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एके राय को राजकीय सम्मान के साथ दी गयी अंतिम विदाई

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Dhanbad: मासस के संस्थापक एके राय का सोमवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया.  रविवार  को सेंट्रल अस्पताल में एके राय का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया था. सोमवार को  मासस  के केंद्रीय कार्यालय से अंतिम यात्रा निकाली गयी, जिसमें हजारों लोग शामिल हुए. अंतिम यात्रा झरिया होते हुए मोहलबनी घाट पर समाप्त हुई. इस दौरान सड़क पर जगह-जगह खड़े होकर कॉमरेड राय दा को लाल सलाम दे रहे थे. धनबाद से मोहलबनी घाट जाने में लगभग 6 घंटे लगे.

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नुनुडीह स्थित लाल बंगला मैदान में तिरंगे से लिपटे शव को राजकीय सम्मान के साथ श्रद्धांजलि दी गयी. इस दौरान हजारों चाहनेवाले ने भी माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी. गौरतलब है कि राय दा पिछले पांच साल से नुनुडीह में रहते थे. एक समर्थक सुबुर गोराई उनकी सेवा किया करते थे.

उसके बाद अंतिम संस्कार के लिए शव को दामोदर नदी के मोहलबनी घाट ले जाया गया, जहां राजकीय सम्मान के साथ जवानों ने सलामी दी. इस दौरान धनबाद डीसी, मंत्री अमर बाउरी, जेएमएम सुप्रीमो शिबू सोरेन, पूर्व मंत्री समरेश सिंह, पूर्व मंत्री मथुरा महतो, निरसा विधायक अरूप चटर्जी सहित हजारों लाल झंडा के समर्थक और अन्य दल के नेता भी उपस्थित थे.

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परिचय

एके राय का पूरा नाम अरुण कुमार राय था. इनका जन्म 15 जून 1935 को ग्राम सुपुर राजशाही जो अब बांग्लादेश में है में हुआ था. इनके पिता का नाम स्व शिवेश चन्द्र राय था. माता का नाम स्व रेणुका राय था. इन्होंने कोलकाता यूनिवर्सिटी से एमएससी की डिग्री ली थी. ये तीन बार सिंदरी विधानसभा से विधायक और तीन बार धनबाद लोकसभा के सांसद रहे.

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राय दा की राजनीतिक शुरुआत सिंदरी  पीडीआइएल से हुई. यहां ये इंजीनियर के पद पर थे, लेकिन मजदूरों के नेता बन गये, फिर कोयलांचल में मजदूर नेता के रूप में जाने, जाने लगे और एके राय, बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन ने JMM पार्टी बनायी और झारखंड अलग राज्य के लिए आंदोलन किया. विचारों की भिन्नता के कारण एके राय ने अलग पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति की स्थापना की और तीन बार सांसद और तीन बार विधायक चुने गये.

राय दा स्वच्छ छवि और ईमानदारी के मिसाल थे. राजनीति के इतना सक्रिय रहने के बाद भी कोई घर नहीं खरीदा, कोई सम्पति नहीं बनायी, यहां तक कि पूर्व सांसद का पेंशन भी राष्ट्रपति के कोष में दे दिया था.

राय दा मजदूरों के लिए लड़ते रहे और शादी भी नहीं की. इनके परिवार में कोई नहीं था, इसलिए जब ये चलने फिरने से लाचार हो गये और बीमारी से ग्रसित हो गये तो नुनुडीह के एक कार्यकर्ता सुबुर गोराई ने अपने घर में रखा और पूरी ईमानदारी से सेवा की.

ईमानदार और स्वच्छ छवि के लिए याद किये जायेंगेः शिबू सोरेन

श्रद्धांजलि देने पहुंचे शिबू सोरेन ने कहा कि वे राजनीति के संत थे. उन्हें ईमानदार और स्वच्छ छवि के लिए याद किया जायेगा. उन्होंने कहा कि हमलोगों ने मिल कर झारखंड अलग राज्य के आंदोलन की शुरुआत की थी.

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