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इतिहास के पुनर्लेखन लेखन के जरिये आरएसएस के नजरिये को देश में लागू करना चाहती है भाजपा   

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Faisal  Anurag

भारतीय जनता पार्टी जब भी जब सत्ता में आती है वह इतिहास पर बहस तेज कर देती है. आरएसएस भी मानता है कि भारत का पूरा इतिहास फिर से लिखा जाना चाहिए. इतिहास से इन संगठनों का बैर भाव पुराना है.

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अमित शाह ने इतिहास लेखन के सवाल को नये तरीके से पेश किया है. उन्होंने आरएसएस की एक अनुषंगी संगठन में बोलते हुए कहा है कि भारत का इतिहास गलत तरीके से लिखा गया है. उन्होंने ने साफ कहा है कि इतिहास फिर से लिखा जायेगा.

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ताकि कश्मीर के वे तथ्य सामने आ सकें जिन्हे छुपा कर रखा गया है. बकौल अमित शाह कुछ लोगों की गलतियों को इतिहास लेखन में उनकी भूमिका को छुपा दिया गया. इसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है.

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अमित शाह ने विपक्ष पर भी इस बहाने हमला किया. विपक्ष के कश्मीर संबंधी बयानों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उनके दिमाग में डर और बंदिश है. कश्मीर की हकीकत यह है कि वहां कोई बंदिश नहीं है.

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दोनों तथ्य बताते हैं कि भाजपा अपने प्रेपेगेंडा को इतिहास सम्मत बनाने के लिए बेचैन है. वह न केवल मध्यकालीन भारत के इतिहास को पूरी तरह बदल देना चाहती है, बल्कि आजादी की लड़ाई और बाद के दौर को भी वह अपने तरीके से लिखना चाहती है.

इतिहास के जानकार अमित शाह के इस नजरिये को तथ्यान्वेषण के मान्य इतिहास नजरिये और उपलब्ध स्रोतो पर हमला बताते हैं. नरेंद्र मोदी सत्ता में आने के बाद से जवाहर लाल नेहरू को ले कर जिस तरह की बातें करते रहे हैं उसके ऐतिहासिक होने पर अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं.

कहा गया है कि नरेंद्र मोदी नेहरू के लोकतांत्रिक व्यक्तित्व और कांग्रेस के सामूहिक उत्तरदायित्व की भूमिका को खत्म करना चाहते हैं. ताकि वे अपने हिसाब से इतिहास की व्यख्या कर सकें. नेहरू उन राजनेताओं में हैं, जिन्होंने इतिहास लेखन भी किया है.

दुनिया भर के इतिहासकारों में उनकी किताबों की प्रामाणिकता है. नेहरू के इतिहास नजरिये को दुनिया भर के बौद्धिक मंचों पर सराहा गया है.

डिस्कवरी आफ इंडिया और विश्व इतिहास की उनकी झलक उन किताबों में शुमार है, जो बेस्ट सेलर रही हैं. नेहरू ने अपनी जिंदगी के 9 साल जेल में बिताये. इसी दौरान उनकी किताबों लिखी गयीं है.

तथ्यों की बारीक जांच और विश्लेषण की तटस्थता इन किताबों को खास बनाती हैं. भाजपा नेहरू के इतिहास के नजरिये पर लंबे समय से हमला करती रही है. आरएसएस भी इतिहास को पूरी तरह बदलने और हिंदुत्व के नजरिये से देखने की वकालत करता रहा है.

बाजपेयी सरकार के समय भी इतिहास में बदलाव के लिए अनेक प्रयास किये गये  लेकिन तब के राजनीतिक माहौल में भाजपा की कोशिश कामयाब नहीं हो पायी. लेकिन 2014 के बाद से भाजपा लोगों के दिमाग को बदलने के हर मुमकीन प्रयास में लगी हुई है.

वह उस इतिहास को पूरी तरह अविश्वसीय साबित करना चाहती है, जिसने हिंदुस्तान की साझा विरासत की बात की है. यहां तक कि भाजपा सबाल्र्टन इतिहास लेखन की धारा की भी विरोधी है, क्योंकि वह इतिहास निर्माण में आम लोगों के विविध संस्कृतिक नजरिये को अपने विचार के लिए घातक मानती है.

अमित शाह बहुत जल्दीबाजी में हैं. वे चाहते हैं कि आएसएस का नजरिया ही देश का नजरिया बनाया जाये.  इसके लिए जरूरी है कि स्वतंत्रता संग्राम के कुछ बड़े नायकों को अपनाया जाये. इसी क्रम में भाजपा वल्लभ भाई पटेल, आंबेडकर और महात्मा गांधी को अपनाने में लगी हुई है.

वह पटेल और गांधी के सेकुलर विचारों को नहीं अपनाती. वह अनेक ऐसे विवादास्पद बातें करती है, जिसकी ऐतिहासिकता है ही नहीं. पटेल नेहरू के मतभेद को भी वह जिस तरह उजागर करती है, वह भी इसमें से एक है.

गांधी के स्वच्छता के नजरिये को ही वह प्रमुख बनाती है. अहिंसा ओर सत्य के गांधी के प्रयोगों और कमजोर तथा अल्पसंख्यकों के गांधी नजरिये  को वह गौण कर देती है. डॉ आंबेडकर उसके लिए दलित पहचान तो हैं लेकिन जिस दलित हक की बात वे करते हैं, उससे भाजपा को परहेज हो जाता है.

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