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#Delhi पुलिस-वकील विवादः गृह मंत्री के रूप में अमित शाह की यह बड़ी विफलता है

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Surjit Singh

दिल्ली. देश की राजधानी. पिछले तीन दिनों से वहां क्या चल रहा है. पुलिस-वकील क्या कर रहे हैं. जो कर रहे हैं, उससे क्या संदेश जाता है. मंगलवार को दिल्ली पुलिस के जवान पुलिस हेडक्वार्टर पर प्रदर्शन कर रहे थे. तो बुधवार को वकील प्रदर्शन कर रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वहां सरकार है. है तो क्या कर रही है. सब कुछ भगवान भरोसे. मतलब सरकार और प्रशासन की बड़ी विफलता.

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एक छोटी सी मारपीट की घटना. जो अब पुलिस और वकीलों के बड़े आंदोलन के रूप में सामने आ गयी है. दिल्ली की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय की है. और इस नाते गृह मंत्री के रूप में अमित शाह की बड़ी जिम्मेदारी बनती है. इस मामले में अभी तक अमित शाह का कोई बयान सामने नहीं आया है. मामले को सलटाने के लिए वह कुछ कर रहे हैं, इसकी भी कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं है. देखा जाये तो दिल्ली की घटना गृह मंत्री के रूप में अमित शाह की बड़ी विफलता है.

देश की राजधानी में तीन दिन से अमित शाह और उनका मंत्रालय चुप है. गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू बार-बार ट्वीट करते हैं और फिर उसे डिलिट करते हैं. वोट की राजनीति ने उन्हें हास्यस्पद स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है. समझा जा सकता है, जब देश के मंत्री सिर्फ चुनावी माहौल बनाने में मशगूल रहेंगे, व्यस्त रहेंगे, तब बड़ी समस्या आने पर यही स्थिति बनेगी.

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दिल्ली जैसे हालात यूं ही नहीं बनते. इसके लिए सत्ता जिम्मेदार होती है. अभी जो स्थिति है, उसके लिए भी सत्ता ही जिम्मेदार है.

तीस हजारी कोर्ट में वकीलों द्वारा किसी के साथ मारपीट करने की यह पहली घटना नहीं है. जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के साथ मारपीट हुई थी. मारपीट करने के आरोपी वकीलों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई. बाद में मारपीट के आरोपियों की तब के गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ तस्वीरें सामने आयीं. मारपीट की और भी घटनाएं हुईं पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

दिल्ली में वकीलों द्वारा पुलिस के जवान के साथ मारपीट की घटना का वीडियो वायरल होने के बाद देश भर से आइपीएस अफसरों और विभिन्न राज्यों के पुलिस एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. पर, क्या ये अफसर कभी अपने आस-पास भी देखते हैं. क्या हर बार किसी जवान के साथ मारपीट करने वाले के खिलाफ कठोर कार्रवाई करते हैं. या सत्ता के आगे रेंगने लगते हैं.

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कुछ माह पहले झारखंड भाजपा के प्रदेश कार्यालय में तैनात पुलिस के एक जवान के साथ भाजपा नेता ने मारपीट की. केस हुआ. पर क्या मारपीट करने वाले नेता के खिलाफ कार्रवाई हुई. नहीं हुई. उल्टे मारपीट का आरोपी नेता मुख्यमंत्री रघुवर दास के साथ मंच पर दिखता है. तो क्या यह मान लिया जाये कि झारखंड के आइपीएस अफसरों व पुलिस के जवानों ने सत्ता के आगे घुटने टेक दिये. फिर कल को कोई और समूह जवान के साथ मारपीट करेगा, तो कार्रवाई की उम्मीद कैसे कर सकते हैं.

दिल्ली की घटना को एक अलग नजरिये से भी देखा जाना चाहिए. वह है भीड़ तंत्र का न्याय. जिसे किसी का डर नहीं रहा. वह सड़क पर न्याय करता है. भीड़ तंत्र को कौन बढ़ावा दे रहा है. वो कौन लोग हैं जो भीड़ के अपराध का महिमामंडन कर रहे हैं. आप झारखंड में मॉब लिंचिंग के आरोपियों को तब के केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा द्वारा माला पहनाने की घटना को उदाहरण के रूप में ले सकते हैं. आप यूपी में थाना प्रभारी की हत्या के आरोपी को जमानत मिलने पर सम्मानित करनेवालों के चेहरे भी देख सकते हैं. हम भूल गये हैं कि अगर आप खेत में सांप छोड़ते हैं, तो वह व्यक्ति को पहचान कर नहीं काटेगा. अगर छोड़नेवाला भी खेत में जायेगा, तो वह उसे भी काटेगा ही.

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