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सरकारी विज्ञापन को लेकर ईसाई समुदाय और विपक्ष में गुस्सा

News Wing

Ranchi, 12 August: 11 अगस्त को राज्य के लगभग सभी अखबारों में छपे में एक विज्ञापन का ईसाई समाज और राज्य के विपक्ष के कई नेता विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि सरकार पब्लिक का पैसा किसी एक धर्म का प्रचार करने के लिए कर रही है. जो गलत है.

किसने क्या कहा

 टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में ईसाई समाज के कुछ बुद्धिजीवियों ने ऐसे विज्ञापन का जमकर विरोध किया है. 

-जेवियर इन्स्टिटूट ऑफ सोशल सर्विस के निदेशक एलेक्स एक्का का कहना है कि अगर सरकार ऐसे ही सरकारी पैसे का इस्तेमाल किसी एक धर्म विशेष के प्रचार करती है. और किसी दूसरे धर्म को नीचा दिखाने की कोशिश करती है तो हम कोर्ट का रुख करेंगे. 

- सामाजिक कार्यकर्ता स्टेन स्वामी ने कहा कि सरकार ने अपने विज्ञापन में आदिवासियों की तुलना गाय से की है. साथ ही ऐसा विज्ञापन समाज को बांटने का काम करता है. 

- जेएमएम के विधाक स्टीफन मरांडी ने कहा कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन करने की सरकार की मंशा पर पानी फिरने के बाद सरकार ईसाई समाज के आदिवासियों को निशाने पर रख कर ऐसे विज्ञापन निकाल रही है. शायद सरकार ऐसा करके ईसाई समाज के आदिवासियों से बदला लेना चाह रही है. 

- जेएमएम से राज्यसभा सांसद संजीव कुमार ने कहा कि भारत एक धर्मनिर्पेक्ष देश है. सरकार के दखल के बिना यहां किसी को भी कोई सा धर्म अपनाने की आजादी है. पूरे देश में धर्म को लेकर ऐसा कोई कानून नहीं है. फिर झारखंड में ऐसे कानून लाने की क्या जरूरत है. 

यह भी पढेंः सरकारी धन से सामाजिक वैमनस्यता का प्रचार कर रही सरकार

बीजेपी शांत, कांग्रेस सदन में उठाएगी मामला  

इस मामले पर बीजेपी कुछ भी बोलने से कतरा रही है. वहीं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत का कहना है कि इस मामले को सदन में उठाया जाएगा. 

क्या था विज्ञापन में

11 अगस्त को अखबार के पहले पन्ने पर छपे इस विज्ञापन में छपा है "यदि ईसाई मिशनरी समझते हैं कि ईसाई धर्म में धर्मान्तरण से ही मनुष्य का आध्यात्मिक उद्धार संभव है, तो आप यह काम मुझसे या मेरे निजि सचिव महादेव देसाई से क्यों नहीं शुरु करते. क्यों इन भोले-भाले, अबोध, अज्ञानी, गरीब और वनवासियों के धर्मान्तरण पर जोर देते हैं. ये बेचारे तो ईसा और मुहम्मद में भेद नहीं कर सकते. और न आपके धर्मोंपदेश को समझने की पात्रता रखते हैं. वे तो गाय के समान मूक और सरल हैं. जिन भोले-भाले अनपढ़ दलितों और वनवासियों की गरीबी का दोहन करके आप ईसाई बनाते हैं वे ईसा के नहीं "चावल" अर्थात पेट के लिए ईसाई होते हैं." लेकिन, विज्ञापन में गांधीजी ने ऐसा कहां और कब कहा था या लिखा था इसका कोई जिक्र नहीं है.

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