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Opinion

Article by our Columnists

Indian cricket team is due for a revamp

|| P. Vijay Raghavan ||
Ranchi: Dhoni’s brigade no longer appears to be even a shade of their World Cup form. The recently concluded test series against both England and Australia exposed their brittleness. Though to an extent it was repaired by the clean sweep against the visiting English Team, the cracks started to seriously emerge in Australia.

झारखंड के आदिवासियों को संवैधानिक एवं कानूनी सुरक्षा

|| स्टेन स्वामी ||
वैधानिक तरीके से चुनी गयी एक सरकार को हमेंशा संविधान और देश के कानून की रक्षा करनी चाहिए। चलिये हम एक एक करके विश्लेषण करें:
1. संविधान की पांचवी अनुसूची अनुच्छेद 244 (1) कहता है कि प्रत्येक राजय में जहां अनुसूचित क्षेत्र है एक जनजातीय सलाहकार परिषद की स्थापना होगी। जिसके सदस्यों की संख्या 20 से कम नहीं होगी और जिसमें तीन चैथाई सदस्य राज्य के विधान सभा के आदिवासी विधायक होंगे (4. (1)) यह जनजातीय सलाहकार परिषद का कत्र्तव्य होगा कि राज्य के आदिवासियों के कल्याण और प्रगति के मुद्दों पर सलाह देना जैसे कि राज्य के राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है। (4.(2)) राज्य का राज्यपाल जमीन हस्तांतरण को आदिवासियों के मध्य या किसी अन्य के लिये प्रतिबंधित या सीमित कर सकता है (5.(2).(र) और कोई नियम नहीं बनाया जायेगा जब तक कि नियम बनाने वाले राज्यपाल जनजातीय सलाहकार परिषद से सलाह मशविरा कर न ले (5.(5))

दुःखद बात यह है कि पिछले 10 वर्षों में सरकार ने उद्योगपतियों के साथ करीब 100 एमओयू किया है। अधिकांश उद्योग अनुसूचित क्षेत्रों में स्थापित होने वाले हैं एक लाख एकड़ से भी अधिक आदिवासी जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। 10 वर्षों के लम्बे समय में बहुत ही कम बार जनजातीय सलाहकार परिषद (टीएसी) की बैठक बुलाई गयी, उसमें किसी भी बैठक में उद्योगपतियों के साथ समझौता के बारे विचार विमर्श नहीं किया गया, और न ही टीएसी के सदस्यों से किसी तरह की सलाह मशविरा की गयी । जमीन अधिग्रहण का काम धड़ल्ले से हो रहा है। रैयती जमीन को ले जाने से आदिवासियों का विस्थापन होता है।

पिछले 10 वर्षों में झारखण्ड राज्य में छः गर्वनर हुए हैं लेकिन किसी गर्वनर ने जनजातीय सलाहकार परिषद से इन एमओयू के संबंध में और उनके लागू होने से आदिवासी भूमि का हस्तांतरण एवं आदिवासियों के विस्थापन के संबंध में कोई सलाह मशविरा नहीं किया है।

2. अब हम विधायिका के क्षेत्र का भी मूल्यांकन करें। हाल के दिनों में भारतीय संसद ने आदिवासियों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कानून पास किया है। जो पेसा कानून 1996 अर्थात् पंचायत उपबंधों को अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार के नाम से जाना जाता है। इसकी कुछ निम्नलिखित विशेषताएं हैं।
क. प्रत्येक गांव में एक ग्राम सभा होगी जो पंचायत क्षेत्र के भीतर समाविष्ट किसी राजस्व गांव से संबंधित मतदाता सूची में पंजीकृत व्यक्तियों से मिलकर बनने वाली निकाय हो।
ख. प्रत्येक ग्राम सभा लोगों के रूढ़ियो,ं परम्पराओं, संास्कृतिक पहचान, समूदायिक संसाधन और विवादों के सुलझाने के परम्परागत तरीकों को सुरक्षित रखने में सक्षम होगा।
ग. प्रत्येक ग्राम सभा गांव के आर्थिक विकास के लिए योजनाओं की पहचान करेगी तथा उनकी प्राथमिकता निर्धारित करने के सिद्धांतों को सुनिश्चित करेगी।
घ. सामाजिक तथा आर्थिक विकास के लिए ऐसी योजना, जिसमें ग्राम पंचायत स्तर की सभी वार्षिक योजनाएं सम्मिलित हैं, कार्यक्रमों तथा परियोजनाओं का क्रियान्वयन करने से पूर्व अनुमोदित करना।
ड. अनुसूचित क्षेत्र में लघु खनिज पदार्थ के उत्खनन के लिए लईसेंस या लीज देने के पूर्व ग्राम सभा या पंचायत की सिफारिश लेना अनिवार्य होगा।
च. लघु वनोपज का मालिकाना ग्राम सभा के पास होगा।
छ. अनुसूचित क्षेत्र में जमीन हस्तांतरण पर रोक लगाने का अधिकार ग्राम सभा को होगा साथ ही अवैध तरीके से हस्तांतरित आदिवासी जमीन की पुनर्वापसी कराने का अधिकार भी ग्राम सभा को होगा।
ज. सामाजिक क्षेत्र के सभी संस्थाओं पर ग्राम सभा का नियंत्रण होगा।
झारखण्ड सरकार ने पंचायत अधिनियम 2001 हड़बड़ी में पारित किया और आदिवासी जनता से कोई सलाह मशविरा नहीं किया जिसके कारण से पेसा कानून में ग्राम सभा को जो अधिकार दिये गये हैं वे पंचायत अधिनियम 2001 में नहीं है।

