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|| जी के पिल्लई, (सीएमडी, एचईसी) से किसलय की बातचीत ||
दस साल में, बदहाली, ढुलमुल राजनीति, कुशासन, भ्रष्टाचार, जनµधन की बंदरबांट झारखंड की पहचान बन गयी है. ऐसा पहले नहीं था। इलाका उपेक्षित जरूर था लेकिन यह हाहाकार नहीं था. याद कीजिए, जब इस इलाके की पहचान एचईसी से होती थी. 1958 में स्थापित उन संस्थानों में से एक जिसने जवाहर लाल को युगद्रष्टा की उपाधि दिलायी थी.
इस जायन्ट इंडस्ट्री से देश भर की अपेक्षाएं थी. लेकिन, पांच दशकों में एचईसी का भी वही हाल हुआ जो नये राज्य झारखंड का. एचईसी की बदहाली और प्रबंधकीय अराजकता पर राज्य सभा सांसद डा रामदयाल मुंडा रूसी मोदी से अपनी एक बातचीत का प्रसंग सुनाते हैं: ञरूसी मोदी जी ने कहा, मुंडा जी एचईसी का मौजूदा इन्फ्रा स्ट्रकचर, मशीनें हमें मिल जाएं तो हमारे लोग दो साल में इसे टाटा से एक कदम आगे ले जा सकते हैं।ञ इशारा था, अक्षम मानव संसाधन की ओर. झ्ाारखंडियों की क्षमता पर बडा प्रश्नचिन्ह?.. लेकिन, एचईसी के सीएमडी जी के पिल्लई मोदी के उस बयान पर दोटूक कहते हैं: 'मैं उनसे असहमत हूं।..' रूसी मोदी जैसे शख्सियत के बयान को सिरे से खारिज करना.. वाकई, दम-खम चाहिए.
पिल्लई ने एचईसी के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर मई 2007 में काम शुरू किया. यह वह वख्त था जब एचईसी बीआइएफआर के हवाले कर दिया गया था. दिन गिने जा रहे थे, तालाबंदी के. लेकिन, महज साढे तीन साल में तस्वीर बदल चुकी है. चालू वित्तीय वर्ष में 512 करोड ग्रॉस टर्नओवर, 26.9 करोड शुद्ध मुनाफा और हाथ में 1962 करोड का वर्क ऑर्डर..! हां, एचईसी एक बार फिर से कमाउ पूत बन गया है. और, यह सबकुछ ञउसीञ मौजूदा मानवµसंसाधन के बूते! एक बार फिर साबित हो रहा है कि दोष झारखंड की मिट्टी में नहीं. श्रमµसंसाधन में हम किसी से पीछे नहीं. बस, प्रबंधन चाहिए, सुशासन चाहिए.
इस 15 नवंबर को पूरे गाजेµबाजे के साथ एचईसी अपनी 52वीं वर्षगांठ मना रहा है. और संयोग देखिये, इसी दिन झारखंड भी पूरे दस साल का हुआ. लेकिन, कितना फर्क होगा इन दोनों वर्षगांठों में!.. क्या झारखंड के दिन नहीं बहुरेंगे!?.. अगर हां तो कैसे? इसी जटिल सवाल का उत्तर तलाशते हुए हम पहुंचे एचईसी. लोग, अरसा से मानते रहे हैं कि कलµकारखाने ही झारखंड के तारणहार होंगे. फिर कसर कहां है? एचईसी के कुशलµक्षेम के बाद ऐसे ही कुछ गंभीर सवालों के साथ हमने वहां के वर्तमान सीएमडी गोपी कृष्ण पिल्लई से लंबी बातचीत की.
सवालः एचईसी की धुंधलाती तस्वीर आज फिर से साफ होने लगी है. जनता, प्रेसµमीडिया तो कह ही रहे हैं, आप क्या कहेंगे? यह सब बदलाव आपके कार्यकाल में हुआ है.
जवाबः पांच साल पहले यह बंद होनेवाली कंपनी थी. बीआइएफआर ने एचईसी को बंद करने का निर्णय ले लिया था. लेकिन, इस साढे तीन साल में यह एक अच्छा बदलाव देख रहा हूं मैं. कंपनी ने न केवल बंदी की बात को खारिज कर दिया है, बल्कि अब गाडी पूरी तरह पटरी पर आ गयी है.
सवालः जाहिर है, इसका भरपूर श्रेय आपको मिलता है. लेकिन, पुराने कटु अनुभवों को देखते हुए, क्या यह सब काफी है? गाडी फिर से डिµरेल न हो जाए इसके लिये भी कुछ कर रहे हैं आप?
