
डी एन गौतम
डी एन गौतम
|| डीएन गौतम से विशेष बातचीत || झारखंड पुलिस में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा. सवाल दक्षता पर नहीं, लेकिन महकमा लुंज-पुंज दिखाई देने लगे तो सांगठनिक क्षमता पर उंगली उठेगी. जहां मातहत हवलदार की गुहार लगाती विधवा अफ़सरों के दर पर सालों भटकती रहे, वहां बेचारी जनता की दशा का अंदाजा लगाइए.
जहां उग्रवादी हिंसा में मारे गये शहीदों का विवरण महीनों उपलब्ध न हो, वहां गैंग्सटर-क्रिमिनलों के डाटाबेस की किसे सुध. यूं ही टांय-टांय फ़िस्स नहीं होती अपराधियों-उग्रवादियों से निबटने की रणनीति! ऐसे में पुलिसिया छवि की चिंता भला किसे होगी? ब्रिटिश जमाने से पुलिस की दागदार छवि को सुधारने की दिशा में डी एन गौतम एक स्कीम लेकर आते हैं. सरकार की सहमति हासिल कर लेते हैं, लेकिन दो महीने हो गये और गौतम को यह जानकारी तक नहीं दी गयी कि राज्य के 406 थानों में से कितनी जगह इसे लागू किया गया. पूरे सेवाकाल में योग्य और साफ़-सुथरी छविवाले आइपीएस डा डीएन गौतम को कहना पड़ता है- झारखंड पुलिस की इंस्टीट्यूशनल मेमोरी तार-तार है! इंस्टीट्यूशनल मेमोरी, यानी सांगठनिक स्मृति. यह बनते-बनते बनती है, और बिगड़ते-बिगड़ते तार-तार हो जाती है. संगठन की कार्यप्रणाली और प्रबंधन की विशिष्टता. किसी टारगेट को हासिल करने और समस्याओं के समाधान का मेकैनिज्म. दुनिया के सामने संगठन की छवि, या यों कहें, अस्मिता और उसकी पहचान. आदि. गौतम कहते हैं, सांगठनिक स्मृति के व्यापक मायने हैं. गीता के अंत में कृष्ण, अर्जुन से पूछते हैं- ‘पूरी बात समझ में आयी? तो, अर्जुन कहते हैं, नष्टो मोह: समृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत । यानी, मेरा मोह नष्ट हो गया है और मेरी स्मृति जाग गयी है. यहां स्मृति का मतलब है, आप कौन हैं? पूर्वज कौन थे? आपके कर्तव्य क्या हैं आदि. गौतम की बातों से स्पष्ट मतलब निकलता है कि झारखंड पुलिस का शीर्ष महकमा अपनी सत्ता में मगन है. चिंता है तो बस इतनी कि उसके अधिकारों, उसके पावर का कोई हिस्सेदार पैदा न हो जाये. एयर कंडीशंड चैंबरों में बैठे इन अधिकारियों को शायद दीन-दुनिया से लेना-देना नहीं. यहां तक कि निचले स्तर तक, मातहतों के साथ तालमेल का घोर अभाव है. पुलिस फ़ोर्स के मनोबल की छोड़िये, नियमित मॉनिटरिंग, डॉक्युमेंटेशन तक का कोई माई-बाप नहीं. यह हाल है, देश के सबसे उग्रवादग्रस्त प्रदेश की पुलिस नौकरशाही का. जाहिर है, इन मुद्दों का झारखंडी जनता की सुरक्षा और सुरक्षा-भावना से गहरा सरोकार है. चर्चा तो यहां तक चली कि शीर्ष अधिकारियों के रवैये से नाखुश गौतम वापसी की सोच रहे हैं. डी एन गौतम जैसा अधिकारी, जो सेवाकाल के आरंभ से लेकर रिटायरमेंट तक हमेशा जनता और शासन का पहला चुनाव रहा, सेवानिवृति के बाद इस प्रदेश को एक चुनौती के तौर पर लिया, वह चंद मद-मस्त अधिकारियों के सामने टूट गये? कई ऐसे ही सवालों का जवाब टटोलते हुए प्रभात खबरने झारखंड सरकार के सुरक्षा सलाहकार डा डीएन गौतम से लंबी बातचीत की. प्रस्तुत है उसके कुछ अंश:
प्रश्न : झारखंड में बतौर सुरक्षा सलाहकार आपको छह माह हो गये. सुना जा रहा है कि आप पुलिस महकमे से नाखुश हैं. निराश भी?
