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पांकी विधानसभा क्षेत्रः दो दशक तक एक ही परिवार के पास रही बागडोर लेकिन बुनियादी सुविधा के लिए आज भी तरसते हैं लोग

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Dilip Kumar

Palamu: पलामू के पांचों विधानसभा क्षेत्र में पहले चरण में मतदान होना है. चुनाव को लेकर गहमागहमी भी बहुत है. इन्हीं विधानसभाओं में से एक है पांकी. बाकी विधानसभा क्षेत्रों की तरह पांकी भी अभावग्रस्त रहा है.

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कहने को तो इस विधानसभा क्षेत्र के लोगों ने एक ही परिवार (पहले पिता और फिर बेटे) को अपना प्रतिनिधि बनाया है. करीब दो दशक से इस विस क्षेत्र की बागडोर एक ही परिवार के हाथ में है, इसके बाद भी इस क्षेत्र का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया. लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते हैं.

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बराज से नहीं निकल पायी नहर

पांकी विधानसभा क्षेत्र में पांकी के अलावा तीन और प्रखंड लेस्लीगंज, तरहसी और मनातू आते हैं. यहां के लोग पूरी तरह कृषि पर निर्भर हैं. लेकिन सिंचाई का कोई ठोस प्रबंध इलाके में नहीं है. बरसात के पानी से ही यहां के किसान खेती करते हैं.

सिंचाई यहां के लिए सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है. लेकिन लंबे समय बाद भी इस समस्या का निदान नहीं हो पाया. अमानत नदी पर बराज बन गया, मगर इससे नहर निकाली नहीं जा सकी है. बराज से नहर को जोड़ दिया जाए तो हजारों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी.

अभी भी यहां के किसानों को मुश्किलों का सामना कर पड़ रहता है. कम बारिश होने पर यहां बड़े पैमाने पर खरीफ, भदई सहित अन्य फसलें मारी जाती हैं.

बड़े-बड़े हैं स्वास्थ्य केन्द्र भवन लेकिन डॉक्टर नहीं

पांकी विस क्षेत्र में ठेकेदारी प्रथा को खूब बढ़ावा दिया गया है. मोटी रकम कमाने की चाहत में यहां स्वास्थ्य केन्द्र के लिए बड़े-बड़े भवन तो बनाए गए हैं. लेकिन इन भवनों में तो स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए आधारभूत संसाधन मुहैया ही नहीं कराए गए. और ना ही इन भवनों में डॉक्टर ही सेवा देते हैं.

किसी तरह के इलाज के लिए यहां के लोगों को या तो झोलाछाप डाक्टरों के भरोसे रहना पड़ता है या फिर मेदिनीनगर जाना पड़ता है. कुछ जगहों पर मरीज एएनएम के आसरे रहते हैं.

सड़कों की हालत काफी जर्जर

पांकी मुख्य पथ की ही हालत खराब है. लंबे समय पहले बनी मुख्य सड़क की मरम्मत तक नहीं करायी गयी है. ऐसे इस क्षेत्र में कथित तौर पर सड़कों का शिलान्यास और उद्घाटन बड़े पैमाने पर हुआ है, लेकिन उसका दूरगामी फायदा लोगों को नहीं मिल पाया.

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ग्रामीण अभी भी कई गांवों में पगडंडियों के सहारे आते-जाते हैं. पेयजल की किल्लत भी यहां काफी है. गर्मी के दिनों में तो इस इलाके में पेयजल का भारी संकट उत्पन्न हो जाती है.

रोजगार के लिए साधन नहीं

कृषि को छोड़ दिया जाए तो पांकी में रोजगार के लिए कोई साधन नहीं है. बेरोजगारी के कारण स्थानीय युवा दूसरे प्रदेश में पलायन कर जाते हैं. बड़ा उधोग तो दूर की बात है, छोटे-मोटे भी कोई उधोग-धंधे यहां संचालित नहीं है. ज्यादातर लोग खेती पर निर्भर है. मानसून के दगा देने पर किसानों को खाने के लाले पड़ जाते हैं.

तीन टर्म विदेश सिंह रहे हैं विधायक

पांकी विधानसभा क्षेत्र में अब तक के चार चुनाव में दल कोई रहे, पांकी का चेहरा विदेश सिंह ही होते थे. लगातार चार बार विधायक रहे. 2016 में उनके निधन के बाद उपचुनाव में उनके बेटे देवेंद्र कुमार सिंह उर्फ बिट्टू सिंह विधायक चुने गए.

इस चुनाव में देवेंद्र सिंह फिर से मैदान में हैं. पिछले चुनावों में जीत-हार की तस्वीर साफ रहती थी. लेकिन इस बार जीत की राह आसान नहीं लगती. हालांकि राजनीति और क्रिकेट में क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता?

मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा उम्मीदवार के बीच

पहले राजनीति का पहिया विदेश सिंह के इर्द-गिर्द घूमता था. लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं. इस बार देवेंद्र की राह आसान नहीं है. उनका प्रतिद्वंदी वही है, जो पिछले चुनाव उनके पिता के लिए भी चुनौती बनता रहा है.

पिछले बार झामुमो के टिकट से चुनाव लड़े कुशवाहा शशिभूषण मेहता इस बार भाजपा के उम्मीदवार हैं. उपचुनाव में पूर्व मंत्री मधु सिंह के पुत्र लाल सूरज बिट्टू सिंह के प्रतिद्वंद्वी रहे हैं. 2014 के चुनाव में अमित तिवारी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे.

अमित तिवारी और लाल सूरज के नहीं रहने पर मुख्य मुकाबले में कांग्रेस के देवेन्द्र कुमार सिंह और भाजपा के उम्मीदवार शशिभूषण मेहता के बीच है.

जातीय धुव्रीकरण रहता है बड़ा फैक्टर

यहां चुनाव में जातीय धुव्रीकरण सबसे बड़ा फैक्टर रहा है. विदेश सिंह अगड़ी जातियों के अलावा मुस्लिम और पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में गोलबंद करने सफल रहे थे. इस चुनाव में जो प्रत्याशी वोटों का धुव्रीकरण अपने पक्ष में करने में सफल रहा, वह मजबूत स्थिति में रहेगा.

कब कौन रहे विधायक

पिछले चार चुनावों पर नजर डाली जाए तो 2016 उपचुनाव में देवेंद्र कुमार सिंह उर्फ बिट्टू सिंह विधायक रहे थे. इससे पहले 2014, 2009 एवं 2005 में भी बिट्टू सिंह के पिता विदेश सिंह ने यहां से जीत हासिल की थी.

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