जवाबः हां, मेरे सामने यह बडी चुनौती है. दरअसल कहना चाहिए, दो चुनौतियां हैं. गाडी पटरी पर तो आ गयी, लेकिन उसे तेज दौडाना पहली चुनौती है और दूसरी, इसका बेहतर भविष्य्ा सुनिश्चित करना. सवालः और यह सब आपको करना है कार्यकाल पूरा होने से पहले, अगले सवा साल के भीतर. जरूर कोई रणनीति बनायी होगी आपने?
जवाबः हां... देखिये, कंपनी को गिरने से बचाने के लिये केवल सामान्य गति से चलना काफी नहीं, उसमें ग्रोथ (विकास) होना चाहिए. इसके लिये जरूरी है कंपनी को डावर्सिफाई (विस्तारित) करना. मेरा मानना है कि पिछले दिनों एचईसी की बदहाली के पीछे एक बडा कारण था कि कंपनी केवल स्टील और माइनिंग के क्षेत्र काम करती रही. कभी डायवर्सिफिकेशन नहीं किया गया. समय के अनुसार कंपनी को डायवर्सिफाई करना चाहिए. आइटीसी को लीजिए. आरंभ में यह केवल एक टोबैको कंपनी थी. आज होटल, तेल, आदि कई व्यावसायों में है. इसी तरह एचईसी के पास जो इन्फ्राµस्टक्चर है, जो काबिलियत है उसको मद्देनजर हम अन्य क्षेत्रों में भी विस्तार कर रहे हैं.
सवालः कुछ प्रमुख क्षेत्रों के बारे में बतायेंगे?
जवाबः यूं तो कई क्षेत्र हैं, पर सबसे महत्वाकांक्षी है न्यूक्लीयर का क्षेत्र. न्यूक्लीयर उपकरण बनाना हमारा अंतिम लक्ष्य्ा है. हम इस स्तर तक पहुंच गये तो एचईसी के भविष्य्ा को लेकर अगले 25-30 साल के लिये हम निश्चिंत हो जाएंगे. एचईसी की गाडी सुपर फास्ट की तरह चल निकलेगी. लेकिन, यह सब इतना आसान नहीं है.
सवालः अबतक बात कहां तक पहुंची है? आपके कार्यकाल में किस हद तक सफलता की संभावना है?
जवाबः देश विदेश में अधिकारियों के साथ हमारी बातचीत काफी आगे बढ चुकी है. हमंे मुंबई स्थित न्यूक्लीयर पावर काॅरपोरेशन आॅफ इंडिया से एक छोटा आर्डर भी मिल चुका है, करीब आठµदस करोड का. वहां के सीएमडी डा एस के जैन से कई बार हमारी बातचीत होती रही है. इसके अलावा भाभा ऐटोमिक रिसर्च सेंटर के डायरेक्टर डा रतन कुमार सिन्हा से भी मेरी बातचीत चल रही है. उनलोगों की टीम भी एचईसी का कई बार दौरा करके संतुष्ट हो चुकी है. हमें थोडा बहुत अपग्रेडेशन की जरूरत है. इसके अलावा, दूसरा एरिया है डिफेंस जहां एचईसी को काफी काम मिल सकता है. नेवी से हमारी बात चल रही है, कुछ स्पेशियलाज्ड गन बनाने को लेकर. डायवर्सिफिकेशन का हमारा तीसरा क्षेत्र है रेलवे. इसे हमने इसलिये चुना है क्य्ाोंकि भारत में रेलवे का काफी सुनिश्चित भविष्य है. इसके लिये हमलोग इलेक्ट्रिक लोको इंजिन बनाने की सोंच रहे हैं. इसके साथ ही मेट्रो कोच निर्माण में संभावना है. फ्यूचर में मेट्रो देश के 40-50 शहरों में आ जाएगा. दरअसल, यह सब लॉन्ग टर्म प्लान है जिसकी हम नींव रख रहे हैं.
सवालः एचईसी की वर्तमान आर्थिक स्थिति कैसी है?
जवाबः काफी बेहतर है. 2007µ08 के बाद हमने सरकार से एक पैसा नहीं लिया. पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं.
सवालः बहुत खूब!.. क्या यह कहा जा सकता है कि स्थापना काल में एचईसी को लेकर जो सपने बुने गये थे अब आकार लेने की राह पर हैं?
