हाईकोर्ट पहुंच चुका है। दरअसल, मामले की भनक मिलते ही युनिवर्सिटी ने शिक्षक के तौर पर बहाल दिव्येंदु मजुमदार का वह एप्वायंटमेंट रद्द कर दिया जिसके बूते वह डेंटल कॉउंसिल के चेयरमैन पद पर आसीन थे। बताते चलें कि इस पूरे रैकेट का केंद्रबिंदु झारखंड के पलामू स्थित वनांचल डेंटल कॉलेज रहा है। मामले की तह में जाने के लिए न्यूज विंग ने वरिष्ठ प्रशासक रहे झारखंड हाईकोर्ट के ऐडवोकेट डॉ ए के सिंह से बातचीत की। डॉ सिंह झारखंड राज्य के मुख्य सचिव एवं शिक्षा सचिव रह चुके हैं। इन दिनों वह नीलांबर पीतांबर यूनिवर्सिटी के प्रिंसिपल लीगल ऐडवाइजर की हैसियत से इस पूरे मामले में झारखंड हाईकोर्ट में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। पढ़िये डॉ सिंह से न्यूज विंग की पूरी बातचीत:

नीलाम्बर पीताम्बर युनिवर्सिटी के प्रिंसिपल लीगल ऐडवाइजर और झारखंड सरकार में मुख्य सचिव व शिक्षा सचिव रहे डॉ ए के सिंह (अशोक कुमार सिंह)
से न्यूज विंग संपादक की बातचीत पर आधारितः

केतन देसाई पहला व्यक्ति था जो ऐसे मामले में जेल गया। वह मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष थे। उनकी तीन विषयों में महारत थी, पहला ऐसे निजी मेडिकल कॉलेजों को मान्यता दिलाना जो तय अहर्ताओं को पूरा नहीं करते। साल दर साल उनकी मान्यता को एक्सटेंड किया जाता। बदले में पैसे का खेल होता। और, यह अवैध धन सभी संबंधित प्रशासकीय व्यक्तियों में बंटता। केंद्रीय सचिवालय से लेकर राजनीतिक हस्तियों तक। इस खेल को सभी जानते रहे। वे शीर्ष पर बैठे लोग ही ऐसे दक्ष लोगों का चुनाव करते जिनका इस अवैध धंधे में विशेषज्ञता हासिल होती। दूसरा पहलु होता, ऐसे कॉलेजों में सीटों की संख्या बढ़ाना। सामान्यतः एमबीबीएस के लिये सीटों की संख्या 50 होती है। लेकिन इसे 150 तक विस्तारित किया जा सकता है। इसके लिए बहुत छोटे बदलाव की जरूरत होती है। अगर आपके पास पर्याप्त संख्या में प्रोफेसर हैं तो इसे 100 और फिर 150 सीटों तक बढ़ाया जा सकता है। यह जानकारी मुझे तब हुई जब मैं इस राज्य का चीफ सेक्रेटरी हुआ करता था। ..तो इस तरह, अवैध धन लेकर मान्यता विस्तार करना, और फिर सीट बढ़ाकर ऐडमिशन के स्तर को विस्तार किया जाना। सभी जानते हैं कि ऐसे मेडिकल कॉलेजों में पैसे के बूते कैसे ऐडमिशन हुआ करते हैं!.. सीटों की बोलियां लगती हैं। ..अब बताते हैं, वे पैसे कैसे कमाते हैं.. नियम यह रहा है कि राज्य में जितने प्राइवेट मेडिकल कॉलेज हैं, सभी मिलकर अपनी परीक्षा आयोजित करें और उस परीक्षाफल के आधार पर विद्यार्थियों का बिना कैपिटेशन फीस के ऐडिमिशन लें। लेकिन यह केवल सैद्धांतिक था.. वास्तव में होने लगा यह कि पैसे लेकर ऐडमिशन होने लगे और परीक्षा के वक्त उन्हें चुपके से क्वेश्‍चन (प्रश्‍नपत्र) बता दिये जाते। चूंकि इन्हीं को परीक्षा लेनी है, इन्हीं को परीक्षापत्र जांचना है और इन्हीं को ऐडमिशन लेना है। उन्होंने ऐडमिशन के लिए पहले ही पैसा ले लिया तो उसे कैसे फेल करा देंगे! ..तो यह रैकेट चला। लेकिन, मुख्य न्यायाधीश अल्तमश कबीर के जजमेंट ने इस पद्धति को उलटते हुए फैसला सुनाया कि सभी कॉलेजों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक ही परीक्षा होगी। सरकार ने रिव्यू फाइल किया और अभी ‘नीट’ का यह ऑर्डर आया है।

