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महिलाओं में आम है फाइब्रॉयड की समस्या

पवन ठाकुररांची, 05 अगस्त :  महिलाओं की सहन शक्ति की तुलना अक्सर ही पृथ्वी के साथ की जाती है. ऐसा इसलिए क्योंकि बचपन के पूरी तरह विदा लेने से पहले ही लड़की का सामना मासिक धर्म के रूप में एक ऐसे दर्द से होने लगता है जो बुढ़ापे के आगमन तक उसका पीछा नहीं छोड़ता. विदा लेने के बाद भी यह उसके लिए तमाम तरह की शारीरिक परेशानियां छोड़ जाता है. इसके अलावा ताउम्र महिलाओं को छोटी-बड़ी शारीरिक समस्याओं का सामना करना ही पड़ता है. बढ़ती उम्र के साथ महिलाओं को जिन शारीरिक परेशानियों से गुजरना पड़ता है उनमें से एक प्रमुख समस्या है फाइब्रॉयड (गर्भाशय की रसौली). आज लगभग 50 फीसदी महिलाएं फाइब्रायड की शिकायत से ग्रस्त है. फाइब्रॉयड से जुड़ी परेशानियां और उनके निवारण पर रोशनी डाल रही हैं देबुका नर्सिंग होम की स्त्री एवं प्रसुती रोग विशेषज्ञ डॉक्टर रेखा देबुका.

क्या है फाइब्रॉयड

डॉक्टर रेखा देबुका का कहना है कि फायब्राइड या रसौली ऐसी गांठें होती हैं जो कि महिलाओं के गर्भाशय में या उसके आसपास जन्म लेती हैं. ये मांस-पेशियों और फाइब्रस ऊतकों से बनती हैं और इनका आकार कुछ भी हो सकता है. बहुत से मामलों में इनका वजन कई किलो तक पहुंच जाता है. आम तौर पर इसे गर्भाशय में रसौली या ट्यूमर होना कहते हैं. यह ट्यूमर कैंसर रहित होता है. यह कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का कारण बन जाती है. यह अकेली भी हो सकती है अथवा समूह में भी विकसित हो सकती है. फाइब्रॉयड का आकार मटर के दाने से लेकर खरबूजे के आकार तक का हो सकता है. फाइब्रॉयड की यह समस्या लगभग 50 प्रतिशत महिलाओं को अपना शिकार बनाती है और यह हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय का निकाला जाना) का बहुत बड़ा कारण है. इसका संबंध अक्सर ही पारिवार के इतिहास से होता है और यह परिवार के एक सदस्य से दूसरे तक आती है. इसे विकसित करने में एस्ट्रोजन हारमोन की सबसे प्रमुख भूमिका होती है. कई बार 20 वर्ष की आयु में ही इसका विकास हो जाता है.

क्यों होते हैं फाइब्रायड

फाइब्रायड की उपज महिला की प्रजनन क्षमता के कारण होती है और इसको विकसित करने में एस्ट्रोजन हार्मोन का हाथ होता है. यह हार्मोन अंडाशय (ओवेरी) में बनता है और हड्डियों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. संतानहीन महिलाओं में इसका खतरा अधिक होता है.

फाइब्रॉइड में होने वाली परेशानियां

--महिलाओं में फायब्रायड होने पर माहवारी अनियमित हो जाती है, पीरियड कभी 32 दिन तो कभी 24 दिन हो जाता है. कभी-कभी माहवारी महीने में दो बार भी हो जाती है.

-- भार उठाते ही महिलाओं को रक्त स्राव होने लगता है.

--माहवारी के दौरान बहुत अधिक रक्त स्राव होने लगता है.

--पेट के के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत अकसर रहने लगती है. कई बार इससे महिलाएं तनावग्रस्त भी हो सकती हैं.

--कुछ महिलाओं में फाइब्राइड होने पर दर्द महसूस भी नहीं होता.

--फाइब्रायड के कारण यौन संबंध के समय दर्द, बार-बार पेशाब करने की इच्छा, बड़ी आंत पर दबाव और कब्ज जैसे अन्य लक्षण भी हो सकते हैं.