जवाबः (पूरे आश्वस्त भाव से) बिल्कुल. एक उदाहरण दें हम आपको.. पिछले दिनों एचईसी ने न्यूक्लीयर के लिये जो फोर्जिंग बनाया है उसके बूते हम विश्व के छठे देश के रूप में उभरे हैं जो ऐसा निर्माण कर सकता है. यह केवल एचईसी के लिये नहीं, समूचे देश के लिये गौरव की बात है. देश के लोग अब एचईसी के प्रति एक बार फिर आशान्वित हुए हैं. एटोमिक एनर्जी कमिशन के पूर्व चेयरमैन डा अनिल काकोटकर और वर्तमान चेयरमैन डा श्रीकुमार बनर्जी ने खुल्लम खुला कहा कि इस निर्माण ने भारत को एक अलग पेडेस्टल पर खडा कर दिया,पूरा देश गौरवान्वित है.
सवालः यह तो हुई एचईसी की बात, झारखंड राज्य के लिये आपका एचईसी क्या कर रहा है? आसपास के लोगों की आर्थिक दशा, उनके रोजगार के अवसर आदि...?
जवाबः जहां तक आर्थिक स्थिति की बात है, इसे इस तरह देखिये. 2007 से हमारे एचईसी के कामगारों के वेतन में 70 से 80 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इसका लाभ एचईसी के आसपास की आबादी को भी मिल रहा होगा. जहां तक रोजगार का सवाल है, हमने बताया कि हम डायवर्सिफाई कर रहे हैं. जाहिर है, रोजगार के अवसर आयेंगे तो अधिकांश हिस्सा स्थानीय लोगों को ही तो मिलेगा. इसके अलावा, एचईसी के द्वारा निर्माणाधीन इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम एक और आर्थिक आयाम शुरू कर रहा है.
सवालः पिछले दिनों डा राम दयाल मुंडा ने टाटा के रूसी मोदी जी के साथ अपनी बातचीत का एक प्रसंग सुनाया. मोदी जी का दावा था कि एचईसी का केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर, मशीनें उन्हें मिल जाएं तो वह टाटा से एक कदम आगे बढकर मुनाफा दे सकते हैं. उन्होंने उसमें कामगारांे को शामिल नहीं किया. इससे झारखंड के स्थानीय कामगारों की क्षमता पर सवाल उठता है. आप क्या कहेंगे?
जवाबः मैं इस मसले में रूसी मोदी जी से सहमत नहीं हूं. आप खुद देखिये, आज एचईसी की सफलता! सारे, वही पुराने लोग हैं. प्रसंगवश मैं कहूंगा.. भारत को ओलम्पिक में गोल्ड मेडल दिलाने के लिये हमें अमेरिका से खिलाडी मंगाना पडे तो कैसी सफलता! असल सफलता तो है जब अपने पुराने खिलाडियों के साथ ही मैच जीत लिया जाए.
सवालः अब बात बदहाल झारखंड की. माना जाता है कि इस राज्य में औद्योगिकरण की बडी भूमिका हो सकती थी. लेकिन, आज दुर्दशा है. गडबडी कहां है? सुधार की संभावनाएं क्या हैं? उपाय क्या हैं? आप तो सीआईआई (काॅन्फेडेरेशन आॅफ इंडियन इंडस्ट्रीज) के झारखंड चैप्टर के चेयरमैन भी हैं.
जवाबः हां, वाकई दयनीय दृश्य्ा है. एचईसी, बोकारो स्टील, टाटा, सिन्दरी फर्टिलाइजर आदि शुरू की कंपनियों के बाद कोई नये कारखाने नहीं लगाये गये. यह दुखद है. इन कारणों को ढूंढ कर उसका समाधान निकालना होगा.
मेरे विचार से मुख्य्ा कारण है यहां का माहौल, यहां की राजनीतिक अस्थिरता, और दूसरा है इन्फ्राµस्ट्रक्चर की कमी, जिसमें रोड और पावर मुख्य्ा हैं. तीसरा कारण है, जमीन अधिग्रहण को लेकर विवाद. जिसकी जमीन जाती है उसे कीमत, मुआवजा के अलावा नौकरी भी मिलनी चाहिए. लेकिन, पयर््ााप्त आय वाली नौकरी के लिये उसके पास दक्षता की कमी है. जरूरत है उनके लिये आवश्य्ाक प्रशिक्षण की. गांवों में टेक्निकल एजुकेशन, वोकेशनल ट्रेनिंग की जरूरत है. हमने सीआइआइ की तरफ से बातचीत बढाई है. मुख्य्ामंत्र्ाी जी से भी हमारी बातें हुईं है, गावों में वोकेशनल ट्रेनिंग को लेकर. इसबार बात काफी सकारात्मक दिशा में आगे बढ रही है.