3 सी एन टी एक्ट
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सी एन टी एक्ट), 1908, के अनुसार छोटानागपुर में जमीन के अंतरण के संबंध में प्रावधान हैं अंतरण का अर्थ है बिक्री, दान, विनिमय, वसीयत या बंधक द्वारा किसी की जमीन दूसरे किसी के हाथ में चले जाना। अधिनियम की धारा 46 में भूमि अंतरण के संबंध में निम्नलिखित प्रावधान हैंः
46(1)(क) - कोई आदिवासी अपनी जमीन (होल्डिंग) या उसके किसी भाग पर अपने हक को सिर्फ किसी दूसरे आदिवासी को ही अंतरित कर सकता है, बशर्ते कि वह उसी थाना
क्षेत्र का निवासी हो जिसमें वह जमीन है। इस अंतरण के पहले उपायुक्त से अनुमति लेना अनिवार्य है।
46(1)(ख) - कोई अनुसूचित जाति या सूचीबद्ध खास पिछड़ी जाति का सदस्य (रैयत) अपनी जमीन(होल्डिंग) या उसके किसी भाग पर अपने हक को सिर्फ किसी दूसरे अनुसूचित जाति या सूचीबद्ध खास पिछड़ी जाति के सदस्य को ही अंतरित कर सकता है, बशर्ते कि वह उसी जिले का निवासी हो जिसमें जमीन हो। इस अंतरण के पहले उपायुक्त से अनुमति लेना अनिवार्य है।
अधिनियम (सी एन टी एक्ट) के ये प्रावधान आज तक लगातार लागू हैं।

4 संताल परगाना काष्तकारी अधिनियम 1949
सेक्षन 20 के अनुसार कोई भी रैयती जमीन को
बिक्री, दान, विनिमय, वसीयत या बंधक द्वारा हस्तांतरण नहीं किया जाना है।
जब सरकार ऐसी जमीन को कोई भी गैर आदिवासी को हस्तांतरित करती है तो इस कानून को उल्लंघन है।
सेक्षन 41 के अनुसार पहाड़िया गांव के जमीन को किसी गैर पहाड़िया को हस्तांतरित करना मना है।
सेक्षन 27,28,35, 36 के अनुसार संताल परगाना में बंजर भूमि, नाला, नदी, चारागाह एवं रास्ता को सिर्फ कृषि लायक बनाने के लिए ही अधिग्रहित किया जा सकता है।

5 उच्चत्तम न्यायालय का समता निर्णय (1997)
‘‘आदिवासी अपनी जमीन से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं। जिस जमीन पर वे रहते और उत्पादन करते हैं उसे एक सामाजिक प्रतिष्ठा और स्वाभिमान प्रदान करता है और समाज में आर्थिक एवं
सामाजिक न्याय उपलब्ध करता है। यह उनके आर्थिक सषक्तिकरण में एक सही हथियार बनता है’’। ( पारा: 9, 10)

मुख्य विन्दु
1. अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासी खाता जमीन को कोई भी गैर आदिवासी व्यक्ति या संघ को खनन के लिए आवंटित नहीं किया जा सकता है। (न. 110,118)
2. अगर अनुसूचित क्षेत्र में खास खनिज पदार्थ उपलब्ध है और उसको निकालना देष के विकास के लिए जरूरी माना जाता है, तब सरकार का दायित्व बनता है कि उस क्षेत्र के आदिवासी समाज को खास काॅपरेटिव सोसइटी में गठित कर उन्हें सक्षम बनाना। (न. 94)
3. अगर अनुसूचित क्षेत्र में गैर मजूरवा जमीन पर भी खनिज निकालना हो तो उसे गैर आदिवासियों /संघ को आवंटित नहीं किया जा सकता है। मगर सरकार खुद अपने काॅरपोरेषन को ही आवंटित कर सकती है। (114)
4. जहां आरक्षित एवं सुरक्षित वन है या ऐसा वन जहां खनन करने से वातावरण की क्षति होगी वहां विलकुल खनन लीस नहीं दिया जाएगा। (न. 119 -122)
6 वन अधिकार अधिनियम - 2006

