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बच्चों की मौत और मीडियाः क्या आज कुछ पत्रकार गिद्ध बन गये हैं !

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Sweta Kumari

गिद्ध, जिसे अपशगुन माना जाता है. माना जाता है कि जब किसी घर पर गिद्ध मंडराने लगे, तो उस घर में अपशगुन होने वाला है. गिद्ध अब लुप्तप्राय है. पर, क्या कुछ पत्रकारों ने गिद्ध की जगह ले ली है. जिसके लिये खबरें बनाना, आईसीयू में घुस कर चीखना-चिल्लाना और सनसनी फैलाना ही सबकुछ है.

मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से बच्चों की मौत और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की रिपोर्टिंग के तरीके ने समाज के सामने यह सवाल लाकर खड़ा कर दिया है.

सवाल डॉक्टरों के संगठन आइएमए पर भी है. कोलकाता में डॉक्टर के साथ मारपीट की घटना पर तो पूरे देश के डॉक्टर आंदोलन करने लगे. पर, मुजफ्फरपुर में मीडिया द्वारा डॉक्टरों को जलील करने की घटना पर यही संगठन चुप्पी साधे रहा. वह भी तब जब इसमें डॉक्टर्स की कोई गलती नहीं है. गलती सिस्टम और सरकार की है. क्या आइएमए भी राजसत्ता के इशारे पर अपना रुख तय करने लगी है.

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मुजफ्फरपुर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ पत्रकारों ने आइसीयू में घुस कर जो किया है, उसने वर्ष 1993 में सूडान में आये भयंकर अकाल, साउथ अफ्रीका के फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर की वह तस्वीर (जिसमें एक बच्चा भूख से अधमरा जमीन पर पड़ा है और पास में बैठा गिद्ध उसके मरने का इंतजार कर रहा है), फोटोग्राफर को इस तस्वीर के लिये सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मिलना और बाद में फोटोग्राफर का आत्महत्या कर लेने की घटना को ताजा कर दिया है.

उस तस्वीर को ‘The vulture and the little girl’ कैप्शन के साथ अखबारों में छापा गया था. कहा जाता है कि किसी ने फोटोग्राफर से यह सवाल किया था कि उसने बच्चे को बचाने के लिये क्यों नहीं कुछ किया.

यह भी कहा जाता है कि फोटोग्राफर पर किसी ने टिप्पणी की थीः असल में जब बच्ची भूख से दम तोड़ने की स्थिति में थी, तब वहां दो गिद्ध था. जिसमें से एक के पास कैमरा था.

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इसी टिप्पणी के बाद फोटोग्राफर डिप्रेशन में चल गया और अंततः उसने आत्महत्या कर ली. इस कहानी का डिटेल हम नीचे देंगे. अभी जानते हैं मुजफ्फरपुर में क्या-क्या हुआ.

मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएस में चमकी बुखार से 136 से अधिक बच्चों की मौत के बाद दिल्ली के कुछ पत्रकार वहां पहुंचे. एक हिन्दी चैनल की महिला एंकर आइसीयू में घुस गयी. उसने वहां मरीजों को देख रहे डॉक्टर पर सवालों की बौछार करनी शुरु कर दी.

अस्तपाल की कुव्यवस्था, डॉक्टर्स-नर्स की कमी, बेड की कमी, वार्ड की कमी, आइसीयू की स्थिति पर डॉक्टर से सवाल किया. कैमरा के सामने लगभग भाग-भाग कर इलाज करने में लगे डॉक्टर की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इलाज करें या सवालों का जवाब दे.

टीवी मीडिया के कई दूसरे एंकरों ने भी यही सब किया. कैमरे में भी दिख रहा था कि एक बेड पर दो-तीन बच्चों का इलाज किया जा रहा है. डॉक्टर भी हर बेड पर दौड़ता नजर आ रहा है. वह भी पूरी कोशिश में लगा है कि किसी भी बच्चे की मौत ना हो.

ऐसे में उस डॉक्टर से मीडिया का संवेदनहीन सवाल पूछा जाना कहां तक उचित है. बेड कम हैं, डॉक्टर-नर्स कम हैं, दवाई नहीं है, क्या इसके लिये डॉक्टर जिम्मेदार हैं. ऐसे हालात में भी बच्चों को बचाना ही डॉक्टर की प्राथमिकता होगी, ना कि एक बेड पर कितने बच्चे हैं, यह गिनना.

