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18 साल पहले पेड़की ने सहा डायन प्रताड़ना का दर्द, किताब में छपी कहानी, पर न्याय नहीं

एनसीईआरटी ने गणित की पुस्तक में छापा डायन प्रताड़ना की शिकार पेड़की की सच्ची कहानी

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Dhanbad : एक महिला जिसने 18 साल पहले डायन प्रताड़ना का असहनीय जख्म सहा. अपनों के प्रताड़ना की शिकार बनी. आज उसी के दर्द से छात्र गणित सिख रहे हैं. दरअसल एनसीईआरटी के गणित के पुस्तक में डायन प्रताड़ना की पीड़िता पेड़की की कहानी छापी गयी है. जिसे पढ़ कक्षा तीन के छात्र रेखा गणित सिख रहे हैं. वहीं डायन पीड़िता आज भी न्याय के लिए दर-दर की ठोकरे खा रही है.

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पेड़की की जुबानी उसकी कहानी

मेरा नाम पेड़की देवी है. धनबाद जिले (झारखंड) के एक गांव में रहती हूं. मुझे कभी भी स्कूल जाने का मौका नहीं मिला. 15 साल में मेरी शादी कर दी गई. मेरी शादी के तीन साल बाद मेरी पहली लड़की ने जन्म लिया. बाद में मेरे तीन और बच्चे हुए जब मैं 20, 22 और 24 साल की थी. 35 साल की उम्र में मेरी दुनिया थम गई. मेरा पति बीमार हुआ और वह मर गया. पति के भाइयों ने जमीन जायजाद खेत छीनने के लिए मुझे पीटा और कहा कि मैं डायन हूं. पेड़की का पैर किस उम्र में टूटा था ? उसकी शादी किस उम्र में हुई थी ? उसने पहली बार पुलिस स्टेशन किस उम्र में देखा ? तीसरी कक्षा के बच्चे अपनी गणित की पाठ्यपुस्तक में इन्हीं सवालों से रेखा गणित सीख रहे हैं.

समय रेखा की गणित पेड़की देवी के साथ हुए अन्याय की सच्ची घटना पर आधारित

समय रेखा की यह गणित पेड़की देवी के साथ हुए अन्याय की सच्ची घटना पर आधारित है. पेड़की झारखंड के धनबाद जिले के खेड़ाबेड़ा गांव की है. उसे उसके ही परिवारवालों ने डायन बताकर प्रताड़ित किया था. और अब उनकी यह कहानी एनसीईआरटी की किताबों में पढ़ाई जा रही है. लेकिन पेड़की की पीड़ा आज भी कम नहीं हुई है क्योंकि घटना के 19 साल बाद भी उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला है.

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पेड़की की कहानी में अपमान घृणा चोट और अन्याय है

पेड़की देवी की कहानी बेहद दर्दभरी है. इसमें अपमान घृणा चोट और अन्याय है. उसे 22 मार्च 1999 को उनके ही परिवार के लोगों ने डायन बताकर गांव में निर्वस्त्र घुमाया गया था. उसे मैला पिलाया गया था. ये सब उसके साथ परिवार के लोगों ने ही किया था. पेड़की बताती है कि मैं उस दिन को कभी नहीं भूल सकती. 22 मार्च 1999 शाम के 4:15 बजे थे. घर की एक महिला की बीमारी का दोष इन लोगों ने मुझपर लगा दिया. मुझे डायन बताकर प्रताड़ित किया गया. गांव से भगाने की कोशिश की गई ताकि मेरी संपत्ति पर कब्जा किया जा सके. घटना के बाद मैं छह माह तक 24 घंटे पुलिस की सुरक्षा में रहने को मजबूर थी. पुलिस ने 13 लोगों को नामजद आरोपी बनाया था. लेकिन मुझे न्याय आजतक नहीं मिल पाया है.

मेरा दर्द को किसी ने नहीं समझा

वे कहती है कि मेरे जीवन की घटना को कहानी बनाकर बच्चों को सिर्फ गणित सिखाया गया. मेरा दर्द को किसी ने नहीं समझा. पेड़की के साथ हुई इस घटना को 2007 में एनसीईआरटी ने तीसरी की पाठ्यपुस्तक गणित का जादू में जगह दी. तबसे देशभर में बच्चे इसे पढ़ रहे हैं. पेड़की कहती है कि प्रताड़ना का हर क्षण उन्हें आज भी भयभीत करता है. वे इस प्रताड़ना के बाद कभी भी चैन से नहीं सो सकी. वो अपमान वो घृणा और वो जख्म उन्हें आज भी विचलित करता है. किताब के चंद पन्नों में उनकी जिंदगी सिमट कर रह गई. सरकार ने किसी विकास योजना का लाभ नहीं दिया और ना ही उनके साथ कोई खड़ा रहा. पेड़की कहती है की किताबों में जगह ना देकर उन्हें न्याय मिलती तो अधिक खुशी होती.

उपायुक्त ने न्याय दिलाने की कही बात

निचली अदालत में 18 अक्टूबर 2004 को सजा सुनाई थी. नामजद आरोपी कुछ दिन में ही जेल से बाहर आ गए. मामला अभी हाई कोर्ट में चल रहा है. अब स्थिति ऐसी है कि पेड़की के पास पैसे भी नहीं है की वो न्याय के लिए केस लड़ सके. वहीं धनबाद उपायुक्त ए. दोड्डे ने जब पेड़की की कहानी सुनी तो उन्होंने अधिकारी को भेजकर पेड़की को हर संभव सरकारी मदद के अलावे इंसाफ दिलाने की बात कही है.

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