सेक्षन 3 (1) में आदिवासी एवं पारम्परिक वन निवासियों को निम्नलिखित अधिकार दिया गया हैः
1. जीविका के लिए व्यक्तिगत या सामूहिक स्व कृषि एवं अधिपत्य का अधिकार ।
2. लघु वनोपज पर स्वामीत्व, संग्रहण, इस्तेमाल और विक्री करने का अधिकार ै।
3. जलस्रोत एवं उससे संबंधित उत्पाद पर सामूदायिक अधिकार ।
4. आदिम जनजाति समूहों को सामूदायिक रहनवास का अधिकार।
5. सामूदायिक वन स्रोतों को सुरक्षित, पुर्नारोपण एवं निरीक्षण का अधिकार।
6. प्रकृतिक संतुलन, बौद्धिक संपत्ति एवं पारम्परिक तथा सांस्कृतिक ज्ञान को सुरक्षित रखने का अधिकार।

इसका कार्यान्वयन (2006-मार्च 2011)
देष भर में मांग: 30 लाख... अधिकांष व्यक्तिगत ... सामूदायिक मांग सिर्फ 46 हजार (1.6 प्रतिषत)
बरर्खास्त किये गये: 14 लाख (47 प्रतिषत)
स्वीकृति: 11 लाख
विचाराधीन: 5 लाख
निष्कर्ष: झारखण्ड में ऐसी स्थिति है कि राज्य सरकार देश के संविधान एवं देश के कानून का सबसे अधिक उल्लंघन करने वाली संस्था है। जो व्यक्ति, संगठन या जनांदोलन आदिवासी हित संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों को पूरा करने के लिए सरकार से मांग करते हैं, उसे सुनने के लिए न सरकार, न प्रषासन और न ही न्यायापालिका तैयार है। सच्चाई यह है कि वर्तमान परिस्थिति में झारखंडी आदिवासियों को न्याय पाने का कोई रास्ता नहीं दिखता।

Kapil Sibal: The Nail Minister Of A Democracy

|| by Vijay Bhaskar ||
When you have friends like Kapil Sibbal, you do not need enemies .He is the one person in Indian politics who changes colour more efficiently than a chameleon. No doubt Congress found him ultra fit to carry out important duties as spokes person of the party. He spoke uncontrolled, often putting his party in an apologetic mode.

Circumstantial evidence should be conclusive: Supreme Court

New Delhi, Jan 15 | A woman found murdered, her jewellery gone missing and her two neighbours arrested after their "confession" -- what the Kerala Police built as an open-and-shut case was torn apart by the Supreme Court, which maintained that circumstantial evidence should leave absolutely no room for doubt.

Where Ants Drove Out Elephants

by Stan Swamy
|| Story of people’s resistance to displacement in Jharkhand ||
Displacement is painful for any body. To leave the place where one was born and brought up, the house that one built with one’s own labour can be even more painful. Even more, when no alternate resettlement has been worked out and one has nowhere to go, it is most painful. And when it comes to the Indigenous Adivasi People for whom their land is not just an economic commodity but a source of spiritual sustenance, it can be heart-rending.

Lokpal bill is well thought out: Amartya Sen

Kolkata, Jan 3 | Amid fiasco in Parliament over the Lokpal bill and strong criticism of some of its clauses on Lokayukta by different political parties, Nobel laureate, economist Amartya Sen Monday said that the anti-graft legislation is well thought out.

Lesson For Anna: Pride Goeth Before A Fall

- by Amulya Ganguli
A day before what turned out to be Anna Hazare's flop show in Mumbai, his colleagues were full of hype and hubris during a television debate.

राज्यसभा की कार्यवाही में कुछ भी असाधारण नहीं : सोमनाथ

कोलकाता, 30 दिसम्बर | लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने शुक्रवार को कहा कि राज्यसभा में गुरुवार रात को जो कुछ भी हुआ, वह असाधारण नहीं था। वास्तव में सरकार के साथ-साथ विपक्षी दल भी राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में जुटे थे। चटर्जी ने कहा, "इसमें कुछ भी असाधारण नहीं था। मैं यह नहीं कह रहा कि इस तरह की चीजें नियमित तौर पर होती हैं, लेकिन ऐसा होता है। इसमें भी कुछ भी ऐतिहासिक नहीं है.. इसे लेकर अनावश्यक ही शोर मचाया जा रहा है।"

Without Legal Reforms Lokpal Will Fail: Study

Bangalore, Dec 27 : Scholars at the university set up by IT czar Azim Premji seriously doubt the effectiveness of the all-powerful Lokpal, advocated by Anna Hazare and his team, to fight corruption without legal reforms.

Lokpal Is Still A Long Haul, But Anna Damages His Cause

- by Amulya Ganguli
Considering that Anna Hazare is dissatisfied with the Lokpal bill presented to parliament, it is obvious that a quick resolution of the confrontation between him and the government is not feasible. In fact, the scene can take a turn for the worse if, for one, Anna's fast has an adverse effect on his health, as his doctors have warned. And, for another, if the proposed protest outside Sonia Gandhi's and Rahul Gandhi's houses leads to violence.