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आज के हालात को बयान करतीं दशकों पहले लिखी गयीं गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताएं

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1

मैं तुम लोगों से इतना दूर हूं

तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है

कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है.

 

मेरी असंग स्थिति में चलता-फिरता साथ है,

अकेले में साहचर्य का हाथ है,

उनका जो तुम्हारे द्वारा गर्हित हैं

किन्तु वे मेरी व्याकुल आत्मा में बिम्बित हैं, पुरस्कृत हैं

इसीलिए, तुम्हारा मुझ पर सतत आघात है !!

सबके सामने और अकेले में.

( मेरे रक्त-भरे महाकाव्यों के पन्ने उड़ते हैं

तुम्हारे-हमारे इस सारे झमेले में )

 

 

असफलता का धूल-कचरा ओढ़े हूं

इसलिए कि वह चक्करदार ज़ीनों पर मिलती है

छल-छद्म धन की

किन्तु मैं सीधी-सादी पटरी-पटरी दौड़ा हूं

जीवन की.

फिर भी मैं अपनी सार्थकता से खिन्न हूं

विष से अप्रसन्न हूं

इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए

पूरी दुनिया साफ़ करन के लिए मेहतर चाहिए

वह मेहतर मैं हो नहीं पाता

पर, रोज़ कोई भीतर चिल्लाता है

कि कोई काम बुरा नहीं

बशर्ते कि आदमी खरा हो

फिर भी मैं उस ओर अपने को ढो नहीं पाता.

रिफ्रिजरेटरों, विटैमिनों, रेडियोग्रेमों के बाहर की

गतियों की दुनिया में

मेरी वह भूखी बच्ची मुनिया है शून्यों में

पेटों की आंतों में न्यूनों की पीड़ा है

छाती के कोषों में रहितों की व्रीड़ा है

 

शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है

शेष सब अवास्तव अयथार्थ मिथ्या है भ्रम है

सत्य केवल एक जो कि

दुःखों का क्रम है

 

मैं कनफटा हूं हेठा हूं

शेव्रलेट-डॉज के नीचे मैं लेटा हूं

तेलिया लिबास में पुरज़े सुधारता हूं

तुम्हारी आज्ञाएँ ढोता हूं.

 

2

तुम्हारे पास, हमारे पास,

सिर्फ़ एक चीज़ है –

ईमान का डंडा है,

बुद्धि का बल्लम है,

अभय की गेती है

हृदय की तगारी है – तसला है

नए-नए बनाने के लिए भवन

आत्मा के,

मनुष्य के,

हृदय की तगारी में ढोते हैं हमीं लोग

जीवन की गीली और

महकती हुई मिट्टी को.

जीवन-मैदानों में

लक्ष्य के शिखरों पर

नए किले बनाने में

व्यस्त हैं हमीं लोग

हमारा समाज यह जुटा ही रहता है.

पहाड़ी चट्टानों को

चढ़ान पर चढ़ाते हुए

हज़ारों भुजाओं से

ढकेलते हुए कि जब

पूरा शारीरिक ज़ोर

फुफ्फुस की पूरी साँस

छाती का पूरा दम

लगाने के लक्षण-रूप

चेहरे हमारे जब

बिगड़ से जाते हैं –

सूरज देख लेता है

दिशाओं के कानों में कहता है –

दुर्गों के शिखर से

हमारे कंधे पर चढ़

खड़े होने वाले ये

दूरबीन लगा कर नहीं देखेंगे –

कि मंगल में क्या-क्या है!!

चंद्रलोक-छाया को मापकर

वहाँ के पहाड़ों की उँचाई नहीं नापेंगे,

वरन् स्वयं ही वे

विचरण करेंगे इन नए-नए लोकों में,

देश-काल-प्रकृति-सृष्टि-जेता ये.

इसलिए अगर ये लोग

सड़क-छाप जीवन की धूल-धूप

मामूली रूप-रंग

लिए हुए होने से

तथाकथित ‘सफलता’ के

खच्चरों व टट्टुओं के द्वारा यदि

निरर्थक व महत्वहीन

क़रार दिए जाते हों

तो कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं.

 

3

अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे

उठाने ही होंगे .

तोड़ने ही होंगे

मठ और गढ़ सब .

पहुँचना होगा दुर्गम पर्वतों के उस पार

तब कहीं देखने मिलेंगी बाहें

जिसमें कि प्रतिपल कांपता रहता

अरुण कमल एक …

 

4

अगर मेरी कविताएं पसंद नहीं

उन्हें जला दो ,

अगर उसका लोहा पसंद नहीं

उसे गला दो ,

अगर उसकी आग बुरी लगती है

दबा डालो ,

इस तरह बला टालो !

लेकिन याद रखो

यह लोहा खेतों में तीखे तलवारों का जंगल बन सकेगा

मेरे नाम से नहीं, किसी और के नाम से सही,

और यह आग बार-बार चूल्हे में सपनों-सी जागेगी

सिगड़ी में ख़यालों सी भड़केगी , दिल में दमकेगी

मेरे नाम से नहीं किसी और नाम से सही .

लेकिन मैं वहाँ रहूंगा,

तुम्हारे सपनों में आऊँगा,

सताऊँगा

खिलखिलाऊंगा

खड़ा रहूंगा

तुम्हारी छाती पर अड़ा रहूंगा.

 

5

ज़िन्दगी की कोख से जनमा

नया इस्पात

दिल के खून में रंगकर.

तुम्हारे शब्द मेरे शब्द

मानव देह धारण कर

असंख्य स्त्री-पुरुष-बालक

बने , जग में भटकते हैं

कहीं जनमे नए इस्पात को पाने.

झुलसते जा रहे हैं आग में

या मुंद रहे हैं धूल-धक्कड़ में,

किसी की खोज है उनको,

किसी नेतृत्व की.

 

6

अरे ! जन-संग-ऊष्मा के

बिना , व्यक्तित्व के स्तर जुड़ नहीं सकते.

प्रयासी प्रेरणा के स्रोत,

सक्रिय वेदना की ज्योति ,

सब साहाय्य उनसे लो.

तुम्हारी मुक्ति उनके प्रेम से होगी.

कि तदगत लक्ष्य में से ही

हृदय के नेत्र जागेंगे,

व जीवन-लक्ष्य उनके प्राप्त

करने की क्रिया में से

उभर ऊपर

विकसते जाएंगे निज के

तुम्हारे गुण

कि अपनी मुक्ति के रास्ते

अकेले में नहीं

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