जवाब : देखिए, सार्वजनिक जीवन में एक मात्र शब्द होता है कर्तव्यसंपादन, आशा-निराशा नहीं होती. इसमें लक्ष्य होते हैं. हमारे शास्त्र में आदर्श शासन का लक्ष्य एक श्लोक के रूप में पढ़ाया गया था, जिसका सार है- बरसात की घनघोर अंधेरी रात हो. 18 वर्ष की एक सुंदर युवती. गहनों से लदी हुई. अकेली, किसी भी निर्जन स्थान से निकल जाये. और किसी मरदूद की हिम्मत न हो उसकी तरफ़ देखने की. शासन में सुरक्षा का यही लक्ष्य होना चाहिए.
प्रश्न : क्या आज की तारीख में यह संभव है?
जवाब : इतिहास बताता है कि बहुत से शासनकाल में ऐसा हुआ है. मैं इसे असंभव नहीं मानता. आज के समय में भी लोग इसके करीब तक बढ़े हैं. इसलिए मैं मानता हूं कि इसे लक्ष्य मान कर हम चलें. हो सकता है वहां तक नहीं पहुंच पायें, लेकिन जहां भी पहुंच पाते हैं काफ़ी सुखद होगा. बनिस्पत इसके कि हम मान कर चलें कि ‘अरे भई कहीं न कहीं छिनतई होती रहेगी. क्राइम तो रुकनेवाला नहीं. यह तो शून्य होने से रहा.
प्रश्न : लेकिन हम ही अगर ऐसा कहेंगे तो आम आदमी के मनोबल का क्या होगा?
जवाब : हर मुंह से हर सच्चाई अच्छी नहीं लगती. बच्चे कैसे उत्पन्न होते हैं, यह बायलॉजी टीचर पढ़ाये तो ठीक है, मां-बाप का यह काम नहीं.बहरहाल, थोड़ा साफ़ कीजिए.
झारखंड में लॉ एंड ऑर्डर कैसा चल रहा है? लक्ष्य कहां तक हासिल कर पाये?
यहां पर मेरा अनुभव रहा कि हम एक समझ विकसित करने की तरफ़ बढ़े हैं. थोड़ी प्रगति हुई है, लेकिन आम आदमी तक उसका लाभ मिलने लगे उस स्थिति और वर्तमान हालात के बीच की दूरी पाटने के लिए काफ़ी तेजी से काम करने की जरूरत है.
प्रश्न : और कार्यसंस्कृति? कितना नंबर देंगे?
जवाब : व्यापक राज्य है. अलग-अलग-अलग जगह, अलग-अलग कार्य हो रहा है. कोई समग्र टिप्पणी करने से अच्छे काम कर रहे कुछ अधिकारियों का मनोबल गिर सकता है. हां, इतना कह सकता हूं कि कुछ पदाधिकारी अच्छा काम कर रहे हैं. कुछ निष्क्रिय हैं, कुछ उदासीन. कुछ जगहों पर वह सब भी हो रहा है जो नहीं होना चाहिए था. कुल मिलाकर कह सकते हैं कि निराशा जैसी स्थिति नहींहै. अलबत्ता, यह भी नहीं कि माहौल उत्साह से लबरेज हो.
प्रश्न : आप अपने पुराने अनुभवों से यहां की स्थिति का आकलन कैसे करेंगे?
