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|| डा मुंडा से किसलय की बातचीत ||
राज्यसभा सांसद डा रामदयाल मुंडा को लोग राजनेता कम, शिक्षाविद् और झारखंड-मर्मज्ञ के रूप में अधिक जानते हैं. 14 साल अमेरिका में प्रोफेसर रह चुके सत्तर वर्षीय डा मुंडा आज भी टिपिकल आदिवासी सी सरलता और बेबाकी के लिये जाने जाते हैं. स्थानीय लोक संस्कृति और संगीत की चर्चा होते ही मुंडा केवल एक भावुक गंवई आदिवासी नजर आते हैं.
अभी पिछले साल उन्हें नाटय संगीत अकादमी पुरस्कार और हाल में पद्मश्री से नवाजा गया. इन सबसे अलग, झारखंड के लिये, इसके भविष्या के लिये उनकी व्याकुलता उनके व्यक्तित्व का सबसे प्रभावशाली पक्ष है. कांग्रेस आलाकमान ने इसे पहचाना और राज्यसभा की सदस्यता दिलायी. तुरंत बाद राष्टीय परामर्शदातृ पर्षद का सदस्य भी बना दिया गया. डा मुंडा उत्साहित हैं, और उनके अंदर का वह बेबाक टिप्पणीकार..!? चलिये, सीधा डा मुंडा से ही रूबरू होते हैं:
सवालः बदरूप होती राजनीति के आप मुखर टिप्पणीकार रहे हैं. कई बार तो आपने अपनी पार्टी, कांग्रेस को भी नहीं बख्शा. लेकिन, आज संसद पहुंचकर राजनीति की मुख्य धारा में हैं. कैसे मैनेज करते हैं?
जवाबः देखिये, मुख्यधारा में सभी हरिश्चन्द्र तो नहीं मिलेंगे. जेपी, लोहिया को भी नहीं मिले थे. हां, ’वैसे लोगों’ को अवसर मिलता है. सुधरना चाहे तो सुधर जाएं, वरना हासिये पर चले जाएंगे. आरंभिक दिनों में हमलोग लालू यादव से बहुत उम्मीद करते थे. लेकिन अब उनके डिµजेनेरेशन का हाल देखिये. ऐसे लोग लाॅन्ग टर्म साथी नहीं बन सकते. हालांकि, अब इतिहास हो चुकी है यह बात भी... यही नहीं, लोग तो कहते हैं, कांग्रेस और बीजेपी भी एक ही सिस्टम के ए टीम और बी टीम हैं. बीजेपी में थोडी इज्जत बची थी अटलजी के कारण, और कांग्रेस में सोनिया जी के. बाकी तो सब... (अचानक थोडा ठहरते हुए) सब हमारे साथी ही हैं, लेकिन वह ’औरा’ पैदा नहीं कर पा रहे हैं. इधर, झारखंड में.. इतिहास देखिये तो लाॅन्ग टर्म मित्र्ाता के लिए शिबू सोरेन से अच्छा दोस्त कौन होता. लेकिन अब तो वह आदमी बिल्कुल ही बदल गया है. उसी तरह आजसू.. शुरू में आजसू का जो आइडियलिज्म था वह खत्म हो गया. ऐसे में संकट तो है. फिर भी हम प्रयास कर रहे हैं. एकµदो साल में कुछ हो पाया तो ठीक, वरना, लाइफ तो ’इटर्नल’ है नहीं. ..ऐसे में, मेरे लिये अंग्रेजी की कहावत हैµ आई एम इन ग्रेट हरी! इस छह साल (राज्य्ासभा का कायर््ाकाल) में 18 साल का काम कर लेना चाहता हूं. इसके लिये एक छोटी टीम बन जाती तो अच्छा था.
सवालः झारखंड की जो छवि है, जो हालात हैं, कीचड में कितने कमल मिलेंगे आपको?
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| डा मुंडा |
जवाबः दिल्ली जाने पर मुझे एक आश्चर्य हुआ!.. जो भ्रष्टाचार हमारे इस राज्य्ा में एक नंबर समस्य है, वहां इसकी चर्चा तक नहीं. आपको बतायें, कि राष्टऋीय परामर्शदातृ पर्षद की बैठकों में वार-रूम सा नजारा होता है. देश की समस्याओं, जैसे खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य-शिक्षा, संप्रदायवाद, आदि-आदि पर जबरदस्त विचार-विमर्श होता है, लेकिन उस अजेंडा में भ्रष्टाचार कहीं दिखाई नहीं देता. ..उसके पीछे थिंकिंग (सोंच) यह है कि भ्रष्टाचार कहां नहीं है! उसका एक मैनेजेब्ल लेवेल बनाये हुए काम करते चलना है. भ्रष्टाचार को एलिमनेट नहीं किया जा सकता है. लोग उदाहरण देते हैं, वामपंथियों की साफ छवि की. उसका मतलब यह नहीं कि उनके यहां भ्रष्टाचार नहीं है. अंतर बस इतना है कि वे सम्मानजनक लेवेल तक उसे व्य्ावस्थित करने में सफल हैं. हमें भी इस तर्ज पर काम करना होगा. (हंसते हुए) हमारे एक सहयोगी बोलते हैंµ 10 रूपये में हरिश्चन्द्र नहीं मिलने वाला! ..तो हम देखेंगे 10 रूपए से और ऊपर कितने में वह हरिश्चन्द्र मिलेगा, उन्हें लेकर ही हम टीम बनायेंगे.
