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आजादी के 70 साल बाद भी बोक्काखांड गांव बेहाल, एक कुएं के भरोसे है पूरा गांव

आधे घंटे का इंतजार करके पानी भरते हैं ग्रामीण

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Manoj Dutt Dev

Latehar : इस भीषण गर्मी में कोई राह चलते प्यासे को पानी पिला दे तो प्यासा उसे आशीर्वाद देते नहीं थकता. लेकिन ऐसा हर जगह पर देखने को नहीं मिलता. जब खुद के लिए पानी के लाले पड़े हों तो ऐसे में बाहर वालों को एक चुल्लू पानी देना भी सोना देने से भी ज्यादा लगता है. कुछ ऐसा ही हाल लातेहार जिला अन्तर्गत सदर प्रखंड के बोक्काखांड गांव में देखने को मिला है. जहां जिला मुख्यालय से महज 25 किलोमीटर पर सीधी पहाड़ी पर बसा एक गांव है.

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गांव तक पहुंचाने वाला रास्ता बेहद पथरीला है. क्योंकि आजादी के 70 साल बाद भी ये गांव विकास योजना से कोसों दूर है. इस गांव के ग्रामीण सिर्फ एक कुआं के भरोसे हैं. ग्रामीम भी हर दिन किसी अधिकारी का इंतजार में रहते हैं , जो आए और उनके लिए पानी की व्यवस्था करवाये.

गांव तक जाने का रास्ता

इस गांव के ग्रामीणों की स्थिति बद से बदतर है. आज़ादी के 70 साल बीतने के बावजूद आज तक किसी भी विकास पदाधिकारी ने गांव में झांकने की जहमत नहीं उठाई है. अधिकारी तो दूर गांव के मुखिया ने भी अपना मुंह मोड़ रखा है. सिर्फ इस गांव को नक्सलियों का गढ़ बताकर झूठी अफवाह फैली दी गयी है.

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एक कुआं पर 17 परिवार हैं आश्रित

बोक्काखांड ग्राम में 17 घर है और यहां 50-55 लोग रहते हैं. गांव में सिर्फ एक कुआं है और उसी के भरोसे यहां के लोग हैं. कुएं की स्थिती भी दयनीय है. हाल ऐसा है की दस बाल्टी पानी निकालने के बाद आधा घंटा इंतजार करना पड़ना है. आधा घंटा बाद जब कुएं में कुछ पानी जमा होता है तो ग्रामीण उसे फिर से निकालते हैं.

यानि कि वहां पर हर परिवार की पारी बंधी है और इंतजार करके वे कुएं से पानी निकालते हैं. वहीं जो पानी कुआं से निकलता है, वो पीने लायक नहीं. लेकिन ग्रामीम उसे ही पीकर अपना गुजारा कर रहे हैं.

इस बारे में ग्रामीण जुनास भेंगरा ने बताया की कुआं बहुत पुराना है और इसे पूर्वजों ने खुद से बनावाया था. साल 2010 में यह कुआं धंस गया था तो उसे 2011 में मनरेगा के तहत फिर से बनवाया गया. जो इस गांव के विकास कार्यों का एकमात्र प्रतीक है.

मनरेगा के तहत जब कुआं का जीर्णोधार किया गया था तो उस दौरान जुनास भेंगरा, फूलमनी भेंगरा को छत्तीस दिन का रोजगार मिला था. लेकिन उसके बाद गांव में कभी किसी को सरकार की ओर से रोजगार नहीं दिया मिला. हालांकि कुआं का जीर्णोधार करने के बाद भी फिर से वही स्थिती हो गयी. साथ ही गांव में पानी की किल्लत तो पहले जैसी है ही.

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किसी भी ग्रामीण को नहीं मिलता वृद्धा पेंशन

आजादी के 70 साल बाद भी बोक्काखांड गांव बेहाल, एक कुएं के भरोसे है पूरा गांव

इस गांव में कृपा भेंगरा, बहालों हेर्हेंज, मोनिका आइंद, मार्टिन होरो, सिलास खल्खो, सबन हेर्हंज, प्रभु सहाय आइंद, फूलमनी आइंद, जुलियानी खलखो, रानाबस आइंद वृद्ध व्यक्ति हैं. लेकिन आजतक किसी को वृद्धा पेंशन का लाभ नहीं मिला. इस बारे में गांव के बुजुर्गों ने बताया की एक तो पहाड़ चढ़कर और उतरकर जाना पड़ता है. रास्ता इतना खराब है कि जाना मुश्किल है. ऐसे में कई बार अंचल लातेहार में आवेदन दिया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. इसलिए अब तो हमने प्रयास करना भी छोड़ दिया है.

