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क्या डुमरी से पूरी होगी सुदेश महतो की फिर से विधायक बनने की मुराद !

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Bokaro: भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने को तैयार आजसू, डुमरी विधानसभा सीट पर अपना प्रत्याशी खड़ा करने की दावेदारी कर रही है. और शायद यहां से प्रत्याशी कोई और नहीं बल्कि आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो  हो सकते है.

आज की राजनीतिक परिस्थिति में डुमरी आजसू के लिए सेफ़ जोन है. जहां से सिल्ली विधानसभा क्षे त्र से दो बार शिकस्त खाये सुदेश महतो ऑक्सीजन ले वापस विधानसभा के गलियारों तक पहुंच सकते हैं.

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डुमरी क्षेत्र में बढ़ी सक्रियता

जैसे-जैसे चुनाव करीब आता जा रहा है, वैसे-वैसे सुदेश महतो की डुमरी क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने लगी है. सुदेश महतो शायद अपने गृह क्षेत्र सिल्ली के साथ डुमरी विधानसभा  सीट से भी विधानसभा चुनाव लड़ने का मन बना रहे हैं.

पिछले चुनावों से सीख लेते हुए इस बार सुदेश महतो सेफ प्ले करना चाहते हैं. हाल ही में हुए संसदीय चुनाव में आजसू ने डुमरी में अच्छा प्रदर्शन किया था.

झामुमो के वर्तमान विधायक जगरनाथ महतो  का गढ़ कहे जाने वाले डुमरी में, आजसू के चंद्रप्रकाश चौधरी ने एक लाख से भी ऊपर वोट लाकर अपना परचम लहरा दिया था.

इस सीट पर पिछले तीन विधानसभा चुनावों में झामुमो  का वर्चस्व रहा है लेकिन इस बार एंटी-इनकंबेंसी हावी है. डुमरी में लगभग 80 प्रतिशत महतो (कुर्मी) है और यहां परिवर्तन की लहर काफी जोर से चल रही है.

सुदेश महतो के करीबियों के अनुसार, यहां आजसू को जरूर फायदा मिलेगा. डुमरी सीट पर आजसू का विश्वास संसदीय चुनाव के बाद बढ़ा है.

आजसू को लगभग 1.08 लाख वोट मिले थे जबकि झामुमो के जगन्नाथ महतो को लगभग 70,000 वोट ही मिले थै. डुमरी में आजसु ने लगभग 37000 वोटों से झामुमो को पीछे छोड़ दिया था.

पार्टी नेटवर्क को मजबूत करने के निर्देश

शनिवार को सुदेश महतो ने स्थानीय सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी और केंद्रीय समिति के सदस्यों के साथ डुमरी के सभी 373 मतदान केंद्रों के प्रभारियों के साथ बैठक कर पार्टी नेटवर्क को मजबूत करने को कहा है.

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सुदेश महतो की बढ़ती हुई सक्रियता को भांपते हुए डुमरी में बूथ कमेटी सदस्य भी यह सोचने के लिए मजबूर है कि हो ना हो सुदेश महतो इस बार यहां से चुनाव लड़ सकते हैं.

वैसे भी आजसू के पास प्रोजेक्ट करने के लिए कोई और बेहतर चेहरा नहीं है.सुदेश महतो के नाम पर हो सकता है कि भाजपा आसानी से मान जाए.

शनिवार को हुए पार्टी मीटिंग में आजसू के कार्यकर्ताओं ने सुदेश महतो का अभिवादन 51 किलो का हार पहनाकर कर किया गया. वहीं कांग्रेस छोड़ करीब 100 लोगों ने आजसू का दामन थाम कर माहौल में चार चांद लगा दिया है.

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सही समय का इंतजार कीजिए- सांसद

चंद्रप्रकाश चौधरी के अनुसार “हम सभी संभावनाओं पर काम कर रहे हैं. कुछ भी असंभव नहीं है. आजसू ने हाल के संसदीय चुनाव में डुमरी में अच्छा प्रदर्शन किया है. उस प्रदर्शन के आधार पर हम भाजपा से यह दावा करेंगे कि यह सीट आजसू की झोली आए. हमने संसदीय चुनाव में एक लाख से अधिक वोट हासिल किए हैं जो हमारे बढ़ते जनाधार को दिखाता है”.

चौधरी से जब पूछा गया कि क्या सुदेश महतो डुमरी सीट के लिए इच्छुक हैं, तो उन्होंने कहा कि “यह तो आने वाला समय बताएगा. अभी हम हर पता नहीं खोल सकते. वैसे कुछ भी हो सकता है.”

सुदेश महतो पिछले 2014 का विधानसभा चुनाव और 2018 उपचुनाव झामुमो से हार गए थे. सुदेश महतो की विधानसभा में वापसी आजसू के लिए जरूरी है. क्योंकि अब चंद्रप्रकाश चौधरी भी सांसद हो गए है.

डुमरी में बहुउद्देश्यीय भवन में बूथ प्रभारी को संबोधित करते हुए, सुदेश महतो ने कहा “हमें अपनी ताकत से आगामी विधानसभा चुनाव लड़ना है. पार्टी के सभी कैडर चुनाव की तैयारी में जुट जाएं. हमें डुमरी जीतना है”.

आजसू के प्रवक्ता देवशरण भगत ने कहा,“पार्टी के कार्यकर्ताओं ने संसदीय चुनाव जिस उत्साह के साथ लड़ा था, उसी उत्साह के साथ हम आनेवाला विधानसभा चुनाव भी डुमरी में लड़ेंगे और जीतेंगे”.

आजसू के एक और केंद्रीय समिति के सदस्य, लम्बोदर महतो ने कहा, “भाजपा-आजसू के बीच सीट बंटवारे को अंतिम रूप देना बाकी है. हम केवल उन विधानसभा क्षेत्रों के टिकट के लिए दावेदारी करेंगे, जहां हम मजबूत साबित हुए हैं. डुमरी उन मजबूत सीटों में से एक है. हम अपने मजबूत उम्मीदवार को मैदान में उतारने जा रहे हैं.”

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महतो वोटर बड़ा फैक्टर

बीजेपी  द्वारा राज्य में फिर से चुनाव जीतने के लिए लाया गया ’65 प्लस ‘ का मंत्र निश्चित रूप से नेताओं को डुमरी में आजसू के बारे मे सोचने के लिए मजबूर करेगा.

क्योंकि डुमरी में एनडीए की जीत ही नहीं, झामुमो की हार भी काफी मायने रखती है. डुमरी में महतो समुदाय किसी भी उम्मीदवार के लिए जीत दर्ज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

आजसू महतो मतदाताओं को लुभाने का एक अच्छा विकल्प हो सकता है. पिछले संसदीय चुनाव में गिरिडीह  सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी के जितने और जगन्नाथ महतो के हारने के पीछे महतोवाद भी एक बहुत बड़ा फैक्टर था.

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