जवाब : मेरे हिसाब से छह महीने हो गये. इस अवधि में तो सड़क पर पब्लिक बोलने लगती कि ‘साब देखिए, ये परिवर्तन हुआ. और, हमलोग सक्षम हैं, ऐसा करने में. बस समन्वित शक्ति के साथ क्रियान्वयन की जरूरत है. ऑर्केस्ट्रेट करने की जरूरत है.
प्रश्न : मुश्किल कहां पर है?
जवाब : इसके लिए हमें तन्मय होने की जरूरत है. लेकिन, जब हम मन-मय हो जाते हैं या कहें कि ‘मद‘-मय हो जाते हैं. अहंकार बाधा बनने लगता है. हम सोचने लगते हैं कि हम यहां के मालिक हैं, तुम सवाल पूछनेवाले होते कौन हो? देखिये, स्तुतिगान करने की मेरी कभी प्रवृति रही नहीं. (थोड़ा ठहरते हुए) सिस्टम अपनी जगह पर नहीं आ रहा है तो हमें, सबको, आत्मनिरीक्षण करना होगा. लोग श्रम कर रहे हैं.
प्रश्न : क्या उस श्रम का परिणाम जनता को मिल रहा है?
जवाब : इसके लिए, जनता से संवाद शुरू करने का निर्णय लिया गया है, जिससे थाना और जिला स्तर पर हर महीने संवाद हो. तभी आम जन और व्यवस्था के बीच जो सन्नाटा है, वह खत्म होगा.
प्रश्न : इसके अलावा भी कई कार्यक्रम शुरू करने की सलाह दी है आपने. कहां तक लागू हुआ?
जवाब : हां, दस-बारह और भी अच्छे कार्यक्रमों पर सरकार ने सहमति दे दी है. जैसे, थानों में स्थायी अग्रिमदेने का.
प्रश्न : जिस तरह आपने बिहार में शुरू करवाया?
जवाब : हां, उसका पूरी व्यवस्था पर बहुत अच्छा असर देखा गया. वहां भी समस्या आयी थी, लोग कहने लगे थाना को धन दिया जा रहा है. मैं कहता, धन तो एक माध्यम है, पुलिस के बारे में पूरी सोच बदल जायेगी. पहले, पुलिस को किसी कार्य के लिए वाहन की जरूरत होती थी, तो वह बाहरी संसाधन पर, दूसरे लोगों पर निर्भर करती थी. इससे पुलिस की छवि खराब होती थी. ज्यादातर वारदातों में आम आदमी ही शिकार होता है. और झारखंड में तो गरीब आदमी ही इसका विक्टिम होता है. वह पुलिस की यह मांग कहां से पूरा करेगा. उससे एक जिस्ता कागज मांगियेगा तो वह नहीं ला सकता.
प्रश्न : यह सिस्टम झारखंड में लागू हुआ?
जवाब : सरकार का आदेश तो पांच मई को आ चुका है, बल्कि मैं बताऊं कि इसके लिए मुङो बिहार में काफ़ी इंतजार करना पड़ा, जबकि झारखंड सरकार ने बहुत जल्द आदेश पारित कर दिया.
प्रश्न : और इसपर पुलिस विभाग की ओर से क्रियान्वयन?
जवाब : मैंने विभाग से पूछा तो बताया गया कि इसके लिए फ़ंड चाहिए. वास्तव में फ़ंड की कमी नहीं है. मामला प्राथमिकता का है. आप थाना के खर्च को प्राथमिकता देते हैं अथवा पर्दे, फ़िनाइल खरीद पर. दुर्भाग्यवश पूरे हिन्दुस्तान में थाना प्राथमिकता का विषय नहीं रहा. यह मान लिया गया कि थाना स्वयं धन अर्जित करके खर्च चलाएगा. 1902 की पुलिस आयोग ने जो तय किये थे आज भी वही सब चल रहा है.