सवालः इन्फ्रा स्ट्रक्चर पर कोई पहल..?
जवाबः हां, सीआइआई ने हाल में एक सेमिनार किया था. उसमें पावर और रोड के मुद्देां पर भी मुख्यमंत्री जी काफी संवेदनशील नजर आये. इस बार हमें सुधार की पूरी आशा है. पिछले दिनों जेएसइबी ने भी एक सेमिनार किया था, पतरातु में नये पावर प्लांट बैठाने को लेकर. उसमें देश विदेश से 34 उद्यमियों ने भाग लिया और निर्माण में रूचि दिखायी. इस तरह, इन्फ्रा स्ट्रक्चर को लेकर आशा जगी है. वैसे भी, बिना इन्फ्रा स्ट्रक्चर के इंडस्ट्रियलाइजेशन संभव नहीं. और मेरे विचार से बिना इंडस्ट्रियलाइजेशन के इस राज्य का विकास संभव नहीं है.
सवालः अब बहुत सटीक लहजे में बताइये.. एचईसी के पुनरूत्थान की पूरी प्रक्रिया आपने संचालित की. झारखंड के परिदृश्य्ा में आप सुधार की कैसी संभावना देखते हैं?
जवाबः देखिये, किसी भी राज्य के विकास के लिये राजनीति स्थिरता सबसे महत्वपूर्ण है, पार्टी कोई भी हो. हम गैरµराजनीतिक लोग हैं. हम चाहते हैं चुनी हुई स्थिर सरकार. यह हो जाए तो औद्योगिक विकास संभव है, और औद्योगिक विकास पूरे राज्य के परिदृश्य्ा में उत्प्रेरक का काम करता है. झारखंड में क्या नहीं है, खनिज भंडार हैं, कर्मठ लोग हैं, पर्याप्त जमीन है. बस सरकार स्थिर हो तो अगले दस साल में झारखंड देश का नंबर वन स्टेट बन जाएगा.
सवालः औद्योगिक माहौल पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
जवाबः जहां तक एचईसी का सवाल है, हम अपने कामगारों और ट्रेड यूनियनों के प्रति आभारी हैं. हां, मेरे आने से पहले काफी अशांति थी. लेकिन, मैंने शुरूआत में ही सर्वसम्मति बनायी. मेरा कहना था कि हमारा जो लक्ष्य है वही लक्ष्य कामगारों-यूनियनों का भी है, फिर टकराव क्यों?! जहां तक राज्य का सवाल है, हडताल वगैरह तो पहले जैसे नहीं लेकिन आये दिन बंद आदि को लेकर उद्योग काफी प्रभावित होते हैं.
सवालः केंद्र और राज्य सरकार से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं?
जवाबः केंद्र सरकार की ओर से तो हमें पूरा सहयोग मिल रहा है. हम जिस एक्सपैंशन (विस्तारीकरण) की बात कर रहे हैं, उसको लेकर हमारे मंत्र्ाी विलासराव देशमुख यहां आये थे. उन्होंने भरपूर सहयोग का आश्वासन दिया है. राज्य सरकार से मेरी अपेक्षा है कि वह बकाया रकम अतिशीघ्र एचईसी को मुहैया करा दे.
सवालः किस मद में कितना बकाया है राज्य सरकार पर?
जवाबः एचईसी परिसर की जमीनें, बिल्डिंगों के बदले उन्हें कुल 275 करोड चुकाना था, लेकिन अबतक हमें केवल 160 करोड मिला है. बाकी रकम मिल जाए तो हम अपनी 50 साल पुरानी मशीनांे को बदल सकेंगे, जिससे कंपनी के उत्पादन में काफी वृद्धि होगी. इसके अलावा, राज्य में औद्योगिकरण के लिये स्थानीय सरकार को चाहिए कि वह देश भर के उद्यमियों में विश्वास पैदा करे.
सवालः और आम लोगों से कुछ कहना चाहेंगे..!
जवाबः आपके माध्यम से मैं एचइसी के अपने सहकर्मियों को कंपनी की 52वीं वर्षगांठ की बधाई देता हूं. साथ ही झारखंड के निवासियों को भी दसवी सालगिरह की बधाई. सीआइआइ के चेयरमैन की हैसियत से मैं उन्हें आश्वासन देना चाहूंगा कि राज्य में औद्योगिक विकास में सीआइआइ भरपूर सहयोग करेगा, खास कर तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में. इसके अलावा हिन्दी फिल्म के गाने की इस पंक्ति से ढेर सारी शुभकामनाएं देता - दुख भरे दिन बीते रे भइया, अब सुख आयो रे.. !
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