जीतने के बाद नहीं आते नेता

ग्रामीण सलोमी हेर्हंज, सबन हेर्हंज, सोम्रों आइंद, कृपा भेंगरा, बहालों हेर्हेंज, मोनिका आइंद, मार्टिन होरो, सिलास खलखो, सबन हेर्हंज, प्रभु सहाय आइन्द, फूलमनी आइन्द, जुलियानी खलखो, रानाबस आइन्द, अनुग्रहित खलखो, जकरियस खलखो इन सभी ने बताया कि पंचायत चुनाव हो या लोकसभा विधानसभा का चुनाव हमें कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि गांव से पहाड़ी उतरकर तीन किलोमीटर हम सब पैदल वोट डालने जाते हैं. लेकिन जीत जाने के बाद कोई भी नेता गांव में झांकने भी नहीं आता है.

साथ ही ग्रामीणों ने बताया की, सिर्फ नक्सली-नक्सली बोलकर हमलोगों को प्रताड़ित किया जाता है.  जबकि गांव में नक्सली आते भी नहीं और कई सालों से हमने उन्हें देखा भी नहीं. इससे आगे ग्रामीणों ने कहा कि बहुत पहले नक्सली आते भी थे तो ले सभी गांव से दूर जंगलों में ही रहते थे और सभी ग्रामीण उन्हें पानी तक नहीं देते थे.

ग्रामीणों ने बताया की, रोजगार के नाम पर हमारे पास पहाड़ी खेत थे. लेकिन बीते वर्ष बारिश में हमारे खेत भी बह गए, अब ऐसे में मुश्किल से ही गुजारा हो रहा है. इससे आगे कहा कि राशन का अनाज जो छोड़ा बहुत मिलता है, उससे ही गुजारा होता है, और पहाड़ से नीचे उतकर राशन लाने में भी बहुत मुश्किल होता है.

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प्रधानमंत्री ग्राम स्वराज की एक भी योजना नहीं पहुंची बोक्काखार 

2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने पंचवर्षीय प्रधानमंत्री ग्राम स्वराज योजना की घोषणा की थी. जिसके अन्तर्गत प्रधानमंत्री सौभाग्य बिजली योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री उज्जवल योजना, प्रधानमंत्री कृषि सम्मान निधि योजना, प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना ,अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जनधन योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा योजना थे.

लेकिन बोक्काखार गांव के जमीनी हकीकत की बात करें तो उपरोक्त योजनाओं ने से कोई भी विकास की योजना इस गांव में नहीं पहुंची है. ग्रामीण कुएं का पानी पीने के लिए विवश है. साथ ही गांव में शोचालय नहीं है और बिजली का तो नामोनिशान भी नहीं है. गांव में एक भी पक्का मकान नहीं है. और ना ही किसी ग्रामीण के पास रोजगार. साथ ही अगर कोई बीमार पड़ जाए तो इलाज भी भगवान ही भरोसे है.

प्रशासन बोक्काखार जायेगी : उपायुक्त 

मामले पर जब न्यूज विंग संवाददाता ने लातेहार उपायुक्त राजीव कुमार से फोन पर पूछा तो बोक्काखार गांव को नाम सुनते ही वे चौंक गए. उन्होंने कहा कि पहली बार वे इस गांव का नाम सुन रहे हैं.

इससे आगे उन्होंने न्यूज विंग संवाददात से ही पूछा कि बोक्काखार गांव किस पंचायत और प्रखंड में आता है. उपायुक्त ने कहा कि बोक्काखार ग्राव की विकास जल्दी ही होगा और प्रशासन खुद उस गांव में जाकर जायजा लेगी, फिर वहां विकास कार्य किए जायेंगे.

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