प्रश्न : आश्चर्य. इतने महत्वाकांक्षी परिवर्तन में भी लोग हिस्सेदारी के इच्छुक नहीं?
जवाब : सुना है कुछ थानों में शुरुआत हुई है. मुङो पूरी जानकारी नहीं.
प्रश्न : आपने पुलिस मुख्यालय से पूछा तो होगा...?
जवाब : फ़ैक्ट्स एंड फ़िगर में पूछे जाने पर उन्हें अपनी तौहीन लगती है. उनके अहंकार को जैसे चोट लगती है. और मुङो ऐसा लगता है तो मैं थोड़ा पीछे हट जाता हूं. दरअसल, यहां अभी तक लोगों में फ़ैक्ट्स एंड फ़िगर के साथ बात करने की आदत नहीं बनी है.
प्रश्न : सरकारी आदेशों पर क्रियान्वयन में विलंब, आवश्यक सूचनाएं नदारद, क्या कारण है इन सबका?
जवाब : दरअसल, मॉनिटरिंग कमजोर है. सामान्य व्यवस्था में भी. जो चीजें रेगुलर आनी चाहिए, वह भी नहीं पहुंचती. आप पूछना बंद कर दोगे तो आना बंद हो जायेगा.
प्रश्न : अक्सर देखा गया है कि जब प्रशासन में विसंगति आती है तो राजनेता और नौकरशाह एक दूसरे पर उंगलियां उठाते हैं. परोक्ष ही सही, दोनों की स्पष्ट खेमेबंदी दिखती है.झारखंड में आपका अनुभव क्या कहता है?
जवाब : यहां मेरा बहुत सीमित अनुभव है. लेकिन मैं कहूंगा कि पॉलिटिशियन की तरफ़ से मेरा बहुत सुखद अनुभव रहा है. मुख्यमंत्री तक के चैंबर में मैं बेरोक-टोक जा सकता हूं. बेबाक बातचीत होती है, लेकिन पदाधिकारियों को होता है. यह मेरा एरिया, मेरा ज्युरिस्डिक्शन. बहुत सारी मोहमाया है उनकी (हंसते हुए). जबकि मैं उनकी मर्यादा, पद को हमेशा अक्षुण्ण बनाये रखने की कोशिश करता हूं. मैं खुद भी अधिकारी हूं. मैं चाहता हूं कि उनकी गरिमा को कभी ठेस न पहुंचे. सलाहकार का यह नया प्रयोग है. मैं पहला पुलिस सलाहकार बना हूं. मानता हूं कि मैं भी काम सीख रहा हूं. इसलिए मैं तो कहता हूं यहां सारे पद मुझसे वरीय हैं (हंसते हुए). जबकि, उनके पास अपने पुरखों (पूर्व के पदाधिकारियों) का अनुभव है. उनके पास पूरी लंबी इंस्टीट्यूशनल मेमोरी है, जब से पुलिस महकमा है. लेकिन दुर्भाग्यवश, झारखंड की इंस्टीट्यूशनल मेमोरी तार-तार है!
प्रश्न : तार-तार है?