--अधिक उम्र में गर्भवती होने से भी फाइब्रायड का खतरा बढ़ जाता है.

--सामान्य तौर पर फायब्राइड बनने का कारण एस्ट्रोजन हार्मोन है.

--फाइब्रायड का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि फाइब्रायड गर्भाशय के किस हिस्से पर है और कितने है. फाइब्रायड का आकार कितना है, पीड़ित महिला अविवाहित है या विवाहित. ये सभी बातें इलाज के लिए महत्वपूर्ण है.

--यदि फाइब्रायड का आकार 3 से 4 सेमी से कम है, तो ऐसे में हार्मोन थेरेपी और अन्य दवाओं के द्वारा इलाज किया जाता है.

--यदि फाइब्रायड दो से अधिक होते है और उनका आकार 3 या 4 सेमी से अधिक होता है और पीड़ित महिला को रक्त स्राव ज्यादा होता है, तो ऑपरेशन के माध्यम से फाइब्रायड को निकाला जाता है. यह आपरेशन ओपन सर्जरी एवं लैपरोस्कोपी के माध्यम से होता है.

--यदि पीड़ित महिला की उम्र 40 से ज्यादा है और फाइब्रायड का आकार बड़ा है, तो इस स्थिति में पहले दवा दी जाती जाता है. यदि इससे आराम नहीं मिलता तो इंजेक्शन दिये जाते हैं. यदि इससे भी फर्क नहीं पड़ता तो फिर गर्भाशय को ऑपरेशन के माध्यम से हटा दिया जाता है.

उपचार

महिलाओं को फाइब्रॉयड की समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए मेडिकल साइंस आज कई तरह के इलाज निकाल चुका है. ओपन सर्जरी से लेकर आधुनिक लेप्रोस्कोपिक सर्जरी तक बहुत सी तरीकोंं से इसका इलाज होता है. संतानहीन महिलाओं को इसका अधिक खतरा रहता है. आमतौर पर स्त्री रोग विशेषज्ञ इसकी जांच कुछ आंतरिक परीक्षणों के माध्यम से करती हैं. अल्ट्रासांउड, सीटी स्कैन एवं एमआर जांच के द्वारा इसकी पुष्टि होती है. कई बार फाइब्रॉयड अपने लक्षण प्रकट नहीं करता और अल्ट्रासाउंड के बाद ही इसका पता चल पाता है. इसका इलाज दवाइयों तथा शल्य क्रिया और लैप्रोस्कोपी द्वारा किया जाता है. पहले अधिकतर मामलों में हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय का निकाला जाना) कराने की ही सलाह दी जाती थी, मगर अब एक नयी चिकित्सा प्रक्रिया यूट्रीन फाइब्रॉयड एंबोलाइजेशन के आ जाने से हिस्टरेटेक्टोमी कराने की जरूरत नहीं पड़ती. इस आधुनिक तकनीक के द्वारा त्वचा में बहुत छोटा सा छेद करके बच्चेदानी की रसौलियों (फाइब्रॉयड) का इलाज किया जाता है. इस प्रक्रिया में रोगी को बेहोश नहीं किया जाता और उसे अस्पताल में सिर्फ एक ही दिन रुकना पड़ता है. इस प्रक्रिया के उपरांत अधिकतर महिलाएं 1-3 दिनों में ही सामान्य रूप से अपना दैनिक कार्य करने लगती हैं और गर्भाशय को निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ती. एक ही समय में सारी रसौलियों का उपचार हो जाता है. यह प्रक्रिया इस दृष्टि से सुविधाजनक है कि इसमें रोगी महिला को बेहोश करने की जरूरत नहीं होती और वह दूसरी तकनीकों के मुकाबले अधिक तेजी के साथ स्वस्थ हो जाती है. इसके अलावा पेट पर ऑपरेशन का कोई निशान भी नहीं रहता. इस प्रक्रिया में खून का नुकसान होने या खून चढ़ाने की नौबत भी नहीं आती और यह पूरी तरह से सुरक्षित भी है.

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