सवालः अपने कायर््ाकाल में आपने ट्रऋाइबल ऐडवाइजरी काॅउन्सिल की बैठक में एमओयू का मुद्दा उठाया. कैसी अनियमितता देखते हैं उसमें?
जवाबः सभी मानते हैं, राज्य्ा बनने के बाद से अबतक यहां सरकारी खजाने से 30µ40 हजार करोड की अनियमितता हुई. सीएजी ने भी सवाल उठाया है. आपको बतायें कि झारखंड बनने के बाद से जो 107 एमओयू हुए, उसपर क्रियांवयन हुआ तो आंकडा सीएजी के उस आंकडे से कई गुणा ऊपर पहुंच जाएगा. समझ्ाौते लागू हुए तो झारखंड के पहाड, नदियां, जंगल सभी बिक जाएंगे.
सवालः एमओयु के दौरान भी लेनेµदेन की खबर है आपको?
जवाबः जाहिर है, ऐसे एमओयू हस्ताक्षरों के पीछे क्य्ाा कुछ नहीं हुआ होगा. लेकिन, ये एमओयु न्य्ाूयाॅर्क में साइन हुए, इंगलैन्ड में हुए तो कैसे पता चलेगा. अंदाजा भर लगा सकते हैं. पिछले दिनों एक मुख्य्ामंत्र्ाी के सचिव के बिस्तरे से करोडों के नोट मिले. कहां सेे आया होगा वह पैसा?
सवालः आपने देखा, पिछले दस साल में चार मुख्यमंत्री हुए. उनके रिपोर्ट कार्ड पर आप कया कहेंगे?
जवाबः देखिये, हम जज करनेवाले कौन होते हैं! ..हां, सबसे आश्चर्यजनक तो कोडा का कायर्काल माना जाएगा, एक निर्दलीय इस हद तक कर सकता है!?..
सवालः लेकिन, मधु कोडा को तो आपकी पार्टी, कांग्रेस का भी समर्थन प्राप्त था..?
जवाबः (झिझकते मुकुराते हुए..) हां. इसलिये इस पर बात करना अपने पैरों पर ही कुल्हाडी मारने जैसा है. लेकिन अनदेखा तो नहीं किया जा सकता. जाचं में हमारे लोगों के चेहरे भी सामने आ सकते हैं. आखिर.. कुछ गलत हो रहा था तो आंख मूंदे रहना भी गलत था.
सवालः फिर तो दोषी आपलोग भी..?
जवाबः हां.. यह सही है कि कोडा प्रकरण पराकाष्ठा थी, लेकिन यह सब तो राज्य्ा बनने के साथ ही शुरू हो गया था. बाबूलाल मरांडी का मुख्य्ामंत्र्ाी बनना ही ’प्रथम ग्रासे मच्छिकापाता!’ जैसा था. उसके बाद आये अर्जुन मुंडा.. सबसे ज्यादा उम्मीद तो हमें शिबू सोरेन से थी. लेकिन, दोनोंµतीनों बार सिस्टम उन्हें हफ्ताµमहीने से ज्यादा कहां बर्दास्त कर पाया.
सवालः लेकिन, वह तो अब भी सत्ता में हैं, अप्रत्य्ाक्ष रूप से ही सही...? वर्तमान अर्जुन मुंडा सरकार पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
जवाबः मैं तो बस इतना ही दुहराउंगा, यह जनता की सरकार नहीं, नेताओं की सरकार है. मैं मानता हूं कि सौदेबाजी से बनी यह सरकार हमारी ही छोटी सी चूक का खामियाजा है. काश, रांची का राजभवन थोडा धीरज रखता.. कया होता? एक बार और चुनाव हो जाता..!
सवालः यानी, लब्बोलुआब यह कि झारखंड दस वर्षों बाद भी जस का तस है. भ्रष्टाचार, अराजकता और राजनीतिक अस्थिरता के इस हालात में राज्य्ा के विकास का कया होगा?
जवाबः हां, विकास के लायक वातावरण दिखता नहीं, लेकिन करना तो होगा ही. इसके लिये किसी न किसी को साहस के साथ शुरूआत करनी होगी. पूरे डिटरमेनेशन के साथ एक उदाहरण तैयार करके दिखाना होगा. हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए. दक्षिण से आये अकेले शंकराचार्य ने पूरे भारत में केवल चार ही तीर्थस्थान खडे किये. इतने से ही वह सबकुछ कर गये जो वह चाहते थे. विराट भारत का एक नया स्वरूप उभर आया. यह हजार साल पहले की बात है. आज तो हमारे साथ अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी है, तमाम सुविधाएं हैं. उन्होंने चार किया था, हम चालीस कर सकते हैं. एकµएक मिनट का हिसाब लगाते हुए अपने झारखंड में काम किया जाए तो उदाहरण पेश किया जा सकता हैं. सांसद के तौर पर मेरे पास आधा दशक है.