जवाब : लोग कोशिश कर रहे हैं उस मेमोरी को पुनर्स्थापित करने की. कुछ अच्छे पदाधिकारी हैं जो डॉक्युमेंटेशन कर रहे हैं. जैसे सीआइडी विभाग में कुछ काम हो रहा है. अपराधी गिरोहों को चिन्हित कर उसका डाटाबेस तैयार किया गया है. उसी तरह, फ़रार लोगों की सूचनाएं एकत्र की जायें. इससे अपराध नियंत्रण में जबरदस्त लाभ मिलेगा, लेकिन जब तक ऑपरेशनल विभाग उसे प्रयोग में नहीं लाएगा, वह निर्थक पड़ा रहेगा. इन्हें धार देने की जरूरत है. गति देने की जरूरत है. आपने डॉक्युमेंट तैयार कर लिया, लेकिन डॉक्युमेंट अपने से तो दौड़ेगा नहीं, इसके लिए पहल करनी चाहिए नेतृत्व को. डॉक्युमेंटेशन ऑनगोइंग प्रक्रिया है. जैसे इस बात का भी डॉक्युमेंटेशन होना चाहिए था कि स्थायी अग्रिम प्रणाली कहां-कहां लागू हुई. सरकारी आदेश जारी हुए दो माह बीत गये. क्या इस बात का उत्तर हमारे पास है कि झारखंड के 406 थानों में से कितनों को अग्रिम पहुंच गया? अगर नहीं पहुंचा तो क्यों? बाधा क्या है? अब जैसे, पुलिसवाले जो मुठभेड़ में मारे गये, उन शहीदों के परिजनों को अनुकंपा की बहाली का मामला. पहले यह प्रावधान नहीं था, लेकिन अब तो सरकार का आदेश आ चुका है. हमारे पास उन शहीदों की सूची तो होनी चाहिए. हमारे जो बंदे शहीद हुए, उन शहीदों के नाम पते हमारे पास नहीं हैं. तो. तो यह खुश होनेवाली बात नहीं है! अब यह कहा जाये कि यह सब तो जिला स्तर पर मेंटेन होता है. अरे भई, वह कोई गोपनीय दस्तावेज तो है नहीं. जब चाहें फ़ैक्स ई-मेल से मंगा सकते थे. सलाहकार को छोड़िये, यह सब तो आम आदमी भी आरटीआई के तहत मांगे तो महीना भर में देना है. और सलाहकार की हैसियत से हम कोई इन्फ़ॉर्मेशन चाहते हैं तो महीनों क्यों?
प्रश्न : जाहिर है, इससे पता चलता है कि पुलिस महकमा कैसा चल रहा है, और पुलिस फ़ोर्स में कैसा माहौल है?
जवाब : (थोड़ा अंतराल के बाद) मैं अंडमान-निकोबार गया था. सेल्युलर जेल देखने. कितनी कुर्बानियां उन्होंने दीं! उन्होंने किसलिए कुर्बानियां दीं? इसलिए कि जो बंदे बाद में आयेंगे लूट-खसोट में जुट जायेंगे? अब यहां जैसे, शहीद पुलिसकर्मियों के आश्रितों की बहाली (अनुकंपा पर) का मामला है. पुलिस महकमे की शिकायत रहती थी कि प्रस्ताव डीसी के पास पड़े रहते हैं. पावर केवल डीसी के पास है. इससे पुलिस की ऑथोरिटी अंडरमाइन होती है. यह पावर पुलिस के पास होना चाहिए. मुख्यमंत्री जी ने पहले आश्वासन दिया था. मुझसे चर्चा हुई तो मैंने कहा, सर कर दिया जाये. उन्होंने तुरंत होम सेक्रेटरी साब को कहा, फ़ाइल मंगवाइये. मैं वहां मौजूद था. होम सेक्रेटरी स्वयं उस विभाग में गये जहां फ़ाइल लंबित थी, स्वयं उस टेबुल से फ़ाइल लेकर आये. और मुख्यमंत्री जी ने मंत्रिमंडल की प्रत्याशा में अनुमोदन कर दिया. आदेश हो गया. अब आज की तारीख में हमारा सरोकार होना चाहिए कि उन लंबित मामलों का क्या हुआ, कितने मामले लंबित पड़े हैं, क्यों पड़े हैं. पहले कहा जाता था कि पावर नहीं है, अब पावर है तो उसका क्या कर रहे हैं?
प्रश्न : आज की तारीख में क्या स्टेटस है?
