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#Chile and #Lebanon में आंदोलनः अंधराष्ट्रवाद के नाम पर असमानता के आक्रोश को छुपाने के प्रयास दुनियाभर में विफल हो रहे हैं

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Faisal Anurag

धुर दक्षिणपंथी और मुस्लिम विरोधी राजनीतिक ताकतों के उभार के बीच चिली (चिले) और लेबनान में आंदोलन ने एकबार फिर बुनियादी सवालों को पटरी पर ला खड़ा किया है. अर्जेंटीना के चुनाव परिणाम भी बता रहे हैं कि दक्षिण अमरीका सहित अनेक ऐसे देश दुनिया में हैं, जो दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ खड़े हो रहे हैं.

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चिली के युवा आंदोलन ने कई दशकों के बाद गैरबराबरी के तमाम पहलुओं को एक बार फिर राजनीतिक बहस का हिस्सा बना दिया है. चिली की राजधानी सेंटियागो सहित अनेक शहरों में हुए जबरदस्त प्रदर्शन के बाद दक्षिणपंथी राष्ट्रपति ने सरकार को बरखास्त कर दिया है.

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लेकिन आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है. क्योंकि छात्र-युवा उन आर्थिक नीतियों के सवाल को गंभीरता से उठा रहे हैं, जिसने अपेक्षाकृत चिली में गैरबराबरी को चरम तक पहुंचा दिया है. मेट्रो का किराया बढ़ने के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन ने राजनीतिक तौर पर आर्थिक सामाजिक गैरबराबरी के सवाल को प्रमुख बना दिया है.

1973 में भारत के गुजरात और 1974 में बिहार का छात्र आंदोलन भी हॉस्टल के सवालों को ले कर आंदोलन की शुरूआत की थी. लेकिन जल्द ही आंदोलन का संदर्भ व्यापक हो गया. और इंदिरा गांधी को बुरी हार का सामना करना पड़ा.

चिली का इतिहास वामपंथी उभार के अनेक दौर का साक्षी है. सल्वाडोर आयेंदे की चुनी हुई वामपंथी सरकार को अमरीका ने न केवल गिरा दिया था, बल्कि राष्ट्रपति आवास में अमरीकी इशारे पर आयेंदे की हत्या कर दी गयी थी.

इसके बाद भी चिली बार-बार बुनियदी सवालों को ले कर अपनी आवाज बुलंद करता रहा है. चिली अपेक्षाकृत एक समृद्ध राष्ट् है. लकिन पिछले कुछ समय की आर्थिक नीतियों के नतीजे देश में तबाही के रूप  में उभरे हैं. भारत आज जिन आर्थिक नीतियों को ले कर चल रहा है, चिली ओर ब्राजील सहित अनेक लातिनी अमरीकी देश अपने ही आर्थिक भंवर में फंस चुके हैं.

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जाहिर है इन नीतियों की अपनी सीमा है. और आर्थिक गैरबराबरी का विस्तारित होना उसमें अंतरनिहित है. मशहूर अर्थशास्त्री थामस पिकेटी ने तो अपने अध्ययन से दुनिया की गंभीर होती असामनता के सवाल को गंभीरता से उठाया है.

उन्होंने इतिहास के विभिन्न कालखंडों के माध्यम से यह दिखाया है कि दुनिया में आज गैरबराबरी किस तरह गंभीर हो चुकी है. अनके देशों में अंधराष्ट्रवाद के नाम पर इस असामनता के आक्रोश को छुपाने का प्रयास भी फलदायी साबित नहीं हो रहा है.

यदि फारराइट राजनीतिक दलों की आर्थिक नीतियों को ध्यान से देखा जाये तो विषमता की खाई के और बड़ा होने के संकेत दे रहे हैं. यूरोप के कुछ देशों में फारराइट, जो स्वभाव से ही मुस्लिम विरोधी भी है, की दस्तक की अनुगूंज लोकतंत्र ओर समानता के मूल्यों को चुनौती दे रहे हैं.

इन राजनीतिक ताकतों को कहीं भी बड़ी राजनीतिक कामयाबी हासिल तो नहीं होती दिख रही है, लेकिन उनकी सक्रियता बताती है कि वे 1940 के जमाने में दुनिया को धकेलने के लिए आमदा है. यूरोपियन यूनियन के पिछले चुनाव में इस तरह के 73 सांसद विभिन्न देशों में चुने गये हैं. जिन्हें ले कर यूरोप के तमाम लोकतंत्रवादी बेहद चिंतित हैं.

दुनिया भर के फारराइट ताकतों के बीच एक अजीब किस्म का लगाव बन रहा है. यूरोपियन यूनियन के 27 सांसद जम्मू-कश्मीर का दौरे के लिए आमंत्रित हैं, उनमें 22 की पार्टी फारराइट और मुस्लिम विरोधी रूझान के लिए कुख्यात है.

ये सांसद फ्रांस, इटली, पालैंड और ब्रिटेने के फारराइट दलों के प्रतिनिधि हैं. ब्रिटेन की ब्रेक्जिट पार्टी का रुझान तो जगजाहिर है. जो ब्रिटेन में इमीग्रेशन के खिलाफ है. और मुस्लिम उसके निशाने पर है. इन सांसदों की यात्रा को एक एनजीओं ने मदद की है.

और इनका नजरिया भाजपा के करीब है. यूरोपियन यूनियन ने पिछले दिनों जब जम्मू कश्मीर के संदर्भ में बहस की, तो उसमें भारत सरकार के पक्ष में इन्हीं सासदों ने अपनी राय रखी थी. यूरोपियन यूनियन ने अपने अधिकृत बयान में कहा है कि यह सांसदों का निजी दौरा है. और यूरोपियन यूनियन का अधिकृत दौरा नहीं है.

फारराइट समूहों के एका का यह नायाब नमूना है, जो आर्थिक सवालों को नजरअंदाज करते हुए अंधराष्ट्रवादी रुझानों के आधार पर ही अपना समर्थन जुटाने का लगातार प्रयास कर रहा है.

चिली और लेबनान के आंदोलनों ने फारराइट की वैश्विक दस्तक के खिलाफ आवाज बुलंद किया है. इन आंदोलनों के वैश्विक प्रभाव को रेाकना शासकों के लिए बेहद मुश्किल है. ठीक उसी तरह जैसे 1960 के दशक में पेरिस की की सड़कों पर उठे छात्रों के आंदोलन ने तीन सालों के अंदर पूरी दुनिया को गिरफ्त में ले लिया था.

प्रसिद्ध पत्रकार तारीक अली ने इसे स्ट्रीट फाइटिंग डेज की संज्ञा दी थी. चिली के आंदोलन के बीच ही 28 अक्तूबर को अर्जेटीना का चुनाव परिणाम आया है. इन परिणामों ने दक्षिणपंथी शासकों को धूल चटा कर चे ग्वेरा के देश में लाल परचम को एक बार फिर बुलंद कर दिया है.

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