सवालः आप कुछ करने जा रहे हैं?
जवाबः हां, कुरचूडीह गांव में सडक निर्माण से मैंने शुरूआत करवायी है. बंगाल की सीमा पर तमाड का यह अंतिम गांव टापू जैसा है. यहां दस किलोमीटर का रोड एक माह के रेकाॅर्ड टाइम में पूरा करवाया है. इसे आगे भी बढाना है. फिर, बिजली. इसके लिये हम सौरउर्जा का उपयोग करेंगे. वल्र्ड एनर्जी काउंसिल नामक अंतर्राष्टऋीय संस्था से बात हो रही है. साथ ही, सिंचाई के लिये व्य्ाापक स्तर पर वाटरशेड मैनेजमेंट और चेक डैम की योेजना है. जरूरत पडी तो डिऋप इरिगेशन के लिये इजारायल के विज्ञानियों से सहयोग लेंगे. दरअसल, मेरा मकसद है कि तीन महीने में इस इलाके को विकास के एक माॅडेल के रूप में तैयार कर लिया जाए. मैं चाहता हूं कि प्रधानमंत्र्ाी जी को यहां हवाई सर्वेक्षण करवाकर बता सकूं कि झारखंड में भी विकास संभव है, इस तरह!
सवालः आपने तमाड को ही कयों चुना, कयोंकि यह आपका पैतृक गांव है?
जवाबः हां, सही है कि यह मेरा अपना गांव है. सारे इलाके, लोग मेरे पहचान के हैं. इसका भरपूर फायदा मुझ्ो निर्माण प्रक्रिया में मिल रहा है. एक और कारण है इस गांव को चुनने का. दरअसल, यह इलाका बंगाल से घुसनेवाले नकसलियों के लिये सुगम प्रवेशद्वार बनता जा रहा था. आपको बतायें कि हम यह सब योजनाबद्ध तरीके से कर रहे हैं. नकसलवादियों के तीन ग्रूप हैं. यह इलाका बंगाल वैरायटी का है. दूसरा है बिहार वैरायटी, जो बिहार के जहानाबाद इलाके से सटा है, जैसे पलामू आदि. और तीसरा है, तेलांगना वैरायटी, छत्तीसगढ से सटे इलाके. मेरी योजना इन तीनों क्षेत्र्ाों में काम करने की है. इसके अलावा चौथा इलाका हमने चुना है संथाल परगना, जो उपराजधानी के दर्जे के बावजूद बेहद पिछडा है. अगले पांचµछह वर्षों में इन चारों स्थानों पर सेंटर खडा करके स्थानीय युवाओं को जोडेंगे. दरअसल, चार ही नहीं, मेरी योजना तो चालीस की है. मैं चाहता हूं कि राज्य्ा भर में ऐसे 40 सेंटर तैयार करा सकूं. पकका मकान हो, मूलभूत सुविधाओं से परिपूर्ण कम्यूनिटी सेंटर. हमारे पारंपरिक अखरा का स्थायी स्वरूप. यह मेरी महत्वाकांक्षी योजना है.
सवालः लेकिन, इसके लिये तो एक बडी टीम चाहिए. यही नहीं, जिस संपन्न झारखंड की कल्पना कर रहे हैं, कया उसको चलाने वाला दक्ष मानव संसाधन है यहां?
जवाबः हां, झारखंडियों में प्रोफेशनल लोगों की कमी है. इसलिये, दुनिया भले ही इस राज्य्ा को इंडस्टिऋयल कारीडोर बनाने के लिये व्य्ााकुल हो, मेरे लिये तो बस किसी कोने में है यह मुद्दा. इंडस्ट्री आ भी जाए और उसे ढंग से न चलाया तो वह घाटे का ही सौदा होगा. उदाहरण है- एचईसी. केवल घाटा ही घाटा है. वहीं, टाटा को देखिये हर साल चारµपांच सौ पर्सेन्ट मुनाफा कमाता है. एक बार टाटा के रूसी मोदी ने मुझसे कहा- ’मुंडाजी, आपके लोग वहां जिन मशीनों पर काम करते हैं, केवल उन मशीनों के साथ एचईसी मिल जाए तो दो साल में हम उसे टाटा से एक कदम आगे बढकर मुनाफा दे सकते हैं.’ इससे जाहिर है कि अभी हमारे अपने लोगों में कमी है. बडेµबडे बिजनेशµउद्योगों का सपना देखने से पहले हमें अपने मानव संसाधन को तैयार करना होगा. यह एक बडी चुनौती है. इसी लक्ष्य को मददेनजर राज्य में इन चालीस सेंटरों की योजना है मेरी. ये चालीस अखरा ही झारखंड में ढालेंगे युवाशकित का नया स्वरूप.
सवालः यानी, आप अपने छोटे से भारत में शंकराचार्य की तर्ज पर चार की बजाय 40 तीर्थस्थल बना रहे हैं.. शुभकामनाएं!
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