जवाब : एक महीने पहले, हमने (पुलिस मुख्यालय में) चर्चा की थी. भई एक महीना हो गया? उस समय बताया गया कि 107 मामले हो गये हैं. टोटल 252 थे. कहा गया कि उनका वेरिफ़िकेशन होना है. यह होना है, वह होना है. मैं फ्रैंकली बताऊं कि इस तरह के कैजुअल रेस्पांस से मुङो दुख होता है. वरीय स्तर पर कैजुअल रेस्पांस नहीं होने चाहिए. अगर उनका सत्यापन करना बाकी था तो क्या डीसी के यहां बिना सत्यापित किये भेज दिये थे? मतलब यह कि इस उत्तर से स्वयं कन्विंस्ड (आश्वस्त) नहीं, लेकिन बोल दिया. तो यहां, दृष्टिकोण और बातचीत में जो कैजुअलनेस है, वह कम से कम प्रोफ़ेशनल लोगों में नहीं होना चाहिए. गप्पें मार रहे हों तो अलग बात है, लेकिन जब प्रोफ़ेशनल टॉक चल रहा हो तो फ़ोकस्ड होना चाहिए. ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जिन पर हमारे साथियों में थोड़ी संजीदगी होनी चाहिए. मेरी सोच होती है कि एक बंदा है, जो फ़ील्ड में बुलेट फ़ेस कर रहा है. हम दफ्तर के एयरकंडीशंड कमरे में बैठे हैं. हमें चाहिए कि उसके बकाये को शीघ्रता से निबटान करने में कोई भी बाधा हो तो उसे दूर करें. सरकार संसाधन दे रही है. आप लागू तो कीजिए. इससे पुलिस बल में भरोसा बनता है कि हम लड़ रहे हैं, मारे जायेंगे तो हमारे बच्चों को भटकना नहीं पड़ेगा.
प्रश्न : अब आप क्या संभावना देखते हैं यहां?
जवाब : अभी लंबी यात्रा है. आत्ममुग्ध होने की स्थिति नहीं है. यह जरूरी है कि यहां पदाधिकारियों के बीच आपस में भरोसे का वातावरण कायम हो. और पुलिस-जनता के बीच भरोसे का माहौल बने. अब देखिये, इस हालत में मैं कैसे कह दूं कि बहुत आनंद की स्थिति है. एक दिवंगत हवलदार की विधवा अपनी समस्या को लेकर मुङो चिठ्ठी लिखती है. अनुकंपा के आधार पर उसकी बेटी की बहाली के लिए. 2009 में हवलदार की मृत्यू हुई थी. वह अभी भी चक्कर काट रही है. एक महीने पहले, मैंने लोगों का ध्यान आकृष्ट किया कि भई इसमें अंतिम निर्णय लीजिए. बुलाइये उसको और अप्वायंटमेंट दीजिए. बताया गया कि डीसी के यहां से क्लर्क में अप्वायंटमेंट हुआ था, लेकिन स्पेशल ब्रांच में क्लर्क की पोस्ट नहीं है. तो हुआ कि वह अप्वांयंटमेंट रद्द हो, तभी दूसरा हो सकता है. अब यह तो क्लर्क की भाषा है! आप उसको बुला कर अप्वायंटमेंट लेटर दे दीजिए और डीसी को लिख दीजिए कि दे दिया गया है, आप पुराने को रद्द कर दीजिए. वह बेचारी रद्द कराने के लिए कहां-कहां भागेगी! मेरा नजरिया है कि हमारे पास कोई बंदा आ गया, चाहे वह अपराध का भुक्तभोगी हो चाहे हमारा मातहत. उसने कोई समस्या बतायी. अब यह मेरी समस्या होनी चाहिए. इस अंतर को यहां नहीं पाटा जा सका है. कोई रोते हुए आपके पास आया और लौटा तो मुस्कुराते हुए. ऐसा कोई कारण तो उसे प्रदान कीजिए! आपको इसमें फ़क्र होना चाहिए.
प्रश्न : अंतत: क्या हुआ उस विधवा का?