इसके अलावा रैकेट में यह भी था कि पीजी में ऐडमिशन के लिए भी अवैध कमाई होती थी और सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पीटल दर्जा दिलोने के लिए भी उगाही होती रही। इस रैकेट में तो बार कॉउंसिल ऑफ इंडिया के लोग भी इन्वॉल्व थे। और अभी अभी यहां का एक ऐडवोकेट ‘मिलन डे’ जेल भेजा गया है। इस मिलन डे का नाम हाई कोर्ट जज के लिए भेजा गया था, लेकिन वह पकड़ा गया और उसको सजा हुई। ..मैं उन रेगुलेटरी बॉडीज के बारे में व्यापक स्वरूप बताने की कोशिश कर रहा हूं जो भ्रष्टाचार के गढ़ बन चुके हैं.. केतन देसाई पकड़ाया, जेल गया.. अभी दो महीना पहले होमियोपैथी कॉउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन रामजी सिंह नकद 20 लाख रूपयों के साथ रंगे हाथ पकड़े गए.. वैसे मान्यता प्रदान करने के मामले में घूस लेते हुए पकड़े गए।

अब बात करते हैं डेन्टल कॉलेजों की.. यानी दिव्येन्दु मजुमदार मामले की.. कोलकाता का निवासी है.. वहां से चला और किसी तरह से खुद को डेन्टल कॉउन्सिल ऑफ इंडिया में एलेक्ट करवाया, और चेयरमैन बन गया। जब वहां उसके कार्यकाल का पांच साल पूरा होने लगा तो फिर से चुने जाने के लिए उसने रैकेट रचा। ..द मोस्ट फर्टाईल ग्राउन्ड व्हेयर एवरीथिंग इज सेलेब्ल इज झारखंड..! (झारखंड वह सबसे उर्वर जमीन है जहां सबकुछ बिकता है!) ..चाहे वह राज्यसभा की सीट हो या कोई भी ऐसी चीज नहीं जो झारखंड में नहीं बिकती!.. दुनिया भर में जो चीज नहीं मिले, चले आइये झारखंड। मनमाफिक पैसे दीजिए, वह चीज यहां आपको मिल जाएगी। ..शायद इसलिए दिव्येन्दु ने भी सोचा होगा कि ‘झारखंड ही वह जगह है जहां मैं वह चारों चीजें पा सकता हूं जिसकी मुझे जरूरत है, पहली.. मैं एक प्रोफेसर के तौर पर कहीं बहाल हो जाउंगा, दूसरी.. मैं दोबारा डेन्टल काउंसिल ऑफ इंडिया में एलेक्ट हो जाउंगा और तीसरी.. मैं पुनः वहां काउंसिल का चेयरमैन बन जाउंगा और चौथी चीज.. मैं झारखंड को अपना ऐसा सेंटर बना सकता हूं जहां से पूरे देश में रैकेट चला सकूं। पैसे यहां एकत्र किये जाएंगे, फिर यहां से मुझे दिल्ली में मिल जाएंगे जहां मैं अपने आकाओं को पहुंचाता रहूंगा।’ ..वह पलामू के वनांचल डेन्टल कॉलेज एंड हॉस्पीटल पहुंचा जिसे दिनेश सिंह चला रहे थे। ..मैं यहां पहले ही स्पष्ट कर दूं कि पलामू के नीलाम्बर पीताम्बर यूनिवर्सिटी में डेन्टल फैकल्टी है ही नहीं। दूसरी बात, इस यूनिवर्सिटी का अपना कोई सीनेट अब तक गठित नहीं हुआ है। ..दिनेश सिंह ने वहां के तत्कालीन कुलपति फिरोज अहमद को एक चिठ्ठी लिखी.. (मैं फिरोज अहमद का नाम बहुत सम्मान से लेता हूं क्योंकि वह आदमी बेईमान नहीं है! वह बेचारे तो इस केस में बेवजह फंस गए हैं!.. - डॉ ए के सिंह) ..तो मैं बता रहा था ..दिनेश सिंह ने दिव्येंदू मजुमदार के बारे प्रशंसा के पुल बांधते हुए फिरोज अहमद को पत्र लिखा कि इन्हें निःशुल्क प्रोफेसर के तौर पर बहाल कर लीजिए, विश्‍वविद्यालय की छवि में बढ़ोतरी हो जाएगी!.. इस बीच दिनेश सिंह यूनिवर्सिटी के नीचे के पदाधिकारियों को ‘ऐन केन प्रकारेण’ अपने पक्ष में कर चुके थे। दिव्येंदू मजुमदार की उस संचिका को इस तरह से तैयार किया गया कि उनकी बहाली कर देने में कोई अड़चन नहीं आती। अपने कनीय अधिकारियों की अनुशंसाओं के आधार पर सीधे सादे फिरोज अहमद ने भी कोई जिरह किये बिना ‘ओके’ कर दिया। और दिव्येंदु मजूमदार उस युनिवर्सिटी के नेशनल विजिटिंग प्रोफेसर ऑफ डेन्टिस्ट्री के तौर पर बहाल हो गए। यूनिवर्सिटी के टीचर हो जाने के बाद अब उन्होंने खुद को एलेक्ट भी करवा लिया, लेकिन ऐसे फैकल्टी की ओर से जिसका उस विश्‍वविद्यालय में कोई अस्तित्व ही नहीं था। दरअसल, नीलाम्बर पीताम्बर यूनिवर्सिटी में ‘डेन्टिस्ट्री’ नाम की फैकल्टी है ही नहीं। यही नहीं.. नियमतः यह चुनाव उस विश्‍वविद्यालय के सीनेट द्वारा आयोजित और संचालित किया जाना चाहिए था, लेकिन विश्‍वविद्यालय में सीनेट का अस्तित्व भी नहीं है।

