BazaarBook.com
Traders Deed : Shoppers Need
On Line Bazaar Info
यह बात तो शीशे की तरह साफ है कि नक्सलवाद का मूल मकसद अपराधियों-डकैतों का गिरोह बनाना न है, न रहा होगा। लेकिन, बंधक बनाये गये सिपाही लुकस टेटे की जिस तरह उन्होंने हत्या की उससे तो उस मकसद पर ही ऊंगली उठती है। अपराधी किसी को बंधक बनाते हैं, फिरौती न मिली तो निर्ममता से हत्या कर देते हैं।
ऐसी एक हत्या उनके आपराधिक कद को कमजोर नहीं करता, बल्कि उनकी निर्ममता, हैवानियत को पुष्ट करते हुए कद को और खौफनाक बनाता है, जो उनके कलुषित मकसदों, फिरौती, वसूली, डकैती-लूट जैसे कारनामों में फायदेमंद होता है। क्या नक्सलवाद भी अब खुद को खौफनाक बनाने भर से संतुष्ट है? फिर, कहां गया उनका वह रॉबिनहूड पर्सनालिटी.. गरीबों, मजलूमों के हक-हुकूक, उनके मानवाधिकार के लिये संघर्ष करने का वह माद्दा, वह 'बड़बोलापन'..?
माना कि सरकार निकम्मी है। यह तो खुद पसरते नक्सलवाद से ही साबित होता रहा है। इस बार भी नीतिश सरकार ने जिस सामंती चरित्र का परिचय दिया है, उससे उनके शासन की वास्तविक कार्यप्रणाली उजागर होती है। सात दिनों बाद सर्वदलीय बैठक, नक्सलियों से वार्ता की सुध आयी। नक्सलियों के कब्जे में बचे तीन बंधकों में से एक सिपाही एहसान की पत्नी ने ठीक सवाल उठाया है, अपनी सुरक्षा के लिये 1-अणे मार्ग को तो फौजी छावनी बना लिया। बंधकों के लिये क्या किया? आपका बेटा भाई-भतीजा होता तो इसी तरह कान में तेल डाले पड़े रहते?
बहरहाल, आज के राजनेताओं-सत्ताधीशों के चरित्र पर बहुत कुछ दुहराने की जरूरत नहीं। लेकिन, इन पथभ्रष्ट, स्वार्थी हुक्मरानों के खिलाफ बीड़ा उठाने वाले नक्सली एक अदना सा गरीब सिपाही की हत्या कर, क्या साबित कर रहे हैं? ..वह भी, जो उनके रहमोकरम की दुहाई दे रहा एक बंधक था ! यह तो स्थापित सच है कि पुलिस, सुरक्षाबल, सेना में शामिल होनेवाला भी अपनी नियति से नावाकिफ नहीं होता। इस नक्सल-हिंसा में हजारों वर्दीधारियों की मौतें हुईं। लेकिन, ऐसी मौत देकर खुद नक्सलियों ने ही अपने मकसद को कलुषित किया है। सर्वसम्मत अंतराष्ट्रीय मानदंड भी है कि युद्धबंदियों के साथ उनके मानवाधिकार हनन की बात तो दूर, असम्मान का नजरिया भी न रखा जाए। लेकिन… यही सिलसिला जारी रहा तो नक्सलवाद-माओवाद को लोग केवल नृशंसता के लिये याद रखेंगे। आज गांव-घरों में जिस मानवाधिकार, इंसानी हक के योद्धा के रूप में उन्हें शरण मिलती है, भोजन-पानी, आवभगत होती है क्या वे उस अपनेपन के काबिल रह पायेंगे?
- किसलय
नेताओं के चरित्र पर उठते सवाल
Submitted on October 31st, 2010 by adminजाहिर है, अब तो उनपर सवाल उठाने को भी जी नहीं चाहता। उनके चरित्र इतने संदिग्ध होते जा रहे हैं कि आम आदमी की समझ बार-बार धोखा खाती है। और बेचारा आम आदमी!.. खुद अपनी ही दिनचर्या इतनी समस्याओं से घिरी है कि दम लेने की फुरसत कहां।
Post new comment