जवाब : हाल में तो मैंने पता नहीं किया. कभी-कभी तो मुङो संकोच होता है बार-बार पूछने में. कहेंगे कि भई रगेदे हुए हैं. (हंसते हुए) बड़ी विचित्र स्थिति हो जाती है. इसलिए मैं कभी-कभी बेचैन हो जाता हूं. अभी जो मैं आपसे यह लंबी बातचीत कर रहा हूं उसका बस एक ही सार तत्व है- क्या हम केवल सरकारी रोजगार में लगे एक कर्मी हैं या फ़िर हमारे जीवन का कोई आदर्श भी है. हमारी जिंदगी में कोई मकसद भी है या नहीं? आज के समाज की आदर्शहीनता की जो स्थिति है, वह व्यापक हो गयी है. और यह सारी चीजें उसके लक्षण हैं.
प्रश्न : पूरी बातचीत के बाद जहां तक मैं समझ पाया कि आप संतुष्ट नहीं हैं? झारखंड पुलिस महकमा में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है?
जवाब : नहीं. ठीक-ठाक तो नहीं चल रहा है! मैं बिल्कुल संतुष्ट नहीं. क्योंकि हम यह भी नहीं जानते कि हमारे कितने शहीदों के आश्रितों का अनुकंपा पर बहाली के कितने मामले लंबित हैं?
प्रश्न : यह तो शहीद के आश्रितों की बात हुई, लेकिन पुलिस पर तो पूरे समाज की जिम्मेवारी है. जनता का हाल? आखिर यह सब ताम-झाम तो उसी के लिए है?
जवाब : नहीं नहीं, यह तो मैंने उदाहरण भर दिया. यह इतना छोटा-सा सैंपल है जो आसानी से हैंडलेबल (निबटाया जा सकता) था. कहने का मतलब है कि हमारे इस सिस्टम में चीजों को हैंडल करने की मेकैनिज्म पर गौर करने की जरूरत है.
प्रश्न : इसके लिए आप किसे दोषी मानते हैं, पॉलिटिकल सिस्टम को या ब्यूरोक्रेसी को?
जवाब : ऐसा है कि हम अपने सिस्टम को दुरुस्त नहीं करें, ऐसा तो कोई पॉलिटिशयन हमसे कहता नहीं. इसमें उसकी कोई रुचि नहीं. यह तो हम प्रोफ़ेशनल्स का काम है.
प्रश्न : जाहिर है यह सब मामला पुलिस महकमा के शीर्ष स्तर का था? तो दोषी भी वही होगा?
जवाब : देखिये, कहीं न कहीं चीजें ठीक नहीं चल रही हैं, तो कहेंगे कि मस्तिष्क को सोचना चाहिए. यानी शीर्ष को और शीर्ष की जवाबदेही और जवाबदेही का सिस्टम रिपोर्ट व रिटर्न से होता है. और रिपोर्ट-रिटर्न की कोई गारंटी ही नहीं है कि कब आयेगी (हंसते हुए.)
प्रश्न : बातचीत के समापन के साथ एक बार फ़िर वही सवाल. छह महीने देखने के बाद झारखंड पुलिस महकमा को आप कितने अंक देंगे?
जवाब : हां छह महीने हो गये, अंक देने की स्थिति है. लेकिन अभी कुछ दिनों के लिए इस एक्सरसाइज को टाल देना चाहिए. कुछ धैर्यपूर्वक इसको देखा जाये कि ऐसी स्थिति बने जब अंक देनेवाले को भी अच्छा लगे और जिन्हें अंक मिले उन्हें भी अच्छा लगे.
प्रश्न : आपको जितना मैं जानता हूं, मुङो लग रहा है कि आपने अपने धैर्य की सीमा को यहां विस्तारित किया है.