बहरहाल, सबकुछ फर्जी तरीके से हुआ और दिव्येंदु फिर से डीसीआई (डेन्टल कॉउंसिल ऑफ इंडिया) के चेयरमैन हो गए। चेयरमैन बनते ही उसने पहला काम किया कि वनांचल डेन्टल कॉलेज की सीटें पचास से बढ़ाकर सौ कर दी.. वही पुराना रैकेट.. यानी 50 अतिरिक्त ऐडमिशन और प्रति ऐडमिशन ‘दस लाख’! ..और यही सिलसिला हर साल.. दूसरा काम उसने इस कॉलेज को पोस्ट ग्रैजुएशन कराने की मान्यता भी दे दी। तीसरा.. यह कॉलेज मान्यता की अहर्ताओं को पूरी नहीं करता था, उसे भी नजरंदाज कर दिया गया।

कहानी अभी खत्म नहीं हुई है.. इस पूरे प्रकरण से कुछ लोग एग्रिव्ड थे, उन्होंने केरल के एरनाकुलम हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर दी। हम तबतक इस यूनिवर्सिटी के प्रिंसिपल लीगल ऐडवाइजर हो गए थे.. जब एरनाकुलम हाई कोर्ट में केस हुआ तो मेरे पास फाइल आयी, कहा गया जवाब तैयार करना है!.. यह एक साल पहले की बात है। मैं फाइल देख कर ही कह दिया था कि यह केतन देसाई जैसा ही केस है मामला गंभीर है। उस रिट पिटीशन में यूनियन ऑफ इंडिया भी पार्टी बना दी गई। वो मैटर चला गया दिल्ली। मैंने पूरी फाइल गहराई से पढ़ने के बाद यूनिवर्सिटी को सलाह दी, पहली.. उस अप्वायंटमेंट को कैन्सिल करें, दूसरी.. उस एलेक्शन को कैन्सिल करें और तीसरी.. उस डेन्टल कॉलेज की मान्यता का पुनर्मूल्यांकन करें। लेकिन, मेरी इस फाइल को वहां के लोग छह महीनों तक दबाकर बैठ गए। ..दरअसल यूनिवर्सिटी के लोग बुरी तरह डर गए थे.. कहते, ‘इन्होंने तो हमें ही दोषी बता दिया..’ मैं कहता, गलती हुई है तो उसे स्वीकार कीजिए और सुधार कीजिए.. और इसी बीच.. एरनाकुलम हाई कोर्ट की कॉपी पर केंद्र सरकार ने पूरे मामले को सीबीआई को सौंप दिया। यह खबर यहां यूनिवर्सिटी के पास पहुंची तो अफरा तफरी मची। मेरे पास आये, मैंने शो कॉउज तैयार किया, जवाब आया तो यूनिवर्सिटी ने उसपर निर्णय लिया और दिव्येंदू के एप्वायंटमेंट और एलेक्शन दोनों को कैंसिल किया। और सारे संबंधों को समाप्त करके भारत सरकार को जानकारी दे दी। यूनिवर्सिटी के कैन्सिलेशन को वनांचल डेंटल कॉलेज की तरफ से झारखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। वनांचल डेंटल कॉलेज की तरफ से दस वकील दिल्ली से आये जिसमें नामचीन वकील अजीत कुमार सिन्हा भी थे। उनके खिलाफ बहस मैं कर रहा था। जस्टिस एच सी मिश्रा की अदालत में पूरे मामले पर बहस के बाद कैन्सिलेशन ऑफ एप्वायंटमेंट को अपहोल्ड कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि यूनिवर्सिटी द्वारा दिव्येंदु की बहाली को कैन्सिल करना न्यायसंगत प्रक्रिया है। और साथ ही कोर्ट ने एलेक्शन के कैन्सिलेशन को स्टे करते हुए बताया कि यह भारत सरकार की शक्ति का मामला है। बहरहाल, अब सीबीआई जांच शुरू हुई है, आशा है व्यापक कार्रवाई होगी। पूरे देश के ऐसे मेडिकल कॉलेजों की गहराई से जांच हो जाए तो 70 से 80 फीसदी कॉलेज ऐसे होंगे जो तय अहर्ताओं के बिना लंबे समय से चल रहे हैं और उसकी आड़ में भारी रैकेट चलता रहा है। गहराई से जांच हो जाए तो यह पूरा मामला कम से कम 2,000 करोड़ के धंधे का खुलासा कर सकता है।

- रिपोर्ट : किसलय

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