अस्पतालों की कुव्यवस्था के लिये क्या वहां काम करने वाले डॉक्टर जिम्मेदार हैं. या सिस्टम. क्या टीवी चैनल के रिपोर्टर पटना से लेकर दिल्ली तक सत्ता शीर्ष पर बैठे जिम्मेदार लोगों (मंत्रियों-अफसरों) के दफ्तरों में घुस कर इस तरह चीख-चीख कर सवाल कर सकते हैं. शायद नहीं. वहां तो घिग्घी बंध जाती है.

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यह बात पूरी तरह सही है कि मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत, वर्ष 2016 में गोरखपुर में हुई बच्चों की मौतों के लिये व्यवस्था, सरकार और सत्ता जिम्मेदार है. सवाल भी सिस्टम और सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों से ही होने चाहिये. ना कि डॉक्टरों से पूरी व्यवस्था और चमकी बुखार से मर रहे बच्चों के लिए सिस्टम जिम्मेवार है. सवाल उस सिस्टम से किया जाना चाहिए. मंत्रियों और अफसरों से किया जाना चाहिये.

आईसीयू में काम कर रहे डॉक्टरों से नहीं. क्योंकि इलाज कर रहा डॉक्टर और स्टाफ तो अपना काम ही कर रहे हैं. उसे जो व्यवस्था उपलब्ध करायी गयी है, उसमें ही बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं.

अब आते हैं फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर की कहानी पर. इंटरनेट पर सर्च करके आप भी पढ़ सकते हैं. साल 1993 में साउथ अफ्रीका के फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर की एक तस्वीर ने उन्हें कामयाबी के शिखर पर पहुंचा दिया था. उनकी कामयाबी के पीछे भी गिद्ध की बड़ी भूमिका रही थी.

दरअसल केविन ने अफ्रीकी देश सूडान में अकाल के दौरान एक बच्ची की तस्वीर ली थी. उस तस्वीर में बच्ची भूख से तड़प रही थी और उससे कुछ दूरी पर बैठा गिद्ध बच्ची के मरने का इंतजार कर रहा था.

केविन ने काफी देर तक गिद्ध के उड़ने का इंतजार भी किया, लेकिन जब नहीं उड़ा तो उन्होंने वैसे ही फोटो खींच ली. उस तस्वीर ने केविन को बड़ी कामयाबी दिलायी. उन्हें साल 1994 में पत्रकारिता के क्षेत्र में सबसे बड़े सम्मान पुलित्जर पुरस्कार से नवाजा गया. जिसके लिए उन्हें बहुत बधाईयां भी मिलीं.

लेकिन कुछ लोगों ने जब केविन से पूछा कि क्या बच्ची बच गई. किसी ने यह भी कहा कि आप बच्ची को बचा सकते थे. उसे यूनाईटेड नेशन द्वारा संचालित फीडिंग सेंटर तक पहुंचा सकते थे. कहा जाता है कि किसी ने उनसे यह भी कहाः मैं आपको बताना चाहता हूं कि उस दिन वहां पर दो गिद्ध थे, जिसमें से एक के हाथ में कैमरा था. इसे लेकर हो रहे टिप्पणियों से फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर को बहुत दुख हुआ.

उन्हें एहसास हुआ कि फोटोग्राफी करके वे लौट तो आए, मगर बच्ची के बारे में उन्होंने जानने की कोशिश नहीं की. उन्हें बच्ची को नहीं बचाने का अफसोस होने लगा. इससे वो डिप्रशन में चले गए और साल 1994 मे ही उन्होंने आत्महत्या कर ली.

आत्महत्या करने से पहले पहले केविन कार्टर ने एक सुसाइड नोट भी लिखा था. जिसमें उसने लिखा थाः “मैं भूख से तड़पते, बिलखते बच्चों और कई मौतों, लाशों की दुखभरी यादों से बेहद डरा हुआ हूं. इसलिए मैं अपने केन के पास जा रहा हूं.”

दरअसल केन, केविन के बहुत पुराने दोस्त थे. 1994 में ही केविन के सुसाइड करने कुछ समय पहले केन की मौत हो गयी थी.

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