जवाब : हां, निश्चित रूप से इतना धैर्य मुझमें कभी नहीं रहा. यह गुण मेरे अंदर कम था. यही नहीं अब तो मैं हर दो तीन दिन के बाद दफ्तर जाते हुए गीता पढ़ता हूं. और फ़िर मैं भगवान श्रीकृष्ण से सवाल पूछता हूं कि - मुङो किस अध्याय का कौन-सा हिस्सा यहां सिखाया जा रहा है. (हंसी जारी) आप कहेंगे कि फ़ल की तरफ़ गौर मत करो. कर्म किए जाओ..तो यह पाठ थोड़ा और ठीक से समझाइये. लगता है ठीक से समझ नहीं आ रहा! (हंसी)
प्रश्न : और यह अंतिम सवाल. आपने झारखंड के असाइनमेंट को एक चुनौती के तौर पर लिया था. छह महीने हो गये. और कितना इंतजारकरेंगे आप?
जवाब : हां, मेरे जीवन में काल के सम्मान की बात हमेशा रहती है. हर बीता हुआ चौबीस घंटा मेरे लिए बहुमूल्य होता है. यह प्रश्न मेरे लिए प्रतिदिन का प्रश्न है. इस प्रश्न को मैं तकनीकी तौर पर नहीं लेता, कि आप सलाहकार हैं, सलाह दी काम खत्म. मैं इसे आध्यात्मिक तौर पर लेता हूं. जिस दिन अंतरात्मा जो कह देगी हम उसपर अतिरिक्त बोझ नहीं डालेंगे. लेकिन अभी तो हमारी इच्छा है कि यहां की व्यवस्था कुछ जगह पकड़े. इसलिए अभी तो मैंने यहां धूनी रमा दी है.
पुलिस कल्याण
झारखंड सरकार द्वारा जारी आदेश
11 मई 2011 : पुलिस थानों को सामान्य कार्यो के निष्पादन हेतु स्थायी अग्रिम राशि की स्वीकृति, राज्य के 406 थानों को तीन श्रेणी में बांट कर महीने में 10 हजार रुपये से 20 हजार रुपये, इस राशि से सूचनादाताओं (शिकायत दर्ज करनेवाले आम लोग) को कागज-कार्बन उपलब्ध कराना, गिरफ्तार बंदियों को भोजन एवं बस-ट्रेन से भेजने का खर्च, घटनास्थल पर फ़ोटोग्राफ़ी, पोस्टमार्टम आदि पर होनेवाले खर्च, आदि.
09 जून 2011 : उग्रवादी हिंसा के दौरान ड्युटी पर मारे गये ‘अविवाहित‘ पुलिसकर्मियों के भाई/बहन (अविवाहित) को तृतीय एवं चतुर्थ वर्गीय पदों पर नियुक्ति, यह आदेश मृतक पुलिसकर्मियों के आश्रितों को ओर्थक एवं सामाजिक सुरक्षा हेतु पूर्व के सरकारी आदेश में सुधार है. इसे वर्ष 2000 यानी झारखंड गठन बाद के तमाम मामलों से ही लागू माना जायेगा. सामान्य यानी विवाहित पुलिसकर्मियों के आश्रितों के मामले में सरकार ने पहले ही आदेश जारी कर रखा है.
09 जून 2011 : उग्रवादी हिंसा के दौरान मारे गये गैर-सरकारी ‘अविवाहित‘ व्यक्ति के ओश्रत/निकट संबंधी को योग्यतानुसार तृतीय एवं चतुर्थवर्गीय पदों पर बहाली का आदेश जारी किया गया है. विवाहितों के लिए पहले से ही प्रावधान रहा है, लेकिन इसका लाभ उन मृतकों के परिजनों को नहीं मिलेगा, जिनका नाम आपराधिक या उग्रवादी सूची में रहा हो.
10 जून 2011 : उग्रवादी घटना में सामान्य नागरिकों की चल-अचल संपत्ति नष्ट/लूट के एवज में 50 हजार (चल) से एक लाख (अचल) तक क्षतिपूर्ति देने का आदेश जारी किया गया.
इसके अलावा डा डी एन गौतम के कार्यकाल में अन्य आधे दर्जन नये आदेश भी सरकार द्वारा जारी किए गये हैं, जिसे तत्काल प्रभाव से लागू होने चाहिए थे.
- किसलय ||
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