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सरकारी धन से सामाजिक वैमनस्यता का प्रचार कर रही सरकार

ROOPAK RAG

RANCHI, 11 AUGUST : भारतीय संविधान में भारत एक धर्म-निरपेक्ष गणतंत्र घोषित है. अनुच्छेद 25 और 28 के तहत हरेक भारतीय नागरिक को अपनी मर्जी का धर्म चुनने और मानने का अधिकार प्राप्त है. संविधान में इस बात का भी जिक्र है कि राज्य का कोई धर्म नहीं. भारतीय गणराज्य हर धर्म के अनुयाईयों को बगैर किसी भेदभाव स्वीकार करेगा. झारखंड में भाजपा की सरकार है. जिसके मुखिया रघुवर दास हैं. सवाल उठता है कि क्या धार्मिक आधार पर वैमनस्यता को किसी संवैधानिक सरकार द्वारा बढ़ावा दिया जा सकता है.

शुक्रवार (11 अगस्त) को रांची के तमाम अखबारों में एक ऐसा सरकारी विज्ञापन छपा है, जो संविधान की मूल भावना से हट कर सामाजिक विद्वेश की भावना से परिपूर्ण है. विज्ञापन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और मुख्यमंत्री रघुवर दास की फोटो छपी है. धरती आबा बिरसा मुण्डा और कार्तिक उरांव को भी सांप्रदायिक संकीर्णता के दायरे में लाने की कोशिश की गई है. साथ ही गांधी जी का वहां एक उद्धरण है : यदि ईसाई मिशनरी समझते हैं कि ईसाई धर्म में धर्मान्तरण से ही मनुष्य का आध्यात्मिक उद्धार संभव है, तो आप यह काम मुझसे या मेरे निजि सचिव महादेव देसाई से क्यों नहीं शुरु करते. क्यों इन भोले-भाले, अबोध, अज्ञानी, गरीब और वनवासियों के धर्मान्तरण पर जोर देते हैं. ये बेचारे तो ईसा और मुहम्मद में भेद नहीं कर सकते. और न आपके धर्मोंपदेश को समझने की पात्रता रखते हैं. वे तो गाय के समान मूक और सरल हैं. जिन भोले-भाले अनपढ़ दलितों और वनवासियों की गरीबी का दोहन करके आप ईसाई बनाते हैं वे ईसा के नहीं "चावल" अर्थात पेट के लिए ईसाई होते हैं. विज्ञापन में गांधीजी ने ऐसा कहां और कब कहा था या लिखा था इसका कोई जिक्र नहीं है.

इस विज्ञापन से सरकार की आक्रामक सांप्रदायिक नीति और धर्मान्तरण निषेध विधेयक का असल मकसद और भी खुलकर सामने आ जाता है. ज्ञात हो कि रघुवर दास सरकार के शासनकाल में लगातार सांप्रदायिक सौहार्द का माहौल राज्य में खराब हुआ है. जमशेदपुर, रांची, बोकारो और हजारीबाग में दंगे हुए और कई स्थानों पर गौरक्षा के नाम पर निर्दोशों के साथ हिंसा की गई.

महापुरुषों का सांप्रदायिक वैमनस्यता के लिए इस्तेमाल

महात्मा गांधी : अगर उपरोक्त कथन राष्ट्रपिता का है तो उसका संदर्भ दिया जाना चाहिए था. विश्व भर में वे शांति और अहिंसा के प्रतिक हैं.

कार्तिक उरांव : कार्तिक उरांव बड़े शिक्षाविद और नेता थे. उन्होंने धार्मिक संकीर्णता का कभी पक्ष लिया हो, इसका कोई पुख्ता विवरण मौजूद नहीं है. वे शिक्षा की बदौलत सामाजिक क्रांति का सपना देखते थे.

बिरसा मुण्डा : उलगुलान के नायक बिरसा मुण्डा ने सभी धर्मों का तिरस्कार किया था. उन्होंने यदि मिशनरियों से खिलाफत की थी तो आनंद पांड के संसर्ग में हिन्दू रीति-रीवाजों को अपनाने के बाद अंततः उसका भी बहिष्कार किया था. उन्होंने कहा था कि सभी धर्मों का मकसद केवल लोगों का शोषण करना है. अंततः उन्होंने अपना अलग "बिरसैत" संप्रदाय बनाया.

नागपुर को खुश करने की कवायद

वर्तमान सरकार के मुखिया रघुवर दास की सारी कवायद नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय को खुश करने की मंशा से प्रेरित दिखती है. रघुवर दास अपने शासनकाल में जनहित के कार्यों के लिए कम और सरकारी हिंसा के लिए अधिक प्रशिद्ध हैं. पूरा राज्य सीएनटी-एसपीटी संशोधन बिल के कारण बीते एक साल अशांत रहा है. रामगढ़ के गोला और हजारीबाग के बड़कागांव में किसानों पर पुलिसिया फायरिंग हुई. जिसमें छह लोगों की जान गई. खूंटी के साइको में भी पुलिस की गोली से एक आदिवासी की मौत हुई. इसके अलावे छोटे-मोटे दंगों का माहौल हमेशा बना रहा. सरकारी अफसरों का गांवों में बहिष्कार किया जा रहा. मोमेंटम झारखंड केवल तमाशा साबित हुआ. इस दौरान राज्य में विकास और जनहित के कार्य ठप रहे. ऐसे में पार्टी को पूरे राज्य में जनविरोधों का सामना करना पड़ रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भाजपा रघुवर सरकार के कामों से संतुष्ट नहीं है और जल्द ही नेतृत्व परिवर्तन भी राज्य में दिख सकता है. ऐसे में रघुवर को अपनी गद्दी बचाने के लिए केवल आरएसएस का सहारा है. हिंदुत्व के प्रति समर्पित कार्यकर्ता के रूप में संघ का साथ रघुवर की मौजूदा जरूरत है. ताकि भाजपा के राजनीतिक निर्णयों को कुछ समय के लिए टाला जा सके.

सरकारी धन से सामाजिक वैमनस्यता का प्रचार

संविधान में जब धर्म-निरपेक्ष राज्य की परिकल्पना है तो किसी भी धर्म के प्रति सामाजिक विद्वेश और हिंसा को बढ़ावा देना कानून का उल्लंघन है. राजकोष से पैसे खर्च कर सामाजिक वैमनस्यता का प्रचार वह भी चुनी हुई सरकार द्वारा, देश के लोकतंत्र को कलंकित कर रहा.

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