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मनरेगा मजदूरों की मजदूरी भुगतान के लिए केंद्र सरकार से पर्याप्त राशि के आवंटन की मांग

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Ranchi : इस महीने की शुरुआत में कई सांसदों, सामाजिक कार्यकर्ता, पूर्व नौकरशाह, शोधकर्ता और किसान आंदोलनों के नेताओं ने प्रधानमंत्री को एक सार्वजानिक पत्र लिखकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) में बजट की लगातार कमी के विषय में बताया था. दिसंबर के अंत तक केंद्र सरकार के 2018-19 के मनरेगा बजट की 99 प्रतिशत राशि समाप्त हो चुका थी. पत्र भेजे जाने के कुछ ही दिनों बाद केंद्र सरकार ने नरेगा के लिए 6084 करोड़ रुपये के पूरक बजट की घोषणा की. इससे 2018-19 का कुल बजट 55,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 61,084 करोड़ रुपये हो जायेगा.

अतिरिक्त राशि की मांग की है राज्य सरकार ने

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महीनों अपनी मजदूरी के भुगतान का इंतजार और काम की मांग कर रहे मजदूरों के लिए यह पूरक बजट न ही पर्याप्त है और न समय पर आवंटित किया गया. लेकिन, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि केंद्र सरकार ने अभी तक इस राशि को भी निर्गत नहीं किया है. मनरेगा की सरकारी वेबसाइट (nrega.nic.in) के अनुसार अभी तक केंद्र ने केवल 53,353 करोड़ रुपये निर्गत किये हैं. राज्यों के अंशदान को अगर जोड़ें, तो इस वर्ष मनरेगा के लिए कुल 59,709 करोड़ रुपये निर्गत किये गये हैं, जबकि अभी तक 63,537 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. इसके कारण अभी कम से कम 3,828 करोड़ रुपये लंबित हैं. 25 जनवरी 2019 को झारखंड सरकार ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को पत्र लिखकर 39 करोड़ रुपये की देयता के लिए अतिरिक्त राशि की मांग की है. पत्र में यह भी कहा गया है, “पिछले दो दिनों (24-25 जनवरी, 2019) से Ne-FMS खाते में राशि निर्गत नहीं की गयी है.” इससे केंद्र सरकार द्वारा Ne-FMS प्रणाली के माध्यम से ससमय राशि निर्गत करने के दावे की सच्चाई भी पता चलती है.

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जनवरी 2019 के 81 प्रतिशत फंड ट्रांसफर ऑर्डर्स (FTOs) और फरवरी 2019 के 43 प्रतिशत FTOs (एवं पिछले महीनों के भी कुछ FTO) केंद्र सरकार के स्तर पर लंबित हैं. इसके कारण मज़दूरी भुगतान में हुई देरी के लिए मनरेगा मजदूरों को मुआवजा भी नहीं मिलेगा. यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है. मनरेगा संघर्ष मोर्चा ने मांग की है कि केंद्र सरकार तुरंत लंबित मजदूरी के भुगतान एवं इस वर्ष के शेष दो महीनों में मजदूरों के काम के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त राशि का आवंटन सुनिश्चित करे.

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